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नज़्म
तेरे साहिल से टपकती अब भी है शान-ए-बुलंद
आसमाँ-फ़र्सा हैं अब भी तेरे ऐवान-ए-बुलंद
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
जो होता है हमेशा रूह-फ़र्सा हादसों का पेश-ख़ेमा सा
वही सारे क़रीने सारे हीले हैं बहम अब के
मोहम्मद तन्वीरुज़्ज़मां
नज़्म
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँ
फ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
है आख़िर ज़िंदगी ख़ून अज़-बुन-ए-नाख़ुन बर-आवर-तर
क़यामत सानेहा मतलब क़यामत फ़ाजिआ परवर
जौन एलिया
नज़्म
घर-बार अटारी चौपारी क्या ख़ासा नैन-सुख और मलमल
चलवन पर्दे फ़र्श नए क्या लाल पलंग और रंग-महल