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नज़्म
ये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदा
कि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये ज़ेहन में बनती और बिगड़ती हुई फ़ज़ाएँ
वो फ़िक्र में आए ज़लज़ले हों कि दिल की हलचल
जावेद अख़्तर
नज़्म
मुझ से अब मेरी मोहब्बत के फ़साने न कहो
मुझ को कहने दो कि मैं ने उन्हें चाहा ही नहीं