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नज़्म
कि तू इक आबला है जिस को आख़िर फूट जाना है
ग़रज़ गर्दां हूँ बाद-ए-सुब्ह-गाही की तरह लेकिन
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
फूल क्या ख़ार भी हैं आज गुलिस्ताँ-ब-कनार
संग-रेज़े हैं निगाहों में गुहर आज की रात