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नज़्म
जा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीब
ज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीब
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये 'ख़ुसरो' 'मीर' 'ग़ालिब' का ख़राबा बेचता क्या है
हमारा 'ग़ालिब'-ए-आज़म था चोर आक़ा-ए-'बेदिल' का
जौन एलिया
नज़्म
ज़ुल्म और इतना कोई हद भी है इस तूफ़ान की
बोटियाँ हैं तेरे जबड़ों में ग़रीब इंसान की
जोश मलीहाबादी
नज़्म
दिलदार भी थी जो और दुनिया-दार भी
शान-ओ-शौकत की इस दुनिया में मुझ ग़रीब की चाहत की तलबगार थी