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नज़्म
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहीं
उड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहीं
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
वो लड़की अच्छी लड़की है तुम नाम न लो हम जान गए
वो जिस के लम्बे गेसू हैं पहचान गए पहचान गए
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
वही गेसू वही नज़रें वही आरिज़ वही जिस्म
मैं जो चाहूँ तो मुझे और भी मिल सकते हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
नए उनवान से ज़ीनत दिखाएँगे हसीं अपनी
न ऐसा पेच ज़ुल्फ़ों में न गेसू में ये ख़म होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
कितने माथों के अभी सर्द हैं रंगीन गुलाब
गर्द अफ़्शाँ हैं अभी गेसू-ए-पुर-ख़म कितने
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
वो गेसू-ए-परेशाँ या घटाएँ रक़्स करती थीं
फ़ज़ाएँ वज्द करती थीं हवाएँ रक़्स करती थीं
अख़्तर शीरानी
नज़्म
क़ाफ़िले क़ामत ओ रुख़्सार ओ लब ओ गेसू के
पर्दा-ए-चश्म पे यूँ उतरे हैं बे-सूरत-ओ-रंग