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नज़्म
जब उस का बोसा लेता था सिगरेट की बू नथनों में घुस जाती थी
मैं तम्बाकू-नोशी को इक ऐब समझता आया हूँ
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
बे-सौत पुकार पर आसमान अश्क-बार होता है
तो हमारी फ़सलों में भूक चुपके से घुस जाती है
मुनीर अहमद फ़िरदौस
नज़्म
पहले धूप निकलती थी तो हम उस से घबराते थे
होती थी दोपहर तो भय्या कमरों में घुस जाते थे