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नज़्म
गुल-ओ-गुलज़ार के मंज़र वो शे'रों में दिखाता है
वो अपने ही ख़यालों की नई दुनिया बसाता है
नारायण दास पूरी
नज़्म
मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहिए
कि दाना ख़ाक में मिल कर गुल-ए-गुलज़ार होता है
सय्यद हशमत सुहैल
नज़्म
आसिम बद्र
नज़्म
और नए रंग के गुलज़ार खिला देते हो
वज्द के नुक़्ते पे ये रक़्स-ए-जहाँ रुकता है
हुमैरा गुल तिश्ना
नज़्म
क़ुमरियाँ मीठे सुरों के साज़ ले कर आ गईं
बुलबुलें मिल-जुल के आज़ादी के गुन गाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ख़्वाब-ए-गिराँ से ग़ुंचों की आँखें न खुल सकीं
गो शाख़-ए-गुल से नग़्मा बराबर उठा किया
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
मैं शाइ'र हूँ मुझे अहल-ए-हुनर फ़नकार कहते हैं
मुझे रम्ज़-आश्ना-ए-निकहत-ए-गुलज़ार कहते हैं
असद जाफ़री
नज़्म
नर्म-रफ़्तारी हो वक़्त-ए-सैर-ए-गुलज़ार-ए-तरब
राह-ए-पुर-ख़ार-ए-अमल में गर्म-रफ़्तारी भी हो
अर्श मलसियानी
नज़्म
बहार-ए-हुस्न जवाँ-मर्ग सूरत-ए-गुल-ए-तर
मिसाल-ए-ख़ार मगर उम्र-ए-दर्द-ए-इश्क़ दराज़