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नज़्म
गुफ़्त रूमी हर बना-ए-कुहना कि-आबादाँ कुनंद
मी न-दानी अव्वल आँ बुनियाद रा वीराँ कुनंद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
सारे ख़्वाबों का गला घूँट दिया है मैं ने
अब न लहकेगी किसी शाख़ पे फूलों की हिना
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ज़ेर-ए-लब अर्ज़ ओ समा में बाहमी गुफ़्त-ओ-शुनूद
मिशअल-ए-गर्दूं के बुझ जाने से इक हल्का सा दूद
जोश मलीहाबादी
नज़्म
होंट तबस्सुम के आदी हैं वर्ना रूह में ज़हर-आगीं
घुपे हुए हैं इतने नश्तर जिन की कोई तादाद नहीं
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
इतनी गम्भीरी पे भी मर-मर के जीते हैं जनाब
सौ जतन करते हैं तो इक घूँट पीते हैं जनाब
जोश मलीहाबादी
नज़्म
मेरे बरबत के सीने में नग़्मों का दम घुट गया
तानें चीख़ों के अम्बार में दब गई हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
न देखे हैं बुरे इस ने न परखे हैं भले इस ने
शिकंजों में जकड़ कर घूँट डाले हैं गले इस ने