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नज़्म
हम मशीनों की तरह जीते हैं पाबंदी-ए-औक़ात के साथ
वक़्त बे-कार गुज़रता ही चला जाता है
वहीद अख़्तर
नज़्म
मगर इक धाक बस दीवान-ए-'ग़ालिब' की रही ग़ालिब
तसव्वुर आज 'ग़ालिब' का 'हसन' के ज़ह्न पर ग़ालिब