aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "ilaaqa"
रेत मुट्ठी में कभी ठहरी हैप्यास से उस को इलाक़ा क्या हैउम्र का कितना बड़ा हिस्सा गँवा बैठा मैंजानते बूझते किरदार ड्रामे का बनाऔर इस रोल को सब कहते हैंहोशियारी से निभाया मैं नेहँसने के जितने मक़ाम आए हँसाबस मुझे रोने की साअत पे ख़जिल होना पड़ाजाने क्यूँ रोने के हर लम्हे कोटाल देता हूँ किसी अगली घड़ी परदिल में ख़ौफ़ ओ नफ़रत को सजा लेता हूँमुझ को ये दुनिया भली लगती है
रात ढलते ही इक आवाज़ चली आती हैभूल भी जाओ कि मैं ने तुम्हें चाहा कब थाकिस सनोबर के तले मैं ने क़सम खाई थीकोई तूफ़ाँ किसी पूनम में उठाया कब थामेरी रातों को किसी दर्द से निस्बत क्या थीमेरी सुब्हों को दुआओं से इलाक़ा कब थाएक महमिल के सिरहाने कोई रोया था ज़रूरपस-ए-महफ़िल किसी लैला ने पुकारा कब थातुम यूँही ज़िद में हुए ख़ाक-ए-दर-ए-मय-ख़ानामुझ को ये ज़ोम कि मैं ने तुम्हें टोका कब थातुम ने क्यूँ पाकई-ए-दामाँ की हिकायत लिक्खीमेरे सर को किसी दीवार का सौदा कब थायाद कम कम है न छेड़ो मिरे मक्तूब की बातवो मुरव्वत थी फ़क़त हर्फ़-ए-तमन्ना कब था
मैं कैसे बताऊँकि जो कैफ़ियत मुझ पे गुज़रीअसातीरी हरगिज़ नहीं थीकिसी देव-माला सेसा गा सेजा तक कहानी सेउस का इलाक़ा नहीं थाकिसी ख़्वाब का ये वक़ूआ नहीं थान ये वाहिमा थाजिसे अक़्ल तश्कील देती हैहैरत का वर्ताहिसार-ए-नफ़स या नज़र का करिश्माकोई वारिदापास अन्फ़ास तन्वीम या मिस्मिरिज़्मकोई हब्स-ए-दमजज़्ब-ओ-मस्तीकिसी संत-साधू की शक्तिकिसी सूफ़ी सालिक का इल्हामसरसामवहशत की लयवज्द या हाल सी कोई शयएक शीशे के अंदर कोई चीज़बुर्राक़ पर्दे पे रक़्साँ सीफ़ानूस-ए-गर्दां सीतस्वीरी हरगिज़ नहीं थीअसातीरी हरगिज़ नहीं थी
तारीख़ के बुने हुए थैलों में हमेशाकोई बे-हद अहम चीज़ रह जाती हैबे-शक हवाएँ अज़ीम-तरीन सन्नाअ हैंउन ख़राबों की जो नक़्श हैं बे-रंगी के साथएक पुर-असरार ग़ैर-मारूफ़ अंधेरे की दबीज़ दीवारों परलेकिन आँखेंऐसे पेचीदा मंज़र कोसेह्हत और सक़ाहत के साथनक़्ल नहीं कर सकतींख़्वाह बीनाई की किसी भी क़बील सेइलाक़ा रखती होंअब बिल्कुल नया tanaazur ज़रूरी हैइस ना-दीदनी से ओहदा-बरा होने के लिएवर्ना देखना एक अहमक़ाना तसव्वुर है जिसेबस आँखें ही मानती हैं
काँटों की चट्टान पे खड़ीमैं आँखों की सूइयाँ निकाल रही हूँये इलाक़ा किस सल्तनत में शामिल हैमुलूकियत मेरी ज़बान पे काँटेहल्क़ में फंदाआँखें बाहरशाह-बलूत के लम्बे दरख़्तों जैसेलम्बे पूत बहुत हो गए हैंजंगल में दरख़्त ज़ियादा हो जाएँतो आग लगा कर दरख़्त कम कर दिए जाते हैंबाहर निकली हुई आँख से ज़ाफ़रान का खेतऔर कटे हुए बाज़ुओं से गन्ने की पोरियाँ बन गई हैंहम ने एक झूट बोला था नाअब सारी उम्र उस को सच साबित करने में गुज़ार देंगेहम कि जो ज़िंदगी भरअपने हिस्से की रोटी कमाने की कोशिश करते हैंऔर भूके रहते हैंझूटी आस की छतरी तलेबुलबुले जैसे आँसूबताशों की तरह थाल में सजाएकब तक बतलाती रहोगीकि वो तुम्हारा क़ातिल नहीं हैक़त्ल महज़ सानिए मेंज़िंदगी का रिश्ता ख़त्म करने का नाम नहींमौजूद से इंकार भीतो क़त्ल के मुतरादिफ़ होता हैमेरा जी करता हैवो जो सब मेरे क़ातिल हैंमैं उन्हें हवा की तरह निगल जाऊँ
तू ने पूछा है मिरे दोस्त तो मैं सोचती हूँवो जो इक चीज़ है दुनिया जिसे ग़म कहती हैमुझे तस्लीम, मिरा उस से इलाक़ा न रहाज़िंदगी गोया कोई सेज रही फूलों कीफिर वो क्या है कि जो काँटों सी चुभा करती हैमैं ने देखी हैं वो बे-मेहर निगाहें ऐ दोस्तजिन की बेगानगी दिल चीर दिया करती हैमैं ने घूमे हैं वो तन्हाई के आसेब-नगरजिन की सरहद पे कहीं मौत फिरा करती हैमैं ने काटी हैं वो सुब्हें कि जबीं पर जिन कीतीरगी बर्फ़ के मानिंद गिरा करती हैअपने आँगन में मिली वहशत-ए-सहरा मुझ कोग़ैरियत जिस में बगूलों सी उड़ा करती है
बहुत नर्म-ओ-नाज़ुकहसीं पँख वालीपरेशान तितलीकभी पत्ते छू करकभी चूम कर फूलराह-ए-बक़ा ढूँडने में लगी थीकिरन आफ़्ताबी थी देती दिलासाहवा भी थपकती थीशफ़क़त से उस कोकि इतने में इंसान-ज़ादा कोईचुपके से अपनी चुटकी में ले करबड़े प्यार सेइस हसीं पँख वालीपरेशान तितली कोदिखला गया हैफ़ना का इलाक़ा
कोई न जानेकि हँसते बसते घरों के अंदर भीघर बने हैंजहाँ मुक़फ़्फ़ल हैं बीते लम्हेसबीह दिनऔर मलीह रातेंये वाक़िआ हैकि जो इलाक़ा तुम्हारे जल्वों की ज़द में आयाउजड़ गया हैउजाड़ आँगन तुम्हारी पहचान हैंयहाँलोग ख़ुद को कैसे शनाख़तेंगे
ज़िंदा रहने के लिएमुझे जो इलाक़ा दिया गया हैवही मेरा ईरीना हैमैं नय इस के चारों तरफ़ख़ार-दार तारों की बाढ़ लगा रक्खी हैजिन में हर वक़्तकरन्ट गर्दिश करता रहता हैऔर मेरे कुत्तेमेरे अलावा किसी की ख़ुशबू से मानूस नहींमैं इस दुनिया के बारे मेंउन सब लोगों सेज़ियादा जानता हूँजो हमेशा सफ़र करते रहते हैंऔर कहीं नहीं जातामेरे पास एक एल्बम हैजिस में चंद बादलों के टुकड़ेख़्वाब और लोगों के चेहरेमहफ़ूज़ हैंया एक मरी हुई तितलीजिसे मेरे कुत्तों नेमेरे क़दमों में ला केडाल दिया था
अजीब हैं मिरी बातें अजीब है एहसासतुम्हें ख़ुदा न करे ये गुमाँ गुज़रते होंकिसी उदास शब-ए-माह में कभी जब मैंगरजते चीख़ते चिंघाड़ते समुंदर सेये पूछता हूँ ''तुझे कब सुकून मिलता हैकभी तहों में है हलचल कभी किनारों परकभी है सतह पे शोरीदगी कभी दिल में''तो थोड़ी देर समुंदर उदास रहता हैफिर उस के ब'अद मिलाता है हाथ मौजों केख़ुदा गवाह समुंदर मुझे बुलाता है!''अब आ कि मुझ से तिरी रूह को इलाक़ा हैअब आ कि मैं तो तिरे पास आ नहीं सकता''
फिर न आना कि ऐ मुँह फेर के जाने वालेदिल-ए-सद-चाक में बाक़ी नहीं वो जज़्बा-ए-शौक़जज़्बा-ए-शौक़ कि होता था कभी तेरे सबबआज तेरे ही सबब रुख़्सत-ए-जाँ चाहता हैदिल ने जब जब तुझे आवाज़ लगाई रो करतू ने हर बार इसे एक नया ज़ख़्म दियाआख़िरश दिल में जगह कोई सलामत न रहीसो न तुझ से न तिरे ग़म से 'इलाक़ा है मुझेअब अगर लौट भी आए तो ब-सद-‘इज्ज़-ओ-नियाज़और बाँधे तर-ओ-ताज़ा कोई पैमान-ए-वफ़ामैं कहूँगा कि ऐ मुँह फेर के जाने वालेदिल-ए-सद-चाक में बाक़ी नहीं वो जज़्बा-ए-शौक़
मैं वक़्त के चिड़िया-घरजानवरों के जंगलों में उन कीतमाम-तर ज़रूरतों के साथ दी गई आज़ादीऔर तुम्हारे दिल के कोने-खुदरों मेंमेरे जुनून को दी गई आज़ारी मेंकुछ ज़ियादा फ़र्क़ नहीं देखतीसधाने के लिए इंतिज़ामिया की यौमिया औरहफ़्ता-वार मीटिंग के ज़रीये बे-मुहाबा जानवरों कोउसूलों के मुताबिक़ सधाने का भरपूर अमलनतीजा-ख़ेज़ साबित हो रहा हैमगर मुझे ए'तिराफ़ है कि जंगले के अंदर मेरीज़रूरतों का पूरा पूरा ख़याल रक्खा जा रहा हैमेरी ख़ूराक और पानी पाबंदी से मुक़र्ररा वक़्त परपहुँचाई जा रही हैसलाख़ों के अंदर का पूरा इलाक़ा मेरी दस्तरस मेंदे दिया गया हैमगर तमाश-बीनों के रिवायती शौक़ से पहुँचने वालीअज़िय्यत से तहफ़्फ़ुज़ भी दिया जा रहा हैखोलियों में बक़ा-ए-बाहमी के ज़र्रीं उसूल के तहतदूसरे जंगलों तक पहुँचने के रास्ते भी मसदूदकर दिए गए हैंसब्ज़े काई पत्थरों और तालाब के ज़रिए मसनूई दुनिया कीबुनत ऐसी ज़रूर हैकि कोई भी उस पे अस्ल होने का धोकाखा सकता हैसो मैं भी अपने आप को इस ख़ूबसूरत माहौलका आदी बनाने की मुकम्मल कोशिश कर रही हूँ
सबा के सब्ज़ ख़ित्ते सेसुनहरे मौसमों की आरज़ू ले करदयार-ए-जाँ में क्यूँ आयावो जिस की आँख चमकीले दिनों का खोज देती हैजहाँ रंगों की धुन में आश्ना मंज़र तहय्युर केखुली ख़्वाहिश के पानी मेंउभरते तैरते हैं डूब जाते हैंवो मुझ से पूछता है सैंकड़ों असरार जीने और मरने केनज़र का रौशनी से राब्ता क्या हैलहू को चाँदनी से क्या तअ'ल्लुक़ हैफ़ज़ा की गोद में दम तोड़ती क़ौस-ए-क़ुज़ह क्यूँ हैबिछड़ना याद रखना भूल जाना किस को कहते हैंमता-ए-हस्ती-ए-बे-ख़ानुमाँ क्या हैज़मीं क्या है ज़माँ क्या हैमगर मैं लफ़्ज़-गर हों कैसे समझाऊँकि मेरे तजरबे की वुसअ'तों में भीसबा के सब्ज़ ख़ित्ते से मिरे सुख की क़लम-रौ तकतहय्युर का इलाक़ा हैजहाँ नीले घरोंदों सेसवालों के परिंदे माइल-ए-परवाज़ रहते हैंगुमाँ की सर-ज़मीनों कोसबा के सब्ज़ ख़ित्ते कोनज़र के बादबानों सेखुली ख़्वाहिश के पानी तकपरिंदे हैरतों की ताज़ा मंज़िल का इशारा हैंपरिंदे आगही का इस्तिआ'रा हैं
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रबक्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया होशोरिश से भागता हूँ दिल ढूँडता है मेराऐसा सुकूत जिस पर तक़रीर भी फ़िदा होमरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरीदामन में कोह के इक छोटा सा झोंपड़ा होआज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत में दिन गुज़ारूँदुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया होलज़्ज़त सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों मेंचश्मे की शोरिशों में बाजा सा बज रहा होगुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी कासाग़र ज़रा सा गोया मुझ को जहाँ-नुमा होहो हाथ का सिरहाना सब्ज़े का हो बिछौनाशरमाए जिस से जल्वत ख़ल्वत में वो अदा होमानूस इस क़दर हो सूरत से मेरी बुलबुलनन्हे से दिल में उस के खटका न कुछ मिरा होसफ़ बाँधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे होंनद्दी का साफ़ पानी तस्वीर ले रहा होहो दिल-फ़रेब ऐसा कोहसार का नज़ारापानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता होआग़ोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सब्ज़ाफिर फिर के झाड़ियों में पानी चमक रहा होपानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनीजैसे हसीन कोई आईना देखता होमेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन कोसुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा होरातों को चलने वाले रह जाएँ थक के जिस दमउम्मीद उन की मेरा टूटा हुआ दिया होबिजली चमक के उन को कुटिया मिरी दिखा देजब आसमाँ पे हर सू बादल घिरा हुआ होपिछले पहर की कोयल वो सुब्ह की मोअज़्ज़िनमैं उस का हम-नवा हूँ वो मेरी हम-नवा होकानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँरौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा होफूलों को आए जिस दम शबनम वज़ू करानेरोना मिरा वज़ू हो नाला मिरी दुआ होइस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नालेतारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा दिरा होहर दर्दमंद दिल को रोना मिरा रुला देबेहोश जो पड़े हैं शायद उन्हें जगा दे
मक्के मदीने के पाक मुसल्ले पयम्बर घर नवासेशाह-ए-मर्दां अमीर-ऊल-मोमिनीन हज़रत-'अली' के पोतेहज़रत इमाम-'हसन' हज़रत इमाम-'हुसैन' के पोतेहज़रत इमाम-अली-'नक़ी' के पोतेसय्यद-'जाफ़र' सानी के पोतेसय्यद अबुल-फ़रह सैदवाइल-वास्ती के पोतेमीराँ सय्यद-'अली'-बुज़ुर्ग के पोतेसय्यद-'हुसैन'-शरफ़ुद्दीन शाह-विलायत के पोतेक़ाज़ी सय्यद-'अमीर'-अली के पोतेदीवान सय्यद-'हामिद' के पोतेअल्लामा सय्यद-'शफ़ीक़'-हसन-एलिया के पोतेसय्यद-'जौन'-एलिया हसनी-उल-हुसैनी सपूत-जाह''
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमाराहम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमाराग़ुर्बत में हों अगर हम रहता है दिल वतन मेंसमझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारापर्बत वो सब से ऊँचा हम-साया आसमाँ कावो संतरी हमारा वो पासबाँ हमारागोदी में खेलती हैं इस की हज़ारों नदियाँगुलशन है जिन के दम से रश्क-ए-जिनाँ हमाराऐ आब-रूद-ए-गंगा वो दिन है याद तुझ कोउतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारामज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखनाहिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारायूनान ओ मिस्र ओ रूमा सब मिट गए जहाँ सेअब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमाराकुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारीसदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा'इक़बाल' कोई महरम अपना नहीं जहाँ मेंमालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहाँ हमारा
जो ज़िंदगी के नए सफ़र मेंतुझे किसी वक़्त याद आएँतो एक इक हर्फ़ जी उठेगापहन के अन्फ़ास की क़बाएँउदास तन्हाइयों के लम्होंमें नाच उट्ठेंगी ये अप्सराएँमुझे तिरे दर्द के अलावा भीऔर दुख थे ये मानता हूँहज़ार ग़म थे जो ज़िंदगी कीतलाश में थे ये जानता हूँमुझे ख़बर थी कि तेरे आँचल मेंदर्द की रेत छानता हूँमगर हर इक बार तुझ को छू करये रेत रंग-ए-हिना बनी हैये ज़ख़्म गुलज़ार बन गए हैंये आह-ए-सोज़ाँ घटा बनी हैये दर्द मौज-ए-सबा हुआ हैये आग दिल की सदा बनी हैऔर अब ये सारी मता-ए-हस्तीये फूल ये ज़ख़्म सब तिरे हैंये दुख के नौहे ये सुख के नग़्मेजो कल मिरे थे वो अब तिरे हैंजो तेरी क़ुर्बत तिरी जुदाईमें कट गए रोज़-ओ-शब तिरे हैंवो तेरा शाइ'र तिरा मुग़न्नीवो जिस की बातें अजीब सी थींवो जिस के अंदाज़ ख़ुसरवाना थेऔर अदाएँ ग़रीब सी थींवो जिस के जीने की ख़्वाहिशें भीख़ुद उस के अपने नसीब सी थींन पूछ इस का कि वो दिवानाबहुत दिनों का उजड़ चुका हैवो कोहकन तो नहीं था लेकिनकड़ी चटानों से लड़ चुका हैवो थक चुका था और उस का तेशाउसी के सीने में गड़ चुका है
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरीज़िंदगी शम्अ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी!दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए!हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए!हो मिरे दम से यूँही मेरे वतन की ज़ीनतजिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
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