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नज़्म
वो इल्म में अफ़लातून सुने वो शेर में तुलसीदास हुए
वो तीस बरस के होते हैं वो बी-ए एम-ए पास हुए
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
बनाम-ए-इल्म-ओ-अदब जो पाया
अबदुल्लाह-इब्न-ए-उबय की दौलत अबू-जहल की वो ख़ासियत है
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
परतव रोहिला
नज़्म
थे हकीम-ए-शर्क़ से शैख़-ए-मुजद्दिद हम-कलाम
गोश-बर-आवाज़ सब दानिश-वरान-ए-इल्म-ओ-दीं
शोरिश काश्मीरी
नज़्म
अली-अहमद भी हैं आगाह आदाब-ए-हरम भी हैं
वक़ार-ए-होश भी अज़्मत-फरोज़-ए-इल्म-ओ-दानिश भी
मसूद अख़्तर जमाल
नज़्म
‘इल्म-ओ-कमाल-ओ-ईमाँ बर्बाद हो रहे हैं
'ऐश-ओ-तरब के बंदे ग़फ़लत में सो रहे हैं
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
यही है वो ज़मीं इल्म-ओ-अमल की जिस का चर्चा था
यहीं से इल्म-ए-दीं यूनानियों ने आ के सीखा था
अहमद अज़ीमाबादी
नज़्म
सीना-ए-इल्म-ए-हक़ीक़त में पनाहें थीं तिरी
अर्श से भी और आगे जल्वा-गाहें थीं तिरी
मोहम्मद सादिक़ ज़िया
नज़्म
अन-पढ़ था और जाहिल क़ाबिल मुझे बनाया
दुनिया-ए-इल्म-ओ-दानिश का रास्ता दिखाया