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नज़्म
मगर क्या कीजिए जब फ़ैसला ये है मशिय्यत का
कि मैं फ़ितरत की आँखों से गिरूँ अश्क-ए-रवाँ हो कर
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
अहद-ए-हाज़िर में वफ़ूर-ए-जज़्बा-ए-बेताब से
सारी दुनिया को जब इक मरकज़ पे ला सकते नहीं
सरीर काबिरी
नज़्म
ये ख़याल आता है रह रह कर दिल-ए-बेताब में
बह न जाऊँ फिर तिरे नग़्मात के सैलाब में
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
तेरा ये रंगीन मंज़र इक तिलिस्म-ए-ख़्वाब है
तेरी ये शोख़ी है या इक मौजा-ए-बेताब है
साक़िब कानपुरी
नज़्म
हर इक ज़ी-रूह की नज़रों का मरकज़, मौजिब-ए-हैरत
चमकते नूरियों की शौकत-ए-बेताब का शाहिद