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नज़्म
मैं जानता हूँ कि दुनिया का ख़ौफ़ है तुम को
मुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
धर्म क्या उन का था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौन
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
आँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँ
ख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
चमन में लाला दिखाता फिरता है दाग़ अपना कली कली को
ये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
निगाहें ताक में रहती थीं लेकिन कीमिया-गर की
वो इस नुस्ख़े को बढ़ कर जानता था इस्म-ए-आज़म से