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नज़्म
कुछ जिन के लिए ग़म की मुसावात से इंसान की तामीन
कुछ ख़्वाब कि जिन का हवस-ए-जौर है आईन
नून मीम राशिद
नज़्म
कभी ग़नीम-ए-जौर-ओ-सितम के हाथों खाई ऐसी मात
अर्ज़-ए-अलम में ख़्वार हुए हम बिगड़े रहे बरसों हालात
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
हैं मुक़्तदिर तो बस अब रोक लें हुसाम-ए-जौर
ये बहती ख़ून की नदियाँ मुसीबतों का दौर
शिफ़ा कजगावन्वी
नज़्म
अभी पामाल-ए-जौर आदम को सीने से लगाना है
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
नाज़नीनों का ये आलम मादर-ए-हिन्द आह आह
किस के जौर-ए-ना-रवा ने कर दिया तुझ को तबाह?
जोश मलीहाबादी
नज़्म
वो शय दे जिस से नींद आ जाए अक़्ल-ए-फ़ित्ना-परवर को
कि दिल आज़ुर्दा-ए-तमईज़-ए-लुत्फ़-ए-जौर है साक़ी