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नज़्म
झन-झन झन-झन झन-झन बजती कौड़ी मिट्टी की
खन-खन खन-खन गीत सुनाते आने आने मिट्टी के
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
देख मिरी जाँ कह गए बाहू कौन दिलों की जाने 'हू'
बस्ती बस्ती सहरा सहरा लाखों करें दिवाने 'हू'
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं
तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब