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नज़्म
ख़स्ता-जिगर हो तुम भी हो दिल-फ़िगार तुम भी
हालत है वो हमारी हो अश्क-बार तुम भी
मास्टर बासित बिस्वानी
नज़्म
वो फ़र्त-ए-शौक़ में हँस हँस के मिल रहे हैं गले
है शाद 'जौहर'-ए-सीना-फ़िगार ईद के दिन
जौहर निज़ामी
नज़्म
पतंगों की न शम-ए-अंजुमन की आज़माइश है
दिलों का इम्तिहाँ है जान-ओ-तन की आज़माइश है
फ़ज़लुर्रहमान
नज़्म
बर्क़ की तेग़ है सितम सीना फ़िगार क्यों न हो
ज़ख़्म-ए-जिगर हरे हुए याद-ए-बहार क्यों न हो
साक़िब कानपुरी
नज़्म
जिन को दुनिया में किसी से भी सरोकार न था
अहल-ओ-ना-अहल से कुछ ख़ल्त उन्हें ज़िन्हार न था
मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा
नज़्म
न सुना मुझ को तू पैग़ाम-ए-मोहब्बत ऐ दोस्त
किस को है फ़ुर्सत-ए-तज्दीद-ए-मोहब्बत ऐ दोस्त
अब्दुल क़य्यूम ज़की औरंगाबादी
नज़्म
तुम से ये किस ने कहा है कि परेशाँ हूँ मैं
मैं ही दुनिया में असीर-ए-ग़म-ओ-आलाम नहीं