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नज़्म
ये कैफ़ियत थी और एक जोगन सितार बैठी बजा रही थी
मगर वो जंगल की शाहज़ादी बहार के गीत गा रही थी
जमील मज़हरी
नज़्म
अपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी दे
बर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी दे
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं
तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
शहर-ए-ख़ूबाँ में गँवाई है जवानी मैं ने
ख़्वाब-गाहों में जगाई है जवानी मैं ने