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नज़्म
काले कोस ग़म-ए-उल्फ़त के और मैं नान-ए-शबीना-जू
कभी चमन-ज़ारों में उलझा और कभी गंदुम की बू
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
साग़र निज़ामी
नज़्म
पत्थरों को ज़बाँ तो मिली पर तकल्लुम नहीं
पत्थरों को ख़द-ओ-ख़ाल-ए-इंसाँ मिले दौलत-ए-दर्द-ओ-ग़म कब मिली
वहीद अख़्तर
नज़्म
डूबा हुआ हूँ ख़ाल-ए-दहन की रिसर्च में
टकरा रहा हूँ साहिल-ए-बहर-ए-अदम के साथ
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
हर लाला-ए-कुहसार है शक्ल-ए-गुल-ए-राहत
दाग़ उस के हैं या ख़ाल-ए-रुख़-ए-हूर-ए-मसर्रत
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
बिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम हो
बेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मुझ से पहले कितने शा'इर आए और आ कर चले गए
कुछ आहें भर कर लौट गए कुछ नग़्मे गा कर चले गए
साहिर लुधियानवी
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
रात हँस हँस कर ये कहती है कि मय-ख़ाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लाला-रुख़ के काशाने में चल