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नज़्म
दिल शाद किया और मोह लिया ये, जौबन पाया होली ने
कुछ तबले खटके ताल बजे कुछ ढोलक और मुर्दंग बजी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
किसी का नर्म-ओ-नाज़ुक हाथ अपने हाथ में ले कर
निकल सकता हो बे-खटके कोई सैर-ए-गुलिस्ताँ को
राजेन्द्र नाथ रहबर
नज़्म
फिर साँग बहुत तय्यार हुए और ठाठ ख़ुशी के झुर मटके
ग़ुल शोर हुए ख़ुश-हाली के और नाचने गाने के खटके
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मेरी दोनों आँखों को अपने बालों से ढाँपता है
फिर अपनी पूँछ को मेरे दिल के खटके में अटका कर
फ़रहत एहसास
नज़्म
हिन्द हिन्दोस्तान वालो तुम ऐ हिन्दू मुसलमानो
तुम्ही आपस के कुल झगड़ों को बे-खटके मिटा सकते
निसार कुबरा अज़ीमाबादी
नज़्म
बिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम हो
बेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
रात हँस हँस कर ये कहती है कि मय-ख़ाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लाला-रुख़ के काशाने में चल