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नज़्म
इस बाज़ार का जो कोठा है उस की रीत निराली है
यहाँ तो माँ को माँ कह देना सब से गंदी गाली है
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
ये क़ुलक़ुल तीसरा पैग अब तो चौथा हो गुमाँ ये है
गुमाँ का मुझ से कोई ख़ास रिश्ता हो गुमाँ ये है
जौन एलिया
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
जब चार निगाहें कर के कोई महव-ए-तबस्सुम होता है
जब कोई मोहब्बत का मारा उस कैफ़ में पड़ कर खोता है
बहज़ाद लखनवी
नज़्म
सन्नाटा बाव का चलता हो तब देख बहारें जाड़े की
हर चार तरफ़ से सर्दी हो और सेहन खुला हो कोठे का