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नज़्म
वो कुलबा-ए-तारीक यूँ पुर-नूर होता जा रहा था
मैं हर इक वहम-ओ-गुमाँ से दूर होता जा रहा था
शहराम सर्मदी
नज़्म
किसी के नौजवाँ अरमान मिट्टी में मिले होंगे
किसी के कुलबा-ए-अहज़ाँ में लाखों गुल खिले होंगे
बिसमिल देहलवी
नज़्म
थी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्या
अर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्या
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
क़ज़्ज़ाक़ अजल का रस्ते में जब भाला मार गिरावेगा
धन दौलत नाती पोता क्या इक कुम्बा काम न आवेगा
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
परेशाँ हूँ मैं मुश्त-ए-ख़ाक लेकिन कुछ नहीं खुलता
सिकंदर हूँ कि आईना हूँ या गर्द-ए-कुदूरत हूँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला' देखा
सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं
गुलज़ार
नज़्म
उर्दू के तअ'ल्लुक़ से कुछ भेद नहीं खुलता
ये जश्न ये हंगामा ख़िदमत है कि साज़िश है