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नज़्म
मुझ को पूछा था मुझे ढूँडा था चारों जानिब?
उस ने इक लम्हे को देखा मुझे और फिर हँस दी
परवीन शाकिर
नज़्म
है रन ये ज़िंदगी इक रन जो बरपा लम्हा लम्हा है
हमें इस रन में कुछ भी हो किसी जानिब तो होना है
जौन एलिया
नज़्म
थे बहुत बेदर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के
थीं बहुत बे-मेहर सुब्हें मेहरबाँ रातों के बा'द
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं
मुझे मसरूर करते हैं वो लम्हे आज भी 'इरफ़ान'
इरफ़ान अहमद मीर
नज़्म
सुर्ख़ होंटों पर शरारत के किसी लम्हे का अक्स
रेशमीं बाँहों में चूड़ी की कभी मद्धम खनक
परवीन शाकिर
नज़्म
जिसे दबाने के ब'अद उस को ग़द्र कहने लगे
ये अहल-ए-हिन्द भी होते हैं किस क़दर मासूम