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नज़्म
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वो शाम है अब तक याद मुझे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
दरिंदे सर झुका देते हैं लोहा मान कर इस का
नज़र सफ़्फ़ाक-तर इस की नफ़स मकरुह-तर इस का
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ग़रज़ जवानी में अहरमन के तरब का सामान बन गया मैं
गुनह की आलाइशों में लुथड़ा हुआ इक इंसान बन गया मैं
नून मीम राशिद
नज़्म
गुलज़ार
नज़्म
लाखों टन ये लोहा कैसे आसमान में उड़ता है
बिजली कैसे जल उठती है पंखा कैसे चलता है