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नज़्म
और गुलशन-ए-नुत्क़ बर्ग-ओ-बार-ओ-समर है
कि इस महबस-ए-फ़िक्र में ख़यालों की महशर-ख़िरामी
साजिदा ज़ैदी
नज़्म
कामरान नफ़ीस
नज़्म
कामरान नफ़ीस
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तुझ से खेली हैं वो महबूब हवाएँ जिन में
उस के मल्बूस की अफ़्सुर्दा महक बाक़ी है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरें हैं
फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं