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नज़्म
हज़ारों ज़ुल्फ़-ए-परी-वश के याँ थे सौदाई
हज़ारों मय-कश-ओ-मय-ख़्वार-ओ-मस्त-ओ-सहबाई
मोहम्मद अली तिशना
नज़्म
मैं कि मय-ख़ाना-ए-उल्फ़त का पुराना मय-ख़्वार
महफ़िल-ए-हुस्न का इक मुतरिब-ए-शीरीं-गुफ़्तार
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
बैठा है बज़्म-ए-'ऐश में जमशेद की तरह
मय-ख़्वार मिल रहे हैं गले 'ईद की तरह
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
न तो मय-ख़्वार को इक क़तरा-ए-सहबा ही मिला
बदलियाँ छटने न पाई थीं कि फिर छाने लगीं
मुईन अहसन जज़्बी
नज़्म
मस्त हूँ हुब्ब-ए-वतन से कोई मय-ख़्वार नहीं
मुझ को मग़रिब की नुमाइश से सरोकार नहीं
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
समझ सकता है कौन इस राज़ को जुज़ अहल-ए-मय-ख़ाना
लिबास-ए-सुब्ह में कितनी भयानक शाम है साक़ी
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
मैं ने माना कि बहुत दर्द में डूबी है हयात
ये भी तस्लीम कि अब मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार नहीं है कोई
शम्स फ़रीदी
नज़्म
किस बला की तीरगी ऐ चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम है
कुछ पता चलता नहीं ये सुब्ह है या शाम है
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
सच्ची बातों से खड़े सरकार के होते हैं कान
धीरे धीरे बोलिए दीवार के होते हैं कान