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नज़्म
लब पर है तल्ख़ी-ए-मय-ए-अय्याम वर्ना 'फ़ैज़'
हम तल्ख़ी-ए-कलाम पे माइल ज़रा न थे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मुफ़्लिस का हाल आह बयाँ क्या करूँ मैं यार
मुफ़्लिस को इस जगह भी चबाती है मुफ़्लिसी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
इसी के बीच में है एक पेड़ पीपल का
सुना है मैं ने बुज़ुर्गों से ये कि उम्र उस की
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
ख़ुदा सोया हुआ है अहरमन महशर-ब-दामाँ है
मगर मैं अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ता ही जाता हूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
छोड़ कर आया हूँ किस मुश्किल से मैं जाम-ओ-सुबू!
आह किस दिल से किया है मैं ने ख़ून-ए-आरज़ू
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
इंसाँ जब तक बच्चा है तब तक समझो सच्चा है
जूँ-जूँ उस की उम्र बढ़े मन पर झूट का मेल चढ़े
साहिर लुधियानवी
नज़्म
आँख वक़्फ़-ए-दीद थी लब माइल-ए-गुफ़्तार था
दिल न था मेरा सरापा ज़ौक़-ए-इस्तिफ़्सार था
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
गर्म-जोशी अपनी बा-जाम-ए-चराग़ाँ लुत्फ़ से
क्या ही रौशन कर रही है हर तरफ़ रोग़न की मय
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
अपने मयख़ाने का इक मय-कश-ए-बेहाल है ये
हाँ वही मर्द-ए-जवाँ-बख़्त ओ जवाँ-साल है ये