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नज़्म
वो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंद
तेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
सौ ज़ख़्म भी खा कर मैदाँ से हटते नहीं जुरअत-मंद कभी
वो वक़्त कभी तो आएगा जब दिल के चमन लहराएँगे
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
ग़ुंचा-ए-दिल मर्द का रोज़-ए-अज़ल जब खुल चुका
जिस क़दर तक़दीर में लिक्खा हुआ था मिल चुका
जोश मलीहाबादी
नज़्म
नून मीम राशिद
नज़्म
रौशनी जिस की न होगी मांद वो मशअ'ल है तू
सर-ज़मीन-ए-हिंद का इरफ़ानी-ए-अव़्वल है तू