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नज़्म
फिर हांडा है न भांडा है न हल्वा है न मांडा है
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
रनपूर के मंदिर में हम को मस्जिद के सुतूँ मिल जाते हैं
वहदत की इसी चिंगारी से दिल मोम हुआ है पत्थर का
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
ये तिरे होंट ये रुख़्सार ये ख़ामोश नज़र
जैसे मंदर में सजे बैठे हों पत्थर के सनम
सादिक़ा फ़ातिमी
नज़्म
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं
तिरे फ़िराक़ में यूँ सुब्ह ओ शाम करते हैं