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नज़्म
जब नायक तन का निकल गया जो मुल्कों मुल्कों हांडा है
फिर हांडा है न भांडा है न हल्वा है न मांडा है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
रनपूर के मंदिर में हम को मस्जिद के सुतूँ मिल जाते हैं
वहदत की इसी चिंगारी से दिल मोम हुआ है पत्थर का
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
ये तिरे होंट ये रुख़्सार ये ख़ामोश नज़र
जैसे मंदर में सजे बैठे हों पत्थर के सनम
सादिक़ा फ़ातिमी
नज़्म
जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाह-राहों पे ग़रीबों का लहू बहता है