aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "maqaalaat"
इक बात अगर मुझ को इजाज़त हो तो पूछूँहल कर न सके जिस को हकीमों के मक़ालात
दीप जिस का महल्लात ही में जलेचंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चले
जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहींउस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृतहमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत
छोड़ा नहीं ग़ैरों ने कोई नावक-ए-दुश्नामछूटी नहीं अपनों से कोई तर्ज़-ए-मलामत
अजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गया
जी मचलता था एक एक शय परजैब ख़ाली थी कुछ मोल ले न सका
हज़ार-गूना मलामत का बार उठाए हुएहवस-परस्त निगाहों की चीरा-दस्ती से
जिब्रईलखो दिए इंकार से तू ने मक़ामात-ए-बुलंद
सब्ज़ मद्धम रौशनी में सुर्ख़ आँचल की धनकसर्द कमरे में मचलती गर्म साँसों की महक
तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहाज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते
बेवफ़ाई की घड़ी, तर्क-ए-मदारात का वक़्तइस घड़ी अपने सिवा याद न आएगा कोई
ज़माना था वो एक हैवानियत कावो दौर-ए-मलामत था शैतानियत का
ख़्वाब-दर-ख़्वाब महल्लात के दर वा हैं कईऔर मकीं कोई नहीं है,
सर सलामत है तो क्या संग-ए-मलामत की कमीजान बाक़ी है तो पैकान-ए-क़ज़ा और भी हैं
मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँतड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ
इस से पहले कि तेरी चश्म-ए-करममा'ज़रत की निगाह बन जाए
मचलते, मुस्कुराते, जागते, जज़्बात का मंज़र
हर अदा में है जवाँ आतिश-ए-जज़्बात की रौये मचलते हुए शोले ये तड़पती हुई लौ
ख़िल्क़त-ए-शहर की जानिब से मलामत का अज़ाबजिस ने अक्सर मुझे होने का यक़ीं बख़्शा था
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