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नज़्म
पस्तियाँ कर लेंगी तय सारे मक़ामात-ए-फ़राज़
ख़ाक के ज़र्रे सुरय्या तक रसा हो जाएँगे
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
मोहब्बत इब्तिदा कहते हैं लफ़्ज़-ए-वाह से जिस की
मोहब्बत इंतिहा सुनते हैं लफ़्ज़-ए-आह से जिस की