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नज़्म
जो इस आलम में चलना है तुझे हुक्म-ए-अइद्दू पर
तो इस्तेदाद-ए-दफ़ा-ए-हमला-ए-अग़्यार पैदा कर
अज़ीमुद्दीन अहमद
नज़्म
वो अपने ज़ोम में लिबरल हैं या रीडीकल हैं
मगर हैं क़ौम के हक़ में ब-सूरत-ए-अग़्यार
इस्माइल मेरठी
नज़्म
मेरे महबूब वतन तेरे मुक़द्दर के ख़ुदा
दस्त-ए-अग़्यार में क़िस्मत की इनाँ छोड़ गए
साहिर लुधियानवी
नज़्म
फूल बरसाता है अपने दोस्तों की बज़्म में
और गिराता है सफ़-ए-अग़्यार पर ये बिजलियाँ
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
ख़िदमत-ए-अग़्यार से फ़ुर्सत कोई पाता नहीं
सच है अपनों पर ग़ुलामों को तरस आता नहीं
जोश मलीहाबादी
नज़्म
तू ने कितनों को नवाज़ा है करम से अपने
मैं तो रहती हूँ यहाँ सूरत-ए-अग़्यार फ़क़त
सादिक़ा फ़ातिमी
नज़्म
तेरे दम से फिर वतन वालों में पैदा हो हयात
पंजा-ए-अग़्यार से हो हिन्द को हासिल नजात