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नज़्म
किताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी है
ये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मज्लिस-ए-मिल्लत हो या परवेज़ का दरबार हो
है वो सुल्ताँ ग़ैर की खेती पे हो जिस की नज़र
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हिक्मत-ए-मग़रिब से मिल्लत की ये कैफ़िय्यत हुई
टुकड़े टुकड़े जिस तरह सोने को कर देता है गाज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरी
ख़मोशी गुफ़्तुगू है बे-ज़बानी है ज़बाँ मेरी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ऐ शुआ-ए-अर्ज़-ए-मशरिक़ तेरी इफ़्फ़त का शिआर
कज करेगा मुल्क ओ मिल्लत की कुलाह-ए-इफ़्तिख़ार
जोश मलीहाबादी
नज़्म
इस ज़ियाँ-ख़ाने में कोई मिल्लत-ए-गर्दूं-वक़ार
रह नहीं सकती अबद तक बार-ए-दोश-ए-रोज़गार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तफ़रक़े मज़हब ओ मिल्लत के मिटाने दे मुझे
ख़्वाब-ए-फ़र्दा को बस अब हाल बनाने दे मुझे
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
रवा-दारी, उख़ुव्वत, दोस्ती, ईसार, हमदर्दी
ख़्याल-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, दर्द-ए-क़ौम, अंदेशा-ए-फ़र्दा
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
वतन का ज़र्रा ज़र्रा हम को अपनी जाँ से प्यारा है
न हम मज़हब समझते हैं न हम मिल्लत समझते हैं