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नज़्म
नूर-ए-शमा नूर
नज़्म
नूर-ए-शमा नूर
नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
आ रहा है फ़ाक़ा-कश मज़दूर के चेहरे पे रंग
खुरदुरे हाथों से अब टकरा रहे हैं जाम-ओ-संग
अख़्तर पयामी
नज़्म
कोई ख़्वाब नोक-ए-सिनाँ पे था
कोई आरज़ू तह-ए-संग थी
कोई फूल आबला आबला
कोई शाख़ मरक़द-ए-रंग थी
अहमद फ़राज़
नज़्म
मेरा वजूद
दीवार-ए-संग-ओ-आहन है
जिसे
रात भर
याजूज और माजूज
अपनी
नोकीली ज़बान से
चाटते रहते हैं
असलम आज़ाद
नज़्म
ऐ हुजूम-ए-बे-पायाँ
मैं दरीदा-पैराहन
सच है तेरी बस्ती में
नंग-ए-पारसाई हूँ
वज्ह-ए-संग-सारी हूँ!
अज़ीज़ क़ैसी
नज़्म
धूप में लहरा रही है काकुल-ए-अम्बर-सरिश्त
हो रहा है कम-सिनी का लोच जुज़्व-ए-संग-ओ-ख़िश्त