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नज़्म
मिरी मजबूरियों को भी बहुत कुछ दख़्ल है इस में
तुझी को मोरीद-ए-इल्ज़ाम मैं ठहरा नहीं सकता
गोपाल मित्तल
नज़्म
मिरी मजबूरियों को भी बहुत कुछ दख़्ल है इस में
तुझी को मोरीद-ए-इल्ज़ाम मैं ठहरा नहीं सकता
गोपाल मित्तल
नज़्म
सितम ये है कोई शीशा-गरों को कुछ नहीं कहता
मिरी ख़ारा-शिगाफ़ी मोरिद-ए-इल्ज़ाम है साक़ी
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
बहुत ही पस्त हूँ और लाएक़-ए-दुश्नाम हूँ मैं ही
ज़िना बिल-जब्र में भी मोरिद-ए-इल्ज़ाम हूँ मैं ही
ज़ेबुन्निसा ज़ेबी
नज़्म
ब-हर-उनवाँ यही इक पेशवा-ए-हुस्न-ओ-ख़ूबी है
ग़लत है एशिया में मोरिद-ए-इल्ज़ाम है उर्दू
माजिद-अल-बाक़री
नज़्म
आ रहा है फ़ाक़ा-कश मज़दूर के चेहरे पे रंग
खुरदुरे हाथों से अब टकरा रहे हैं जाम-ओ-संग
अख़्तर पयामी
नज़्म
रंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौत
मोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूद