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नज़्म
इक नई दुनिया की ख़िल्क़त है मिरी तख़्ईल में
जो मुआविन हो सके इंसान की तकमील में
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
जुदाई मोहब्बत के दरिया-ए-ख़ूँ की मुआविन नदी है
वफ़ा याद की शाख़-ए-मर्जां से लिपटी हुई है
साक़ी फ़ारुक़ी
नज़्म
मिरा कोई हमदर्द मेरा मुआविन
जो आए और आ कर मिरे सादा कतबे पे अपना भला सा कोई नाम लिख दे
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
''नाग है अपना मुआविन तो कोई बात नहीं
काम लेना है हमें नाग ख़ज़ाने पे बिठा लो अपने
मख़मूर जालंधरी
नज़्म
ता कि हरारत जौहड़ों को ख़ुश्क करने में मुआविन हो
मगर म्युनिसिपल कमेटी के दफ़्तर में
मुनीर जाफ़री
नज़्म
ता कि हरारत जौहड़ों को ख़ुश्क करने में मुआविन हो
मगर म्युनिसिपल कमेटी के दफ़्तर में
मुनीर जाफ़री
नज़्म
वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैं
शोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ये चर्ख़-ए-जब्र के दव्वार-ए-मुमकिन की है गिरवीदा
लड़ाई के लिए मैदान और लश्कर नहीं लाज़िम