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नज़्म
''मीरा-जी को मानने वाले कम हैं लेकिन हम भी हैं
'फ़ैज़' की बात बड़ी है फिर भी अब वैसा कौन आएगा''
जमीलुद्दीन आली
नज़्म
जाने क्यूँ मेरे गुल-अंदाम मुरब्बी मुझे छूने पे रज़ा-मंद नहीं हैं
जाने क्यूँ मेरे गुल-अंदाम को डर है
ख़ालिद अहमद
नज़्म
ये सरगोशियाँ कह रही हैं अब आओ कि बरसों से तुम को बुलाते बुलाते मिरे
दिल पे गहरी थकन छा रही है
मीराजी
नज़्म
तेरी निगाह-ए-नाज़ से दोनों मुराद पा गए
अक़्ल, ग़याब ओ जुस्तुजू! इश्क़, हुज़ूर ओ इज़्तिराब!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
फिर इसी तरह जहाँ होगा मुक़ाबिल पैहम
साया-ए-ज़ुल्फ़ का और जुम्बिश-ए-बाज़ू का सफ़र
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मैं धीरे धीरे दफ़्तर में अपने दिल को ले जाता हूँ
नादान है दिल मूरख बच्चा इक और तरह दे जाता हूँ
मीराजी
नज़्म
मैं भी नाकाम-ए-वफ़ा था तो भी महरूम-ए-मुराद
हम ये समझे थे कि दर्द-ए-मुश्तरक रास आ गया
अहमद फ़राज़
नज़्म
दिन ढला ख़ौफ़ का इफ़रीत मुक़ाबिल आया
या ख़ुदा ये मिरी गर्दान-ए-शब-ओ-रोज़-ओ-सहर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
बाद-ए-मुराद ओ चश्मक-ए-तूफ़ाँ लिए हुए
हूँ बू-ए-ज़ुल्फ़-ओ-जुंबिश-ए-मिज़्गाँ लिए हुए