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नज़्म
कभी अपना ही नग़्मा उन का कह कर मुस्कुराना है
वो ख़ामा-सोज़ी शब-बेदारियों का जो नतीजा हो
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
तिफ़्ल-ए-बाराँ ताजदार-ए-ख़ाक अमीर-ए-बोस्ताँ
माहिर-ए-आईन-ए-क़ुदरत नाज़िम-ए-बज़्म-ए-जहाँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
जब अज़्म-ओ-अमल अच्छा होगा अच्छा ही नतीजा भी होगा
हम लोग यहाँ हलवा खा कर इक शम्अ' जलाए बैठे हैं
शौकत परदेसी
नज़्म
बे-इल्म-ओ-बे-हुनर है जो दुनिया में कोई क़ौम
नेचर का इक़तिज़ा है रहे बन के वो ग़ुलाम