aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "nirjhar"
सुना है हो भी चुका है फ़िराक़-ए-ज़ुल्मत-ओ-नूरसुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गामबदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूरनशात-ए-वस्ल हलाल ओ अज़ाब-ए-हिज्र हरामजिगर की आग नज़र की उमंग दिल की जलनकिसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहींकहाँ से आई निगार-ए-सबा किधर को गईअभी चराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहींअभी गिरानी-ए-शब में कमी नहीं आईनजात-ए-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आईचले-चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
हवा भी ख़ुश-गवार हैगुलों पे भी निखार हैतरन्नुम-ए-हज़ार हैबहार पुर-बहार हैकहाँ चला है साक़ियाइधर तो लौट इधर तो आअरे ये देखता है क्याउठा सुबू सुबू उठासुबू उठा प्याला भरप्याला भर के दे इधरचमन की सम्त कर नज़रसमाँ तो देख बे-ख़बरवो काली काली बदलियाँउफ़ुक़ पे हो गईं अयाँवो इक हुजूम-ए-मय-कशाँहै सू-ए-मय-कदा रवाँये क्या गुमाँ है बद-गुमाँसमझ न मुझ को ना-तवाँख़याल-ए-ज़ोहद अभी कहाँअभी तो मैं जवान हूँइबादतों का ज़िक्र हैनजात की भी फ़िक्र हैजुनून है सवाब काख़याल है अज़ाब कामगर सुनो तो शैख़ जीअजीब शय हैं आप भीभला शबाब ओ आशिक़ीअलग हुए भी हैं कभीहसीन जल्वा-रेज़ होंअदाएँ फ़ित्ना-ख़ेज़ होंहवाएँ इत्र-बेज़ होंतो शौक़ क्यूँ न तेज़ होंनिगार-हा-ए-फ़ित्नागरकोई इधर कोई उधरउभारते हों ऐश परतो क्या करे कोई बशरचलो जी क़िस्सा-मुख़्तसरतुम्हारा नुक़्ता-ए-नज़रदुरुस्त है तो हो मगरअभी तो मैं जवान हूँये गश्त कोहसार कीये सैर जू-ए-बार कीये बुलबुलों के चहचहेये गुल-रुख़ों के क़हक़हेकिसी से मेल हो गयातो रंज ओ फ़िक्र खो गयाकभी जो बख़्त सो गयाये हँस गया वो रो गयाये इश्क़ की कहानियाँये रस भरी जवानियाँउधर से मेहरबानियाँइधर से लन-तरानियाँये आसमान ये ज़मींनज़ारा-हा-ए-दिल-नशींइन्हें हयात-आफ़रींभला मैं छोड़ दूँ यहींहै मौत इस क़दर क़रींमुझे न आएगा यक़ींनहीं नहीं अभी नहींअभी तो मैं जवान हूँन ग़म कुशूद ओ बस्त काबुलंद का न पस्त कान बूद का न हस्त कान वादा-ए-अलस्त काउम्मीद और यास गुमहवास गुम क़यास गुमनज़र से आस पास गुमहमा-बजुज़ गिलास गुमन मय में कुछ कमी रहेक़दह से हमदमी रहेनशिस्त ये जमी रहेयही हमा-हामी रहेवो राग छेड़ मुतरिबातरब-फ़ज़ा, अलम-रुबाअसर सदा-ए-साज़ काजिगर में आग दे लगाहर एक लब पे हो सदान हाथ रोक साक़ियापिलाए जा पिलाए जाअभी तो मैं जवान हूँ
तुम आज हज़ारों मील यहाँ से दूर कहीं तन्हाई मेंया बज़्म-ए-तरब-आराई मेंमेरे सपने बुनती होंगी बैठी आग़ोश पराई मेंऔर मैं सीने में ग़म ले कर दिन-रात मशक़्क़त करता हूँजीने की ख़ातिर मरता हूँअपने फ़न को रुस्वा कर के अग़्यार का दामन भरता हूँमजबूर हूँ मैं मजबूर हो तुम मजबूर ये दुनिया सारी हैतन का दुख मन पर भारी हैइस दौर में जीने की क़ीमत या दार-ओ-रसन या ख़्वारी हैमैं दार-ओ-रसन तक जा न सका तुम जेहद की हद तक आ न सकींचाहा तो मगर अपना न सकींहम तो दो ऐसी रूहें हैं जो मंज़िल-ए-तस्कीं पा न सकेंजीने को जिए जाते हैं मगर साँसों में चिताएँ जलती हैंख़ामोश वफ़ाएँ जलती हैंसंगीन हक़ाइक़-ज़ारों में ख़्वाबों की रिदाएँ जलती हैंऔर आज जब इन पेड़ों के तले फिर दो साए लहराए हैंफिर दो दिल मिलने आए हैंफिर मौत की आँधी उट्ठी है फिर जंग के बादल छाए हैंमैं सोच रहा हूँ इन का भी अपनी ही तरह अंजाम न होइन का भी जुनूँ नाकाम न होइन के भी मुक़द्दर में लिखी इक ख़ून में लिथड़ी शाम न होसूरज के लहू में लिथड़ी हुई वो शाम है अब तक याद मुझेचाहत के सुनहरे ख़्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझेहमारा प्यार हवादिस की ताब ला न सकामगर उन्हें तो मुरादों की रात मिल जाएहमें तो कश्मकश-ए-मर्ग-ए-बे-अमाँ ही मिलीउन्हें तो झूमती गाती हयात मिल जाएबहुत दिनों से है ये मश्ग़ला सियासत काकि जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जाएँबहुत दिनों से ये है ख़ब्त हुक्मरानों काकि दूर दूर के मुल्कों में क़हत बो जाएँबहुत दिनों से जवानी के ख़्वाब वीराँ हैंबहुत दिनों से सितम-दीदा शाह-राहों मेंनिगार-ए-ज़ीस्त की इस्मत पनाह ढूँढती हैचलो कि आज सभी पाएमाल रूहों सेकहें कि अपने हर इक ज़ख़्म को ज़बाँ कर लेंहमारा राज़ हमारा नहीं सभी का हैचलो कि सारे ज़माने को राज़-दाँ कर लेंचलो कि चल के सियासी मुक़ामिरों से कहेंकि हम को जंग-ओ-जदल के चलन से नफ़रत हैजिसे लहू के सिवा कोई रंग रास न आएहमें हयात के उस पैरहन से नफ़रत हैकहो कि अब कोई क़ातिल अगर इधर आयातो हर क़दम पे ज़मीं तंग होती जाएगीहर एक मौज-ए-हवा रुख़ बदल के झपटेगीहर एक शाख़ रग-ए-संग होती जाएगीउठो कि आज हर इक जंग-जू से ये कह देंकि हम को काम की ख़ातिर कलों की हाजत हैहमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक़ नहींहमें तो अपनी ज़मीं पर हलों की हाजत हैकहो कि अब कोई ताजिर इधर का रुख़ न करेअब इस जगह कोई कुँवारी न बेची जाएगीये खेत जाग पड़े उठ खड़ी हुईं फ़स्लेंअब इस जगह कोई क्यारी न बेची जाएगीये सर-ज़मीन है गौतम की और नानक कीइस अर्ज़-ए-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभीहमारा ख़ून अमानत है नस्ल-ए-नौ के लिएहमारे ख़ून पे लश्कर न पल सकेंगे कभीकहो कि आज भी हम सब अगर ख़मोश रहेतो इस दमकते हुए ख़ाक-दाँ की ख़ैर नहींजुनूँ की ढाली हुई एटमी बलाओं सेज़मीं की ख़ैर नहीं आसमाँ की ख़ैर नहींगुज़िश्ता जंग में घर ही जले मगर इस बारअजब नहीं कि ये तन्हाइयाँ भी जल जाएँगुज़िश्ता जंग में पैकर जले मगर इस बारअजब नहीं कि ये परछाइयाँ भी जल जाएँतसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
आइए अर्ज़ गुज़ारें कि निगार-ए-हस्तीज़हर-ए-इमरोज़ में शीरीनी-ए-फ़र्दा भर देवो जिन्हें ताब-ए-गिराँ-बारी-ए-अय्याम नहींउन की पलकों पे शब ओ रोज़ को हल्का कर दे
इबलीसये अनासिर का पुराना खेल ये दुनिया-ए-दूँसाकिनान-ए-अर्श-ए-आज़म की तमन्नाओं का ख़ूँइस की बर्बादी पे आज आमादा है वो कारसाज़जिस ने इस का नाम रखा था जहान-ए-काफ़-अो-नूँमैं ने दिखलाया फ़रंगी को मुलूकियत का ख़्वाबमैं ने तोड़ा मस्जिद-ओ-दैर-ओ-कलीसा का फ़ुसूँमैं ने नादारों को सिखलाया सबक़ तक़दीर कामैं ने मुनइ'म को दिया सरमाया दारी का जुनूँकौन कर सकता है इस की आतिश-ए-सोज़ाँ को सर्दजिस के हंगामों में हो इबलीस का सोज़-ए-दरूँजिस की शाख़ें हों हमारी आबियारी से बुलंदकौन कर सकता है इस नख़्ल-ए-कुहन को सर-निगूँपहला मुशीरइस में क्या शक है कि मोहकम है ये इबलीसी निज़ामपुख़्ता-तर इस से हुए ख़ू-ए-ग़ुलामी में अवामहै अज़ल से इन ग़रीबों के मुक़द्दर में सुजूदइन की फ़ितरत का तक़ाज़ा है नमाज़-ए-बे-क़यामआरज़ू अव्वल तो पैदा हो नहीं सकती कहींहो कहीं पैदा तो मर जाती है या रहती है ख़ामये हमारी सई-ए-पैहम की करामत है कि आजसूफ़ी-ओ-मुल्ला मुलूकिय्यत के बंदे हैं तमामतब-ए-मशरिक़ के लिए मौज़ूँ यही अफ़यून थीवर्ना क़व्वाली से कुछ कम-तर नहीं इल्म-ए-कलामहै तवाफ़-ओ-हज का हंगामा अगर बाक़ी तो क्याकुंद हो कर रह गई मोमिन की तेग़-ए-बे-नियामकिस की नौ-मीदी पे हुज्जत है ये फ़रमान-ए-जदीदहै जिहाद इस दौर में मर्द-ए-मुसलमाँ पर हरामदूसरा मुशीरख़ैर है सुल्तानी-ए-जम्हूर का ग़ौग़ा कि शरतू जहाँ के ताज़ा फ़ित्नों से नहीं है बा-ख़बरपहला मुशीरहूँ मगर मेरी जहाँ-बीनी बताती है मुझेजो मुलूकियत का इक पर्दा हो क्या इस से ख़तरहम ने ख़ुद शाही को पहनाया है जमहूरी लिबासजब ज़रा आदम हुआ है ख़ुद-शनास-ओ-ख़ुद-निगरकारोबार-ए-शहरयारी की हक़ीक़त और हैये वजूद-ए-मीर-ओ-सुल्ताँ पर नहीं है मुनहसिरमज्लिस-ए-मिल्लत हो या परवेज़ का दरबार होहै वो सुल्ताँ ग़ैर की खेती पे हो जिस की नज़रतू ने क्या देखा नहीं मग़रिब का जमहूरी निज़ामचेहरा रौशन अंदरूँ चंगेज़ से तारीक-तरतीसरा मुशीररूह-ए-सुल्तानी रहे बाक़ी तो फिर क्या इज़्तिराबहै मगर क्या इस यहूदी की शरारत का जवाबवो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीबनीस्त पैग़मबर व-लेकिन दर बग़ल दारद किताबक्या बताऊँ क्या है काफ़िर की निगाह-ए-पर्दा-सोज़मश्रिक-ओ-मग़रिब की क़ौमों के लिए रोज़-ए-हिसाबइस से बढ़ कर और क्या होगा तबीअ'त का फ़सादतोड़ दी बंदों ने आक़ाओं के ख़ेमों की तनाबचौथा मुशीरतोड़ इस का रुमत-उल-कुबरा के ऐवानों में देखआल-ए-सीज़र को दिखाया हम ने फिर सीज़र का ख़्वाबकौन बहर-ए-रुम की मौजों से है लिपटा हुआगाह बालद-चूँ-सनोबर गाह नालद-चूँ-रुबाबतीसरा मुशीरमैं तो इस की आक़िबत-बीनी का कुछ क़ाइल नहींजिस ने अफ़रंगी सियासत को क्या यूँ बे-हिजाबपाँचवाँ मुशीर इबलीस को मुख़ातब कर केऐ तिरे सोज़-ए-नफ़स से कार-ए-आलम उस्तुवारतू ने जब चाहा किया हर पर्दगी को आश्कारआब-ओ-गिल तेरी हरारत से जहान-ए-सोज़-अो-साज़़अब्लह-ए-जन्नत तिरी तालीम से दाना-ए-कारतुझ से बढ़ कर फ़ितरत-ए-आदम का वो महरम नहींसादा-दिल बंदों में जो मशहूर है पर्वरदिगारकाम था जिन का फ़क़त तक़्दीस-ओ-तस्बीह-ओ-तवाफ़तेरी ग़ैरत से अबद तक सर-निगूँ-ओ-शर्मसारगरचे हैं तेरे मुरीद अफ़रंग के साहिर तमामअब मुझे उन की फ़रासत पर नहीं है ए'तिबारवो यहूदी फ़ित्ना-गर वो रूह-ए-मज़दक का बुरूज़हर क़बा होने को है इस के जुनूँ से तार तारज़ाग़ दश्ती हो रहा है हम-सर-ए-शाहीन-अो-चर्ग़कितनी सुरअ'त से बदलता है मिज़ाज-ए-रोज़गारछा गई आशुफ़्ता हो कर वुसअ'त-ए-अफ़्लाक परजिस को नादानी से हम समझे थे इक मुश्त-ए-ग़ुबारफ़ितना-ए-फ़र्दा की हैबत का ये आलम है कि आजकाँपते हैं कोहसार-ओ-मुर्ग़-ज़ार-ओ-जूएबारमेरे आक़ा वो जहाँ ज़ेर-ओ-ज़बर होने को हैजिस जहाँ का है फ़क़त तेरी सियादत पर मदार
क्या सुनाता है मुझे turk-o-arab की दास्ताँमुझ से कुछ पिन्हाँ नहीं इस्लामियों का सोज़-ओ-साज़ले गए तसलीस के फ़रज़ंद मीरास-ए-ख़लीलख़िश्त-ए-बुनियाद-ए-कलीसा बन गई ख़ाक-ए-हिजाज़हो गई रुस्वा ज़माने में कुलाह-ए-लाला-रंगजो सरापा नाज़ थे हैं आज मजबूर-ए-नियाज़ले रहा है मय-फ़रोशान-ए-फ़रंगिस्तान से पार्सवो मय-ए-सरकश हरारत जिस की है मीना-गुदाज़हिक्मत-ए-मग़रिब से मिल्लत की ये कैफ़िय्यत हुईटुकड़े टुकड़े जिस तरह सोने को कर देता है गाज़हो गया मानिंद-ए-आब अर्ज़ां मुसलमाँ का लहूमुज़्तरिब है तू कि तेरा दिल नहीं दाना-ए-राज़गुफ़्त रूमी हर बना-ए-कुहना कि-आबादाँ कुनंदमी न-दानी अव्वल आँ बुनियाद रा वीराँ कुनंदमुल्क हाथों से गया मिल्लत की आँखें खुल गईंहक़ तिरा चश्मे 'अता कर दस्त-ए-ग़ाफ़िल दर निगरमोम्याई की गदाई से तो बेहतर है शिकस्तमोर-ए-बे-पर हाजते पेश-ए-सुलैमाने मबररब्त-ओ-ज़ब्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा है मशरिक़ की नजातएशिया वाले हैं इस नुक्ते से अब तक बे-ख़बरफिर सियासत छोड़ कर दाख़िल हिसार-ए-दीं में होमुल्क-ओ-दौलत है फ़क़त हिफ्ज़-ए-हरम का इक समरएक हूँ मुस्लिम हरम की पासबानी के लिएनील के साहिल से ले कर ता-ब-ख़ाक-ए-काश्ग़रजो करेगा इम्तियाज़-ए-रंग-ओ-ख़ूँ मिट जाएगातुर्क-ए-ख़र्गाही हो या आराबी-ए-वाला-गुहरनस्ल अगर मुस्लिम की मज़हब पर मुक़द्दम हो गईउड़ गया दुनिया से तू मानिंद-ए-ख़ाक-ए-रह-गुज़रता-ख़िलाफ़त की बिना दुनिया में हो फिर उस्तुवारला कहीं से ढूँढ़ कर अस्लाफ़ का क़ल्ब-ओ-जिगरऐ कि न-शिनासी ख़फ़ी रा अज़ जली हुशियार बाशऐ गिरफ़्तार-ए-अबु-बकर-ओ-अली हुशियार-बाश'इश्क़ को फ़रियाद लाज़िम थी सो वो भी हो चुकीअब ज़रा दिल थाम कर फ़रियाद की तासीर देखतू ने देखा सतवत-ए-रफ़्तार-ए-दरिया का 'उरूजमौज-ए-मुज़्तर किस तरह बनती है अब ज़ंजीर देख'आम हुर्रियत का जो देखा था ख़्वाब इस्लाम नेऐ मुसलमाँ आज तू उस ख़्वाब की ता'बीर देखअपनी ख़ाकिस्तर समुंदर को है सामान-ए-वजूदमर के फिर होता है पैदा ये जहान-ए-पीर देखखोल कर आँखें मिरे आईना-ए-गुफ़्तार मेंआने वाले दौर की धुँदली सी इक तस्वीर देखआज़मूदा फ़ित्ना है इक और भी गर्दूं के पाससामने तक़दीर के रुस्वाई-ए-तदबीर देखमुस्लिम अस्ती सीना रा अज़ आरज़ू-आबाद दारहर ज़माँ पेश-ए-नज़र ला-युख़लिफ-उल-मीआद दार
निगार-ए-ख़ाक-आसूदाबहार-ए-ख़ाक-आसूदा
बहार आई तो जैसे यक-बारलौट आए हैं फिर अदम सेवो ख़्वाब सारे शबाब सारेजो तेरे होंटों पे मर-मिटे थेजो मिट के हर बार फिर जिए थेनिखर गए हैं गुलाब सारेजो तेरी यादों से मुश्कबू हैंजो तेरे उश्शाक़ का लहू हैंउबल पड़े हैं अज़ाब सारेमलाल-ए-अहवाल-ए-दोस्ताँ भीख़ुमार-ए-आग़ोश-ए-मह-वशां भीग़ुबार-ए-ख़ातिर के बाब सारेतिरे हमारेसवाल सारे जवाब सारेबहार आई तो खुल गए हैंनए सिरे से हिसाब सारे
शाम के पेच-ओ-ख़म सितारों सेज़ीना ज़ीना उतर रही है रातयूँ सबा पास से गुज़रती हैजैसे कह दी किसी ने प्यार की बातसेहन-ए-ज़िंदाँ के बे-वतन अश्जारसर-निगूँ महव हैं बनाने मेंदामन-ए-आसमाँ पे नक़्श-ओ-निगारशाना-ए-बाम पर दमकता हैमेहरबाँ चाँदनी का दस्त-ए-जमीलख़ाक में घुल गई है आब-ए-नुजूमनूर में घुल गया है अर्श का नीलसब्ज़ गोशों में नील-गूँ साएलहलहाते हैं जिस तरह दिल मेंमौज-ए-दर्द-ए-फ़िराक़-ए-यार आए
फ़रिश्ते पढ़ते हैं जिस को वो नाम है तेराबड़ी जनाब तिरी फ़ैज़ आम है तेरासितारे इश्क़ के तेरी कशिश से हैं क़ाएमनिज़ाम-ए-मेहर की सूरत निज़ाम है तेरातिरी लहद की ज़ियारत है ज़िंदगी दिल कीमसीह ओ ख़िज़्र से ऊँचा मक़ाम है तेरानिहाँ है तेरी मोहब्बत में रंग-ए-महबूबीबड़ी है शान बड़ा एहतिराम है तेराअगर सियाह दिलम दाग़-ए-लाला-ज़ार-ए-तवामदिगर कुशादा जबीनम गुल-ए-बहार-ए-तवामचमन को छोड़ के निकला हूँ मिस्ल-ए-निकहत-ए-गुलहुआ है सब्र का मंज़ूर इम्तिहाँ मुझ कोचली है ले के वतन के निगार-ख़ाने सेशराब-ए-इल्म की लज़्ज़त कशाँ कशाँ मुझ कोनज़र है अब्र-ए-करम पर दरख़्त-ए-सहरा हूँकिया ख़ुदा ने न मोहताज-ए-बाग़बाँ मुझ कोफ़लक-नशीं सिफ़त-ए-मेहर हूँ ज़माने मेंतिरी दुआ से अता हो वो नर्दबाँ मुझ कोमक़ाम हम-सफ़रों से हो इस क़दर आगेकि समझे मंज़िल-ए-मक़्सूद कारवाँ मुझ कोमिरी ज़बान-ए-क़लम से किसी का दिल न दुखेकिसी से शिकवा न हो ज़ेर-ए-आसमाँ मुझ कोदिलों को चाक करे मिस्ल-ए-शाना जिस का असरतिरी जनाब से ऐसी मिले फ़ुग़ाँ मुझ कोबनाया था जिसे चुन चुन के ख़ार ओ ख़स मैं नेचमन में फिर नज़र आए वो आशियाँ मुझ कोफिर आ रखूँ क़दम-ए-मादर-ओ-पिदर पे जबींकिया जिन्हों ने मोहब्बत का राज़-दाँ मुझ कोवो शम-ए-बारगह-ए-ख़ानदान-ए-मुर्तज़वीरहेगा मिस्ल-ए-हरम जिस का आस्ताँ मुझ कोनफ़स से जिस के खिली मेरी आरज़ू की कलीबनाया जिस की मुरव्वत ने नुक्ता-दाँ मुझ कोदुआ ये कर कि ख़ुदावंद-ए-आसमान-ओ-ज़मींकरे फिर उस की ज़ियारत से शादमाँ मुझ कोवो मेरा यूसुफ़-ए-सानी वो शम-ए-महफ़िल-ए-इश्क़हुई है जिस की उख़ुव्वत क़रार-ए-जाँ मुझ कोजला के जिस की मोहब्बत ने दफ़्तर-ए-मन-ओ-तूहवा-ए-ऐश में पाला किया जवाँ मुझ कोरियाज़-ए-दहर में मानिंद-ए-गुल रहे ख़ंदाँकि है अज़ीज़-तर अज़-जाँ वो जान-ए-जाँ मुझ कोशगुफ़्ता हो के कली दिल की फूल हो जाएये इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर क़ुबूल हो जाए
सलाम लिखता है शाएर तुम्हारे हुस्न के नामबिखर गया जो कभी रंग-ए-पैरहन सर-ए-बामनिखर गई है कभी सुब्ह दोपहर कभी शामकहीं जो क़ामत-ए-ज़ेबा पे सज गई है क़बाचमन में सर्व-ओ-सनोबर सँवर गए हैं तमामबनी बिसात-ए-ग़ज़ल जब डुबो लिए दिल नेतुम्हारे साया-ए-रुख़सार-ओ-लब में साग़र-ओ-जामसलाम लिखता है शाएर तुम्हारे हुस्न के नामतुम्हारे हाथ पे है ताबिश-ए-हिना जब तकजहाँ में बाक़ी है दिलदारी-ए-उरूस-ए-सुख़नतुम्हारा हुस्न जवाँ है तो मेहरबाँ है फ़लकतुम्हारा दम है तो दम-साज़ है हवा-ए-वतनअगरचे तंग हैं औक़ात सख़्त हैं आलामतुम्हारी याद से शीरीं है तल्ख़ी-ए-अय्यामसलाम लिखता है शाएर तुम्हारे हुस्न के नाम
ये तेरी झील सी आँखों में रतजगों के भँवरये तेरे फूल से चेहरे पे चाँदनी की फुवारये तेरे लब ये दयार-ए-यमन के सुर्ख़ अक़ीक़ये आईने सी जबीं सज्दा-गाह-ए-लैल-ओ-निहार
जादू है तेरी सौत का गुल पर हज़ार परजैसे नसीम-ए-सुब्ह की रौ जू-ए-बार परनाख़ुन किसी निगार का चाँदी के तार परमिज़राब-ए-अक्स-ए-क़ौस रग-ए-आबशार परमौजें सबा की बाग़ पे सहबा छिड़क गईंजुम्बिश हुई लबों को तो कलियाँ चटक गईं
चाँदनी खुल के निखर आई है दरवाज़े परओस से भीगते जाते हैं पुराने गमलेकिस क़दर नर्म है कलियों का सुहाना सायाजैसे वो होंट जिन्हें पा के भी मैं पा न सकाऐ तड़पते हुए दिल और सँभल और सँभलये तिरी चाप से जाग उट्ठेंगी तो क्या होगा
अण्डा खाने से लहू जिस्म में बढ़ जाता हैचुस्त होता है बदन ज़ेहन निखर जाता है
ये कैसी बाद-ए-बहार है जिस में शाख़-ए-उर्दू न फल सकेगीवो कैसा रू-ए-निगार होगा न ज़ुल्फ़ जिस पर मचल सकेगीहमें वो आज़ादी चाहिए जिस में दिल की मीना उबल सकेगी
चमन से चंद ही काँटे मैं चुन सका लेकिनबड़ी है बात जो तुम रंग-ए-गुल निखार सकोये दूर दौर-ए-जहाँ काश तुम को रास आएतुम इस ज़मीन को कुछ और भी सँवार सकोअमल तुम्हारा ये तौफ़ीक़ दे सके तुम कोकि ज़िंदगी का हर इक क़र्ज़ तुम उतार सको
वो नौ-ख़ेज़ नूरा वो इक बिन्त-ए-मरियमवो मख़मूर आँखें वो गेसू-ए-पुर-ख़मवो अर्ज़-ए-कलीसा की इक माह-पारावो दैर-ओ-हरम के लिए इक शरारावो फ़िरदौस-ए-मरियम का इक ग़ुंचा-ए-तरवो तसलीस की दुख़्तर-ए-नेक-अख़्तरवो इक नर्स थी चारा-गर जिस को कहिएमदावा-ए-दर्द-ए-जिगर जिस को कहिएजवानी से तिफ़्ली गले मिल रही थीहवा चल रही थी कली खिल रही थीवो पुर-रोब तेवर वो शादाब चेहरामता-ए-जवानी पे फ़ितरत का पहरामिरी हुक्मरानी है अहल-ए-ज़मीं परये तहरीर था साफ़ उस की जबीं परसफ़ेद और शफ़्फ़ाफ़ कपड़े पहन करमिरे पास आती थी इक हूर बन करवो इक आसमानी फ़रिश्ता थी गोयाकि अंदाज़ था उस में जिब्रईल का सावो इक मरमरीं हूर ख़ुल्द-ए-बरीं कीवो ताबीर आज़र के ख़्वाब-ए-हसीं कीवो तस्कीन-ए-दिल थी सुकून-ए-नज़र थीनिगार-ए-शफ़क़ थी जमाल-ए-नज़र थीवो शो'ला वो बिजली वो जल्वा वो परतवसुलैमाँ की वो इक कनीज़-ए-सुबुक-रौकभी उस की शोख़ी में संजीदगी थीकभी उस की संजीदगी में भी शोख़ीघड़ी चुप घड़ी करने लगती थी बातेंसिरहाने मिरे काट देती थी रातेंअजब चीज़ थी वो अजब राज़ थी वोकभी सोज़ थी वो कभी साज़ थी वोनक़ाहत के आलम में जब आँख उठतीनज़र मुझ को आती मोहब्बत की देवीवो उस वक़्त इक पैकर-ए-नूर होतीतख़य्युल की पर्वाज़ से दूर होतीहंसाती थी मुझ को सुलाती थी मुझ कोदवा अपने हाथों से मुझ को पिलातीअब अच्छे हो हर रोज़ मुज़्दा सुनातीसिरहाने मिरे एक दिन सर झुकाएवो बैठी थी तकिए पे कुहनी टिकाएख़यालात-ए-पैहम में खोई हुई सीन जागी हुई सी न सोई हुई सीझपकती हुई बार बार उस की पलकेंजबीं पर शिकन बे-क़रार उस की पलकेंवो आँखों के साग़र छलकते हुए सेवो आरिज़ के शोले भड़कते हुए सेलबों में था लाल-ओ-गुहर का ख़ज़ानानज़र आरिफ़ाना अदा राहिबानामहक गेसुओं से चली आ रही थीमिरे हर नफ़स में बसी जा रही थीमुझे लेटे लेटे शरारत की सूझीजो सूझी भी तो किस क़यामत की सूझीज़रा बढ़ के कुछ और गर्दन झुका लीलब-ए-लाल-ए-अफ़्शाँ से इक शय चुरा लीवो शय जिस को अब क्या कहूँ क्या समझिएबेहिश्त-ए-जवानी का तोहफ़ा समझिएशराब-ए-मोहब्बत का इक जाम-ए-रंगींसुबू-ज़ार-ए-फ़ितरत का इक जाम-ए-रंगींमैं समझा था शायद बिगड़ जाएगी वोहवाओं से लड़ती है लड़ जाएगी वोमैं देखूँगा उस के बिफरने का आलमजवानी का ग़ुस्सा बिखरने का आलमइधर दिल में इक शोर-ए-महशर बपा थामगर उस तरफ़ रंग ही दूसरा थाहँसी और हँसी इस तरह खिलखिला करकि शम-ए-हया रह गई झिलमिला करनहीं जानती है मिरा नाम तक वोमगर भेज देती है पैग़ाम तक वोये पैग़ाम आते ही रहते हैं अक्सरकि किस रोज़ आओगे बीमार हो कर
जिगर-दरीदा हूँ चाक-ए-जिगर की बात सुनोअलम-रसीदा हूँ दामान-ए-तर की बात सुनोज़बाँ-बुरीदा हूँ ज़ख़्म-ए-गुलू से हर्फ़ करोशिकस्ता-पा हूँ मलाल-ए-सफ़र की बात सुनोमुसाफ़िर-ए-रह-ए-सहरा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब सेअब इल्तिफ़ात-ए-निगार-ए-सहर की बात सुनोसहर की बात उमीद-ए-सहर की बात सुनो
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books