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नज़्म
हमारे ज़ेहन की इस अर्श-पैमाई के क्या कहने
हम अपने ज़ेहन के बारे में जब भी सोचते हैं
तहसीन फ़िराक़ी
नज़्म
शहाब जाफ़री
नज़्म
दिल में इक शोला भड़क उट्ठा है आख़िर क्या करूँ
मेरा पैमाना छलक उट्ठा है आख़िर क्या करूँ