aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "parnaa"
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तश्हीर-ए-वफ़ातू ने सतवत के निशानों को तो देखा होता
'हसन' नामी हमारे घर में इक 'सुक़रात' गुज़रा हैवो अपनी नफ़्इ से इसबात तक माशर के पहुँचा हैकि ख़ून-ए-रायगाँ के अम्र में पड़ना नहीं हम कोवो सूद-ए-हाल से यकसर ज़ियाँ-काराना गुज़रा हैतलब थी ख़ून की क़य की उसे और बे-निहायत थीसो फ़ौरन बिन्त-ए-अशअश का पिलाया पी गया होगावो इक लम्हे के अंदर सरमदिय्यत जी गया होगा
ऐ इश्क़ ख़ुदारा देख कहीं वो शोख़-ए-हज़ीं बद-नाम न होवो माह-लक़ा बद-नाम न हो वो ज़ोहरा-जबीं बद-नाम न होनामूस का उस के पास रहे वो पर्दा-नशीं बद-नाम न हो
हर बात की खोज तो ठीक नहीं तुम हम को कहानी कहने दोउस नार का नाम मक़ाम है क्या इस बात पे पर्दा रहने दोहम से भी तो सौदा मुमकिन है तुम से भी जफ़ा हो सकती हैये अपना बयाँ हो सकता है ये अपनी कथा हो हो सकती हैवो नार भी आख़िर पछताई किस काम का ऐसा पछताना?इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
इबलीसये अनासिर का पुराना खेल ये दुनिया-ए-दूँसाकिनान-ए-अर्श-ए-आज़म की तमन्नाओं का ख़ूँइस की बर्बादी पे आज आमादा है वो कारसाज़जिस ने इस का नाम रखा था जहान-ए-काफ़-अो-नूँमैं ने दिखलाया फ़रंगी को मुलूकियत का ख़्वाबमैं ने तोड़ा मस्जिद-ओ-दैर-ओ-कलीसा का फ़ुसूँमैं ने नादारों को सिखलाया सबक़ तक़दीर कामैं ने मुनइ'म को दिया सरमाया दारी का जुनूँकौन कर सकता है इस की आतिश-ए-सोज़ाँ को सर्दजिस के हंगामों में हो इबलीस का सोज़-ए-दरूँजिस की शाख़ें हों हमारी आबियारी से बुलंदकौन कर सकता है इस नख़्ल-ए-कुहन को सर-निगूँपहला मुशीरइस में क्या शक है कि मोहकम है ये इबलीसी निज़ामपुख़्ता-तर इस से हुए ख़ू-ए-ग़ुलामी में अवामहै अज़ल से इन ग़रीबों के मुक़द्दर में सुजूदइन की फ़ितरत का तक़ाज़ा है नमाज़-ए-बे-क़यामआरज़ू अव्वल तो पैदा हो नहीं सकती कहींहो कहीं पैदा तो मर जाती है या रहती है ख़ामये हमारी सई-ए-पैहम की करामत है कि आजसूफ़ी-ओ-मुल्ला मुलूकिय्यत के बंदे हैं तमामतब-ए-मशरिक़ के लिए मौज़ूँ यही अफ़यून थीवर्ना क़व्वाली से कुछ कम-तर नहीं इल्म-ए-कलामहै तवाफ़-ओ-हज का हंगामा अगर बाक़ी तो क्याकुंद हो कर रह गई मोमिन की तेग़-ए-बे-नियामकिस की नौ-मीदी पे हुज्जत है ये फ़रमान-ए-जदीदहै जिहाद इस दौर में मर्द-ए-मुसलमाँ पर हरामदूसरा मुशीरख़ैर है सुल्तानी-ए-जम्हूर का ग़ौग़ा कि शरतू जहाँ के ताज़ा फ़ित्नों से नहीं है बा-ख़बरपहला मुशीरहूँ मगर मेरी जहाँ-बीनी बताती है मुझेजो मुलूकियत का इक पर्दा हो क्या इस से ख़तरहम ने ख़ुद शाही को पहनाया है जमहूरी लिबासजब ज़रा आदम हुआ है ख़ुद-शनास-ओ-ख़ुद-निगरकारोबार-ए-शहरयारी की हक़ीक़त और हैये वजूद-ए-मीर-ओ-सुल्ताँ पर नहीं है मुनहसिरमज्लिस-ए-मिल्लत हो या परवेज़ का दरबार होहै वो सुल्ताँ ग़ैर की खेती पे हो जिस की नज़रतू ने क्या देखा नहीं मग़रिब का जमहूरी निज़ामचेहरा रौशन अंदरूँ चंगेज़ से तारीक-तरतीसरा मुशीररूह-ए-सुल्तानी रहे बाक़ी तो फिर क्या इज़्तिराबहै मगर क्या इस यहूदी की शरारत का जवाबवो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीबनीस्त पैग़मबर व-लेकिन दर बग़ल दारद किताबक्या बताऊँ क्या है काफ़िर की निगाह-ए-पर्दा-सोज़मश्रिक-ओ-मग़रिब की क़ौमों के लिए रोज़-ए-हिसाबइस से बढ़ कर और क्या होगा तबीअ'त का फ़सादतोड़ दी बंदों ने आक़ाओं के ख़ेमों की तनाबचौथा मुशीरतोड़ इस का रुमत-उल-कुबरा के ऐवानों में देखआल-ए-सीज़र को दिखाया हम ने फिर सीज़र का ख़्वाबकौन बहर-ए-रुम की मौजों से है लिपटा हुआगाह बालद-चूँ-सनोबर गाह नालद-चूँ-रुबाबतीसरा मुशीरमैं तो इस की आक़िबत-बीनी का कुछ क़ाइल नहींजिस ने अफ़रंगी सियासत को क्या यूँ बे-हिजाबपाँचवाँ मुशीर इबलीस को मुख़ातब कर केऐ तिरे सोज़-ए-नफ़स से कार-ए-आलम उस्तुवारतू ने जब चाहा किया हर पर्दगी को आश्कारआब-ओ-गिल तेरी हरारत से जहान-ए-सोज़-अो-साज़़अब्लह-ए-जन्नत तिरी तालीम से दाना-ए-कारतुझ से बढ़ कर फ़ितरत-ए-आदम का वो महरम नहींसादा-दिल बंदों में जो मशहूर है पर्वरदिगारकाम था जिन का फ़क़त तक़्दीस-ओ-तस्बीह-ओ-तवाफ़तेरी ग़ैरत से अबद तक सर-निगूँ-ओ-शर्मसारगरचे हैं तेरे मुरीद अफ़रंग के साहिर तमामअब मुझे उन की फ़रासत पर नहीं है ए'तिबारवो यहूदी फ़ित्ना-गर वो रूह-ए-मज़दक का बुरूज़हर क़बा होने को है इस के जुनूँ से तार तारज़ाग़ दश्ती हो रहा है हम-सर-ए-शाहीन-अो-चर्ग़कितनी सुरअ'त से बदलता है मिज़ाज-ए-रोज़गारछा गई आशुफ़्ता हो कर वुसअ'त-ए-अफ़्लाक परजिस को नादानी से हम समझे थे इक मुश्त-ए-ग़ुबारफ़ितना-ए-फ़र्दा की हैबत का ये आलम है कि आजकाँपते हैं कोहसार-ओ-मुर्ग़-ज़ार-ओ-जूएबारमेरे आक़ा वो जहाँ ज़ेर-ओ-ज़बर होने को हैजिस जहाँ का है फ़क़त तेरी सियादत पर मदार
गुलशन-ए-याद में गर आज दम-ए-बाद-ए-सबाफिर से चाहे कि गुल-अफ़शाँ हो तो हो जाने दोउम्र-ए-रफ़्ता के किसी ताक़ पे बिसरा हुआ दर्दफिर से चाहे कि फ़रोज़ाँ हो तो हो जाने दोजैसे बेगाने से अब मिलते हो वैसे ही सहीआओ दो चार घड़ी मेरे मुक़ाबिल बैठोगरचे मिल-बैठेंगे हम तुम तो मुलाक़ात के बा'दअपना एहसास-ए-ज़ियाँ और ज़ियादा होगाहम-सुख़न होंगे जो हम दोनों तो हर बात के बीचअन-कही बात का मौहूम सा पर्दा होगाकोई इक़रार न मैं याद दिलाऊँगा न तुमकोई मज़मून वफ़ा का न जफ़ा का होगागर्द-ए-अय्याम की तहरीर को धोने के लिएतुम से गोया हों दम-ए-दीद जो मेरी पलकेंतुम जो चाहो तो सुनो और जो न चाहो न सुनोऔर जो हर्फ़ करें मुझ से गुरेज़ाँ आँखेंतुम जो चाहो तो कहो और जो न चाहो न कहो
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब नक़्श-गर-ए-हादसातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब अस्ल-ए-हयात-ओ-ममातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब तार-ए-हरीर-ए-दो-रंगजिस से बनाती है ज़ात अपनी क़बा-ए-सिफ़ातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब साज़-ए-अज़ल की फ़ुग़ाँजिस से दिखाती है ज़ात ज़ेर-ओ-बम-ए-मुम्किनाततुझ को परखता है ये मुझ को परखता है येसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब सैरफ़ी-ए-काएनाततू हो अगर कम अयार मैं हूँ अगर कम अयारमौत है तेरी बरात मौत है मेरी बराततेरे शब-ओ-रोज़ की और हक़ीक़त है क्याएक ज़माने की रौ जिस में न दिन है न रातआनी-ओ-फ़ानी तमाम मोजज़ा-हा-ए-हुनरकार-ए-जहाँ बे-सबात कार-ए-जहाँ बे-सबातअव्वल ओ आख़िर फ़ना बातिन ओ ज़ाहिर फ़नानक़्श-ए-कुहन हो कि नौ मंज़िल-ए-आख़िर फ़नाहै मगर इस नक़्श में रंग-ए-सबात-ए-दवामजिस को किया हो किसी मर्द-ए-ख़ुदा ने तमाममर्द-ए-ख़ुदा का अमल इश्क़ से साहब फ़रोग़इश्क़ है अस्ल-ए-हयात मौत है उस पर हरामतुंद ओ सुबुक-सैर है गरचे ज़माने की रौइश्क़ ख़ुद इक सैल है सैल को लेता है थामइश्क़ की तक़्वीम में अस्र-ए-रवाँ के सिवाऔर ज़माने भी हैं जिन का नहीं कोई नामइश्क़ दम-ए-जिब्रईल इश्क़ दिल-ए-मुस्तफ़ाइश्क़ ख़ुदा का रसूल इश्क़ ख़ुदा का कलामइश्क़ की मस्ती से है पैकर-ए-गिल ताबनाकइश्क़ है सहबा-ए-ख़ाम इश्क़ है कास-उल-किरामइश्क़ फ़क़ीह-ए-हराम इश्क़ अमीर-ए-जुनूदइश्क़ है इब्नुस-सबील इस के हज़ारों मक़ामइश्क़ के मिज़राब से नग़्मा-ए-तार-ए-हयातइश्क़ से नूर-ए-हयात इश्क़ से नार-ए-हयातऐ हरम-ए-क़ुर्तुबा इश्क़ से तेरा वजूदइश्क़ सरापा दवाम जिस में नहीं रफ़्त ओ बूदरंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौतमोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूदक़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर सिल को बनाता है दिलख़ून-ए-जिगर से सदा सोज़ ओ सुरूर ओ सुरूदतेरी फ़ज़ा दिल-फ़रोज़ मेरी नवा सीना-सोज़तुझ से दिलों का हुज़ूर मुझ से दिलों की कुशूदअर्श-ए-मोअल्ला से कम सीना-ए-आदम नहींगरचे कफ़-ए-ख़ाक की हद है सिपहर-ए-कबूदपैकर-ए-नूरी को है सज्दा मयस्सर तो क्याउस को मयस्सर नहीं सोज़-ओ-गुदाज़-ए-सजूदकाफ़िर-ए-हिन्दी हूँ मैं देख मिरा ज़ौक़ ओ शौक़दिल में सलात ओ दुरूद लब पे सलात ओ दुरूदशौक़ मिरी लय में है शौक़ मिरी नय में हैनग़्मा-ए-अल्लाह-हू मेरे रग-ओ-पय में हैतेरा जलाल ओ जमाल मर्द-ए-ख़ुदा की दलीलवो भी जलील ओ जमील तू भी जलील ओ जमीलतेरी बिना पाएदार तेरे सुतूँ बे-शुमारशाम के सहरा में हो जैसे हुजूम-ए-नुख़ीलतेरे दर-ओ-बाम पर वादी-ए-ऐमन का नूरतेरा मिनार-ए-बुलंद जल्वा-गह-ए-जिब्रीलमिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि हैउस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लीलउस की ज़मीं बे-हुदूद उस का उफ़ुक़ बे-सग़ूरउस के समुंदर की मौज दजला ओ दनयूब ओ नीलउस के ज़माने अजीब उस के फ़साने ग़रीबअहद-ए-कुहन को दिया उस ने पयाम-ए-रहीलसाक़ी-ए-रबाब-ए-ज़ौक़ फ़ारस-ए-मैदान-ए-शौक़बादा है उस का रहीक़ तेग़ है उस की असीलमर्द-ए-सिपाही है वो उस की ज़िरह ला-इलाहसाया-ए-शमशीर में उस की पनह ला-इलाहतुझ से हुआ आश्कार बंदा-ए-मोमिन का राज़उस के दिनों की तपिश उस की शबों का गुदाज़उस का मक़ाम-ए-बुलंद उस का ख़याल-ए-अज़ीमउस का सुरूर उस का शौक़ उस का नियाज़ उस का नाज़हाथ है अल्लाह का बंदा-ए-मोमिन का हाथग़ालिब ओ कार-आफ़रीं कार-कुशा कारसाज़ख़ाकी ओ नूरी-निहाद बंदा-ए-मौला-सिफ़ातहर दो-जहाँ से ग़नी उस का दिल-ए-बे-नियाज़उस की उमीदें क़लील उस के मक़ासिद जलीलउस की अदा दिल-फ़रेब उस की निगह दिल-नवाज़आज भी इस देस में आम है चश्म-ए-ग़ज़ालऔर निगाहों के तीर आज भी हैं दिल-नशींबू-ए-यमन आज भी उस की हवाओं में हैरंग-ए-हिजाज़ आज भी उस की नवाओं में हैदीदा-ए-अंजुम में है तेरी ज़मीं आसमाँआह कि सदियों से है तेरी फ़ज़ा बे-अज़ाँकौन सी वादी में है कौन सी मंज़िल में हैइश्क़-ए-बला-ख़ेज़ का क़ाफ़िला-ए-सख़्त-जाँदेख चुका अल्मनी शोरिश-ए-इस्लाह-ए-दींजिस ने न छोड़े कहीं नक़्श-ए-कुहन के निशाँहर्फ़-ए-ग़लत बन गई इस्मत-ए-पीर-ए-कुनिश्तऔर हुई फ़िक्र की कश्ती-ए-नाज़ुक रवाँचश्म-ए-फ़िराँसिस भी देख चुकी इंक़लाबजिस से दिगर-गूँ हुआ मग़रबियों का जहाँमिल्लत-ए-रूमी-निज़ाद कोहना-परस्ती से पीरलज़्ज़त-ए-तज्दीदा से वो भी हुई फिर जवाँरूह-ए-मुसलमाँ में है आज वही इज़्तिराबराज़-ए-ख़ुदाई है ये कह नहीं सकती ज़बाँनर्म दम-ए-गुफ़्तुगू गर्म दम-ए-जुस्तुजूरज़्म हो या बज़्म हो पाक-दिल ओ पाक-बाज़नुक़्ता-ए-परकार-ए-हक़ मर्द-ए-ख़ुदा का यक़ींऔर ये आलम तमाम वहम ओ तिलिस्म ओ मजाज़अक़्ल की मंज़िल है वो इश्क़ का हासिल है वोहल्क़ा-ए-आफ़ाक़ में गर्मी-ए-महफ़िल है वोकाबा-ए-अरबाब-ए-फ़न सतवत-ए-दीन-ए-मुबींतुझ से हरम मर्तबत उंदुलुसियों की ज़मींहै तह-ए-गर्दूं अगर हुस्न में तेरी नज़ीरक़ल्ब-ए-मुसलमाँ में है और नहीं है कहींआह वो मरदान-ए-हक़ वो अरबी शहसवारहामिल-ए-ख़ल्क़-ए-अज़ीम साहब-ए-सिद्क-ओ-यक़ींजिन की हुकूमत से है फ़ाश ये रम्ज़-ए-ग़रीबसल्तनत-ए-अहल-ए-दिल फ़क़्र है शाही नहींजिन की निगाहों ने की तर्बियत-ए-शर्क़-ओ-ग़र्बज़ुल्मत-ए-यूरोप में थी जिन की ख़िरद-राह-बींजिन के लहू के तुफ़ैल आज भी हैं उंदुलुसीख़ुश-दिल ओ गर्म-इख़्तिलात सादा ओ रौशन-जबींदेखिए इस बहर की तह से उछलता है क्यागुम्बद-ए-नीलोफ़री रंग बदलता है क्यावादी-ए-कोह-सार में ग़र्क़-ए-शफ़क़ है सहाबलाल-ए-बदख़्शाँ के ढेर छोड़ गया आफ़्ताबसादा ओ पुर-सोज़ है दुख़्तर-ए-दहक़ाँ का गीतकश्ती-ए-दिल के लिए सैल है अहद-ए-शबाबआब-ए-रवान-ए-कबीर तेरे किनारे कोईदेख रहा है किसी और ज़माने का ख़्वाबआलम-ए-नौ है अभी पर्दा-ए-तक़दीर मेंमेरी निगाहों में है उस की सहर बे-हिजाबपर्दा उठा दूँ अगर चेहरा-ए-अफ़्कार सेला न सकेगा फ़रंग मेरी नवाओं की ताबजिस में न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगीरूह-ए-उमम की हयात कश्मकश-ए-इंक़िलाबसूरत-ए-शमशीर है दस्त-ए-क़ज़ा में वो क़ौमकरती है जो हर ज़माँ अपने अमल का हिसाबनक़्श हैं सब ना-तमाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैरनग़्मा है सौदा-ए-ख़ाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैर
क्यूँ त'अज्जुब है मिरी सहरा-नवर्दी पर तुझेये तगा-पू-ए-दमादम ज़िंदगी की है दलीलऐ रहीन-ए-ख़ाना तू ने वो समाँ देखा नहींगूँजती है जब फ़ज़ा-ए-दश्त में बाँग-ए-रहीलरेत के टीले पे वो आहू का बे-परवा ख़िरामवो हज़र बे-बर्ग-ओ-सामाँ वो सफ़र बे-संग-ओ-मीलवो नुमूद-ए-अख़्तर-ए-सीमाब-पा हंगाम-ए-सुब्हया नुमायाँ बाम-ए-गर्दूं से जबीन-ए-जिब्रईलवो सुकूत-ए-शाम-ए-सहरा में ग़ुरूब-ए-आफ़्ताबजस से रौशन-तर हुई चश्म-ए-जहाँ-बीन-ए-ख़लीलऔर वो पानी के चश्मे पर मक़ाम-ए-कारवाँअहल-ए-ईमाँ जस तरह जन्नत में गिर्द-ए-सलसबीलताज़ा वीराने की सौदा-ए-मोहब्बत को तलाशऔर आबादी में तू ज़ंजीरी-ए-किश्त-ओ-नख़ीलपुख़्ता-तर है गर्दिश-ए-पैहम से जाम-ए-ज़िंदगीहै यही ऐ बे-ख़बर राज़-ए-दवाम-ए-ज़िंदगी
हिजाब-ए-फ़ित्ना-परवर अब उठा लेती तो अच्छा थाख़ुद अपने हुस्न को पर्दा बना लेती तो अच्छा थातिरी नीची नज़र ख़ुद तेरी इस्मत की मुहाफ़िज़ हैतू इस नश्तर की तेज़ी आज़मा लेती तो अच्छा थातिरी चीन-ए-जबीं ख़ुद इक सज़ा क़ानून-ए-फ़ितरत मेंइसी शमशीर से कार-ए-सज़ा लेती तो अच्छा थाये तेरा ज़र्द रुख़ ये ख़ुश्क लब ये वहम ये वहशततू अपने सर से ये बादल हटा लेती तो अच्छा थादिल-ए-मजरूह को मजरूह-तर करने से क्या हासिलतू आँसू पोंछ कर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा थातिरे ज़ेर-ए-नगीं घर हो महल हो क़स्र हो कुछ होमैं ये कहता हूँ तू अर्ज़-ओ-समा लेती तो अच्छा थाअगर ख़ल्वत में तू ने सर उठाया भी तो क्या हासिलभरी महफ़िल में आ कर सर झुका लेती तो अच्छा थातिरे माथे का टीका मर्द की क़िस्मत का तारा हैअगर तू साज़-ए-बेदारी उठा लेती तो अच्छा थाअयाँ हैं दुश्मनों के ख़ंजरों पर ख़ून के धब्बेउन्हें तू रंग-ए-आरिज़ से मिला लेती तो अच्छा थासनानें खींच ली हैं सर-फिरे बाग़ी जवानों नेतू सामान-ए-जराहत अब उठा लेती तो अच्छा थातिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिनतू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरीख़मोशी गुफ़्तुगू है बे-ज़बानी है ज़बाँ मेरीये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसा तेरी महफ़िल मेंयहाँ तो बात करने को तरसती है ज़बाँ मेरीउठाए कुछ वरक़ लाले ने कुछ नर्गिस ने कुछ गुल नेचमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरीउड़ा ली क़ुमरियों ने तूतियों ने अंदलीबों नेचमन वालों ने मिल कर लूट ली तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ मेरीटपक ऐ शम्अ आँसू बन के परवाने की आँखों सेसरापा दर्द हूँ हसरत भरी है दास्ताँ मेरीइलाही फिर मज़ा क्या है यहाँ दुनिया में रहने काहयात-ए-जावेदाँ मेरी न मर्ग-ए-ना-गहाँ मेरीमिरा रोना नहीं रोना है ये सारे गुलिस्ताँ कावो गुल हूँ मैं ख़िज़ाँ हर गुल की है गोया ख़िज़ाँ मेरीदरीं हसरत सरा उमरीस्त अफ़्सून-ए-जरस दारमज़ फ़ैज़-ए-दिल तपीदन-हा ख़रोश-ए-बे-नफ़स दारमरियाज़-ए-दहर में ना-आश्ना-ए-बज़्म-ए-इशरत हूँख़ुशी रोती है जिस को मैं वो महरूम-ए-मसर्रत हूँमिरी बिगड़ी हुई तक़दीर को रोती है गोयाईमैं हर्फ़-ए-ज़ेर-ए-लब शर्मिंदा-ए-गोश-ए-समाअत हूँपरेशाँ हूँ मैं मुश्त-ए-ख़ाक लेकिन कुछ नहीं खुलतासिकंदर हूँ कि आईना हूँ या गर्द-ए-कुदूरत हूँये सब कुछ है मगर हस्ती मिरी मक़्सद है क़ुदरत कासरापा नूर हो जिस की हक़ीक़त मैं वो ज़ुल्मत हूँख़ज़ीना हूँ छुपाया मुझ को मुश्त-ए-ख़ाक-ए-सहरा नेकिसी को क्या ख़बर है मैं कहाँ हूँ किस की दौलत हूँनज़र मेरी नहीं ममनून-ए-सैर-ए-अरसा-ए-हस्तीमैं वो छोटी सी दुनिया हूँ कि आप अपनी विलायत हूँन सहबा हूँ न साक़ी हूँ न मस्ती हूँ न पैमानामैं इस मय-ख़ाना-ए-हस्ती में हर शय की हक़ीक़त हूँमुझे राज़-ए-दो-आलम दिल का आईना दिखाता हैवही कहता हूँ जो कुछ सामने आँखों के आता हैअता ऐसा बयाँ मुझ को हुआ रंगीं-बयानों मेंकि बाम-ए-अर्श के ताइर हैं मेरे हम-ज़बानों मेंअसर ये भी है इक मेरे जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ कामिरा आईना-ए-दिल है क़ज़ा के राज़-दानों मेंरुलाता है तिरा नज़्ज़ारा ऐ हिन्दोस्ताँ मुझ कोकि इबरत-ख़ेज़ है तेरा फ़साना सब फ़सानों मेंदिया रोना मुझे ऐसा कि सब कुछ दे दिया गोयालिखा कल्क-ए-अज़ल ने मुझ को तेरे नौहा-ख़्वानों मेंनिशान-ए-बर्ग-ए-गुल तक भी न छोड़ उस बाग़ में गुलचींतिरी क़िस्मत से रज़्म-आराइयाँ हैं बाग़बानों मेंछुपा कर आस्तीं में बिजलियाँ रक्खी हैं गर्दूं नेअनादिल बाग़ के ग़ाफ़िल न बैठें आशियानों मेंसुन ऐ ग़ाफ़िल सदा मेरी ये ऐसी चीज़ है जिस कोवज़ीफ़ा जान कर पढ़ते हैं ताइर बोस्तानों मेंवतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली हैतिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों मेंज़रा देख उस को जो कुछ हो रहा है होने वाला हैधरा क्या है भला अहद-ए-कुहन की दास्तानों मेंये ख़ामोशी कहाँ तक लज़्ज़त-ए-फ़रियाद पैदा करज़मीं पर तू हो और तेरी सदा हो आसमानों मेंन समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालोतुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों मेंयही आईन-ए-क़ुदरत है यही उस्लूब-ए-फ़ितरत हैजो है राह-ए-अमल में गामज़न महबूब-ए-फ़ितरत हैहुवैदा आज अपने ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ कर के छोड़ूँगालहू रो रो के महफ़िल को गुलिस्ताँ कर के छोड़ूँगाजलाना है मुझे हर शम-ए-दिल को सोज़-ए-पिन्हाँ सेतिरी तारीक रातों में चराग़ाँ कर के छोड़ूँगामगर ग़ुंचों की सूरत हूँ दिल-ए-दर्द-आश्ना पैदाचमन में मुश्त-ए-ख़ाक अपनी परेशाँ कर के छोड़ूँगापिरोना एक ही तस्बीह में इन बिखरे दानों कोजो मुश्किल है तो इस मुश्किल को आसाँ कर के छोड़ूँगामुझे ऐ हम-नशीं रहने दे शग़्ल-ए-सीना-कावी मेंकि मैं दाग़-ए-मोहब्बत को नुमायाँ कर के छोड़ूँगादिखा दूँगा जहाँ को जो मिरी आँखों ने देखा हैतुझे भी सूरत-ए-आईना हैराँ कर के छोड़ूँगाजो है पर्दों में पिन्हाँ चश्म-ए-बीना देख लेती हैज़माने की तबीअत का तक़ाज़ा देख लेती हैकिया रिफ़अत की लज़्ज़त से न दिल को आश्ना तू नेगुज़ारी उम्र पस्ती में मिसाल-ए-नक़्श-ए-पा तू नेरहा दिल-बस्ता-ए-महफ़िल मगर अपनी निगाहों कोकिया बैरून-ए-महफ़िल से न हैरत-आश्ना तू नेफ़िदा करता रहा दिल को हसीनों की अदाओं परमगर देखी न उस आईने में अपनी अदा तू नेतअस्सुब छोड़ नादाँ दहर के आईना-ख़ाने मेंये तस्वीरें हैं तेरी जिन को समझा है बुरा तू नेसरापा नाला-ए-बेदाद-ए-सोज़-ए-ज़िंदगी हो जासपंद-आसा गिरह में बाँध रक्खी है सदा तू नेसफ़ा-ए-दिल को क्या आराइश-ए-रंग-ए-तअल्लुक़ सेकफ़-ए-आईना पर बाँधी है ओ नादाँ हिना तू नेज़मीं क्या आसमाँ भी तेरी कज-बीनी पे रोता हैग़ज़ब है सत्र-ए-क़ुरआन को चलेपा कर दिया तू नेज़बाँ से गर किया तौहीद का दावा तो क्या हासिलबनाया है बुत-ए-पिंदार को अपना ख़ुदा तू नेकुएँ में तू ने यूसुफ़ को जो देखा भी तो क्या देखाअरे ग़ाफ़िल जो मुतलक़ था मुक़य्यद कर दिया तू नेहवस बाला-ए-मिम्बर है तुझे रंगीं-बयानी कीनसीहत भी तिरी सूरत है इक अफ़्साना-ख़्वानी कीदिखा वो हुस्न-ए-आलम-सोज़ अपनी चश्म-ए-पुर-नम कोजो तड़पाता है परवाने को रुलवाता है शबनम कोज़रा नज़्ज़ारा ही ऐ बुल-हवस मक़्सद नहीं उस काबनाया है किसी ने कुछ समझ कर चश्म-ए-आदम कोअगर देखा भी उस ने सारे आलम को तो क्या देखानज़र आई न कुछ अपनी हक़ीक़त जाम से जम कोशजर है फ़िरक़ा-आराई तअस्सुब है समर उस काये वो फल है कि जन्नत से निकलवाता है आदम कोन उट्ठा जज़्बा-ए-ख़ुर्शीद से इक बर्ग-ए-गुल तक भीये रिफ़अत की तमन्ना है कि ले उड़ती है शबनम कोफिरा करते नहीं मजरूह-ए-उल्फ़त फ़िक्र-ए-दरमाँ मेंये ज़ख़्मी आप कर लेते हैं पैदा अपने मरहम कोमोहब्बत के शरर से दिल सरापा नूर होता हैज़रा से बीज से पैदा रियाज़-ए-तूर होता हैदवा हर दुख की है मजरूह-ए-तेग़-ए-आरज़ू रहनाइलाज-ए-ज़ख़्म है आज़ाद-ए-एहसान-ए-रफ़ू रहनाशराब-ए-बे-ख़ुदी से ता-फ़लक परवाज़ है मेरीशिकस्त-ए-रंग से सीखा है मैं ने बन के बू रहनाथमे क्या दीदा-ए-गिर्यां वतन की नौहा-ख़्वानी मेंइबादत चश्म-ए-शाइर की है हर दम बा-वज़ू रहनाबनाएँ क्या समझ कर शाख़-ए-गुल पर आशियाँ अपनाचमन में आह क्या रहना जो हो बे-आबरू रहनाजो तू समझे तो आज़ादी है पोशीदा मोहब्बत मेंग़ुलामी है असीर-ए-इम्तियाज़-ए-मा-ओ-तू रहनाये इस्तिग़्ना है पानी में निगूँ रखता है साग़र कोतुझे भी चाहिए मिस्ल-ए-हबाब-ए-आबजू रहनान रह अपनों से बे-परवा इसी में ख़ैर है तेरीअगर मंज़ूर है दुनिया में ओ बेगाना-ख़ू रहनाशराब-ए-रूह-परवर है मोहब्बत नौ-ए-इंसाँ कीसिखाया इस ने मुझ को मस्त बे-जाम-ओ-सुबू रहनामोहब्बत ही से पाई है शिफ़ा बीमार क़ौमों नेकिया है अपने बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता को बेदार क़ौमों नेबयाबान-ए-मोहब्बत दश्त-ए-ग़ुर्बत भी वतन भी हैये वीराना क़फ़स भी आशियाना भी चमन भी हैमोहब्बत ही वो मंज़िल है कि मंज़िल भी है सहरा भीजरस भी कारवाँ भी राहबर भी राहज़न भी हैमरज़ कहते हैं सब इस को ये है लेकिन मरज़ ऐसाछुपा जिस में इलाज-ए-गर्दिश-ए-चर्ख़-ए-कुहन भी हैजलाना दिल का है गोया सरापा नूर हो जानाये परवाना जो सोज़ाँ हो तो शम-ए-अंजुमन भी हैवही इक हुस्न है लेकिन नज़र आता है हर शय मेंये शीरीं भी है गोया बे-सुतूँ भी कोहकन भी हैउजाड़ा है तमीज़-ए-मिल्लत-ओ-आईं ने क़ौमों कोमिरे अहल-ए-वतन के दिल में कुछ फ़िक्र-ए-वतन भी हैसुकूत-आमोज़ तूल-ए-दास्तान-ए-दर्द है वर्नाज़बाँ भी है हमारे मुँह में और ताब-ए-सुख़न भी हैनमी-गर्दीद को तह रिश्ता-ए-मअ'नी रिहा कर्दमहिकायत बूद बे-पायाँ ब-ख़ामोशी अदा कर्दम
इधर से आज इक किसी के ग़म कीकहानी का कारवाँ जो गुज़रायतीम आँसू ने जैसे जानाकि इस कहानी की सरपरस्ती मिलेतो मुमकिन हैराह पानातो इक कहानी की उँगली थामेउसी के ग़म को रूमाल करताइसी के बारे मेंझूटे सच्चे सवाल करताये मेरी पलकों तक आ गया है
ये किताबों की सफ़-ब-सफ़ जिल्देंकाग़ज़ों का फ़ुज़ूल इस्ती'माल
क़ल्ब ओ नज़र की ज़िंदगी दश्त में सुब्ह का समाँचश्मा-ए-आफ़्ताब से नूर की नद्दियाँ रवाँ!हुस्न-ए-अज़ल की है नुमूद चाक है पर्दा-ए-वजूददिल के लिए हज़ार सूद एक निगाह का ज़ियाँ!सुर्ख़ ओ कबूद बदलियाँ छोड़ गया सहाब-ए-शब!कोह-ए-इज़म को दे गया रंग-ब-रंग तैलिसाँ!गर्द से पाक है हवा बर्ग-ए-नख़ील धुल गएरेग-ए-नवाह-ए-काज़िमा नर्म है मिस्ल-ए-पर्नियाँआग बुझी हुई इधर, टूटी हुई तनाब उधरक्या ख़बर इस मक़ाम से गुज़रे हैं कितने कारवाँआई सदा-ए-जिब्रईल तेरा मक़ाम है यहीएहल-ए-फ़िराक़ के लिए ऐश-ए-दवाम है यहीकिस से कहूँ कि ज़हर है मेरे लिए मय-ए-हयातकोहना है बज़्म-ए-कायनात ताज़ा हैं मेरे वारदात!क्या नहीं और ग़ज़नवी कारगह-ए-हयात मेंबैठे हैं कब से मुंतज़िर अहल-ए-हरम के सोमनात!ज़िक्र-ए-अरब के सोज़ में, फ़िक्र-ए-अजम के साज़ मेंने अरबी मुशाहिदात, ने अजमी तख़य्युलातक़ाफ़िला-ए-हिजाज़ में एक हुसैन भी नहींगरचे है ताब-दार अभी गेसू-ए-दजला-ओ-फ़ुरात!अक़्ल ओ दिल ओ निगाह का मुर्शिद-ए-अव्वलीं है इश्क़इश्क़ न हो तो शर-ओ-दीं बुतकद-ए-तसव्वुरात!सिदक़-ए-ख़लील भी है इश्क़ सब्र-ए-हुसैन भी है इश्क़!म'अरका-ए-वजूद में बद्र ओ हुनैन भी है इश्क़!अाया-ए-कायनात का म'अनी-ए-देर-याब तू!निकले तिरी तलाश में क़ाफ़िला-हा-ए-रंग-ओ-बू!जलवतियान-ए-मदरसा कोर-निगाह ओ मुर्दा-ज़ाैक़जलवतियान-ए-मयकदा कम-तलब ओ तही-कदू!मैं कि मिरी ग़ज़ल में है आतिश-ए-रफ़्ता का सुराग़मेरी तमाम सरगुज़िश्त खोए हुओं की जुस्तुजू!बाद-ए-सबा की मौज से नश-नुमा-ए-ख़ार-अो-ख़स!मेरे नफ़स की मौज से नश-ओ-नुमा-ए-आरज़ू!ख़ून-ए-दिल ओ जिगर से है मेरी नवा की परवरिशहै रग-ए-साज़ में रवाँ साहिब-ए-साज़ का लहू!फुर्सत-ए-कशमुकश में ईं दिल बे-क़रार रायक दो शिकन ज़्यादा कुन गेसू-ए-ताबदार रालौह भी तू, क़लम भी तू, तेरा वजूद अल-किताब!गुम्बद-ए-आबगीना-रंग तेरे मुहीत में हबाब!आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक में तेरे ज़ुहूर से फ़रोग़ज़र्रा-ए-रेग को दिया तू ने तुलू-ए-आफ़्ताब!शौकत-ए-संजर-ओ-सलीम तेरे जलाल की नुमूद!फ़क़्र-ए-'जुनेद'-ओ-'बायज़ीद' तेरा जमाल बे-नक़ाब!शौक़ तिरा अगर न हो मेरी नमाज़ का इमाममेरा क़याम भी हिजाब! मेरा सुजूद भी हिजाब!तेरी निगाह-ए-नाज़ से दोनों मुराद पा गएअक़्ल, ग़याब ओ जुस्तुजू! इश्क़, हुज़ूर ओ इज़्तिराब!तीरा-ओ-तार है जहाँ गर्दिश-ए-आफ़ताब से!तब-ए-ज़माना ताज़ा कर जल्वा-ए-बे-हिजाब से!तेरी नज़र में हैं तमाम मेरे गुज़िश्ता रोज़ ओ शबमुझ को ख़बर न थी कि है इल्म-ए-नख़ील बे-रुतब!ताज़ा मिरे ज़मीर में म'अर्क-ए-कुहन हुआ!इश्क़ तमाम मुस्तफ़ा! अक़्ल तमाम बू-लहब!गाह ब-हीला मी-बरद, गाह ब-ज़ोर मी-कशदइश्क़ की इब्तिदा अजब इश्क़ की इंतिहा अजब!आलम-ए-सोज़-ओ-साज़ में वस्ल से बढ़ के है फ़िराक़वस्ल में मर्ग-ए-आरज़ू! हिज्र में ल़ज़्जत-ए-तलब!एेन-ए-विसाल में मुझे हौसला-ए-नज़र न थागरचे बहाना-जू रही मेरी निगाह-ए-बे-अदब!गर्मी-ए-आरज़ू फ़िराक़! शोरिश-ए-हाव-ओ-हू फ़िराक़!मौज की जुस्तुजू फ़िराक़! क़तरे की आबरू फ़िराक़!
साक़ी की हर निगाह पे बल खा के पी गयालहरों से खेलता हुआ लहरा के पी गयाबे-कैफ़ियों के कैफ़ से घबरा के पी गयातौबा को तोड़-ताड़ के थर्रा के पी गयाज़ाहिद! ये तेरी शोख़ी-ए-रिन्दाना देखनारहमत को बातों बातों में बहला के पी गयासर-मस्ती-ए-अज़ल मुझे जब याद आ गईदुनिया-ए-ए'तिबार को ठुकरा के पी गयाआज़ुर्दगी-ए-ख़ातिर-ए-साक़ी को देख करमुझ को ये शर्म आई कि शर्मा के पी गयाऐ रहमत-ए-तमाम मिरी हर ख़ता मुआफ़मैं इंतिहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गयापीता बग़ैर इज़्न ये कब थी मिरी मजालदर-पर्दा चश्म-ए-यार की शह पा के पी गयाउस जान-ए-मय-कदा की क़सम बारहा 'जिगर'कुल आलम-ए-बसीत पे मैं छा के पी गया
ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर हैआसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैंअंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैंहै शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार मेंसब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार मेंनग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीरहै इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीरआँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँक़ल्ब-ए-इंसानी में रक़्स-ए-ऐश-ओ-ग़म रहता नहींनग़्मा रह जाता है लुत्फ़-ए-ज़ेर-ओ-बम रहता नहींइल्म ओ हिकमत रहज़न-ए-सामान-ए-अश्क-ओ-आह हैया'नी इक अल्मास का टुकड़ा दिल-ए-आगाह हैगरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहींआँख मेरी माया-दार-ए-अश्क-ए-उननाबी नहींजानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़मेरे लब पर क़िस्सा-ए-नैरंगी-ए-दौराँ नहींदिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहींपर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या-ए-पैहम की हैआह ये तरदीद मेरी हिकमत-ए-मोहकम की हैगिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा हैदर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा हैमौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिराहैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ कारुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ कारफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा-ब-पा इस ने कियाअहद-ए-तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने कियाजब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँबात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँऔर अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी-ए-गुफ़्तार केबे-बहा मोती हैं जिस की चश्म-ए-गौहर-बार केइल्म की संजीदा-गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊ'रदुनयवी ए'ज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूरज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हमसोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हमबे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैंफिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैंकिस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ारकौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे-क़रारख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगाअब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगातर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआघर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआदफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयातथी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयातउम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत-गर रहीमैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसीवो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंदतेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंदकारोबार-ए-ज़िंदगानी में वो हम-पहलू मिरावो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरातुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वोसब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वोतुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गईशिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गईआह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीरआदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीरकितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौतगुलशन-ए-हस्ती में मानिंद-ए-नसीम अर्ज़ां है मौतज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैंकैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैंकल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौतदश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौतमौत है हंगामा-आरा क़ुलज़ुम-ए-ख़ामोश मेंडूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश मेंने मजाल-ए-शिकवा है ने ताक़त-ए-गुफ़्तार हैज़िंदगानी क्या है इक तोक़-ए-गुलू-अफ़्शार हैक़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहींइक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहींख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भीहैं पस-ए-नौह पर्दा-ए-गर्दूं अभी दौर और भीसीना चाक इस गुल्सिताँ में लाला-ओ-गुल हैं तो क्यानाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्याझाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँसब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्याआरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्याज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहींटूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहींज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में हैज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में हैमौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श-ए-हयातआम यूँ उस को न कर देता निज़ाम-ए-काएनातहै अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहींजिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहींआह ग़ाफ़िल मौत का राज़-ए-निहाँ कुछ और हैनक़्श की ना-पाएदारी से अयाँ कुछ और हैजन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आबमौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाबमौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है येकितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है येफिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवातोड़ने में उस के यूँ होती न बे-परवा हवाइस रविश का क्या असर है हैयत-ए-तामीर परये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत-ए-तामीर परफ़ितरत-ए-हस्ती शहीद-ए-आरज़ू रहती न होख़ूब-तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न होआह सीमाब-ए-परेशाँ अंजुम-ए-गर्दूं-फ़रोज़शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून-ए-शब है जिन का सोज़अक़्ल जिस से सर-ब-ज़ानू है वो मुद्दत इन की हैसरगुज़िश्त-ए-नौ-ए-इंसाँ एक साअ'त उन की हैफिर ये इंसाँ आँ सू-ए-अफ़्लाक है जिस की नज़रक़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा-तरजो मिसाल-ए-शम्अ रौशन महफ़िल-ए-क़ुदरत में हैआसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत-ए-फ़ितरत में हैजिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब हैजिस का नाख़ुन साज़-ए-हस्ती के लिए मिज़राब हैशो'ला ये कम-तर है गर्दूं के शरारों से भी क्याकम-बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्यातुख़्म-ए-गुल की आँख ज़ेर-ए-ख़ाक भी बे-ख़्वाब हैकिस क़दर नश्व-ओ-नुमा के वास्ते बेताब हैज़िंदगी का शो'ला इस दाने में जो मस्तूर हैख़ुद-नुमाई ख़ुद-फ़ज़ाई के लिए मजबूर हैसर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहींख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहींफूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है येमौत से गोया क़बा-ए-ज़िंदगी पाता है येहै लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंदडालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंदमौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम हैख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम हैख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहींमौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहींकहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवाज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ादिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद हैहल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम से आज़ाद हैवक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहींवक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहींसर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना-गहाँअश्क पैहम दीदा-ए-इंसाँ से होते हैं रवाँरब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद सेख़ून-ए-दिल बहता है आँखों की सरिश्क-आबाद सेआदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम हैउस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम हैजौहर-ए-इंसाँ अदम से आश्ना होता नहींआँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहींरख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से हैसर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से हैआह ये ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ग़फ़्लत की ख़ामोशी नहींआगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहींपर्दा-ए-मशरिक़ से जिस दम जल्वा-गर होती है सुब्हदाग़ शब का दामन-ए-आफ़ाक़ से धोती है सुब्हलाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है येबे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है येसीना-ए-बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद हैसैकड़ों नग़्मों से बाद-ए-सुब्ह-दम-आबाद हैख़ुफ़्तगान-ए-लाला-ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बारहोते हैं आख़िर उरूस-ए-ज़िंदगी से हम-कनारये अगर आईन-ए-हस्ती है कि हो हर शाम सुब्हमरक़द-ए-इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्हदाम-ए-सिमीन-ए-तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़-गीरकर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीरयाद से तेरी दिल-ए-दर्द आश्ना मामूर हैजैसे का'बे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर हैवो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयातजल्वा-गाहें उस की हैं लाखों जहान-ए-बे-सबातमुख़्तलिफ़ हर मंज़िल-ए-हस्ती को रस्म-ओ-राह हैआख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ-गाह हैहै वहाँ बे-हासिली किश्त-ए-अजल के वास्तेसाज़गार आब-ओ-हवा तुख़्म-ए-अमल के वास्तेनूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहींतंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहींज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा-तरख़ूब-तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़रमिस्ल-ए-ऐवान-ए-सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरानूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिराआसमाँ तेरी लहद पर शबनम-अफ़्शानी करेसब्ज़ा-ए-नौ-रस्ता इस घर की निगहबानी करे
ज़माना आया है बे-हिजाबी का आम दीदार-ए-यार होगासुकूत था पर्दा-दार जिस का वो राज़ अब आश्कार होगागुज़र गया अब वो दौर-ए-साक़ी कि छुप के पीते थे पीने वालेबनेगा सारा जहान मय-ख़ाना हर कोई बादा-ख़्वार होगाकभी जो आवारा-ए-जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसेंगेबरहना-पाई वही रहेगी मगर नया ख़ारज़ार होगासुना दिया गोश-ए-मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िरजो अहद सहराइयों से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगानिकल के सहरा से जिस ने रूमा की सल्तनत को उलट दिया थासुना है ये क़ुदसियों से मैं ने वो शेर फिर होशियार होगाकिया मिरा तज़्किरा जो साक़ी ने बादा-ख़्वारों की अंजुमन मेंतो पीर-ए-मय-ख़ाना सुन के कहने लगा कि मुँह-फट है ख़्वार होगादयार-ए-मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं हैखरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र-ए-कम-अयार होगातुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुद-कुशी करेगीजो शाख़-ए-नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना-पाएदार होगासफ़ीना-ए-बर्ग-ए-गुल बना लेगा क़ाफ़िला मोर-ए-ना-तावाँ काहज़ार मौजों की हो कशाकश मगर ये दरिया से पार होगाचमन में लाला दिखाता फिरता है दाग़ अपना कली कली कोये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगाजो एक था ऐ निगाह तू ने हज़ार कर के हमें दिखायायही अगर कैफ़ियत है तेरी तो फिर किसे ए'तिबार होगाकहा जो क़ुमरी से मैं ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा-ब-गिल हैंतू ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगाख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों बनों में फिरते हैं मारे मारेमैं उस का बंदा बनूँगा जिस को ख़ुदा के बंदों से प्यार होगाये रस्म-ए-बज़्म-ए-फ़ना है ऐ दिल गुनाह है जुम्बिश-ए-नज़र भीरहेगी क्या आबरू हमारी जो तू यहाँ बे-क़रार होगामैं ज़ुल्मत-ए-शब में ले के निकलूँगा अपने दर-माँदा कारवाँ कोशरर-फ़िशाँ होगी आह मेरी नफ़स मिरा शोला-बार होगानहीं है ग़ैर-अज़-नुमूद कुछ भी जो मुद्दआ तेरी ज़िंदगी कातू इक नफ़स में जहाँ से मिटना तुझे मिसाल-ए-शरार होगान पूछ 'इक़बाल' का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस कीकहीं सर-ए-राहगुज़ार बैठा सितम-कश-ए-इंतिज़ार होगा
ऐ मिरी हम-रक़्स मुझ को थाम लेअहद-ए-पारीना का मैं इंसाँ नहींबंदगी से इस दर ओ दीवार कीहो चुकी हैं ख़्वाहिशें बे-सोज़-ओ-रंग ओ ना-तवाँजिस्म से तेरे लिपट सकता तो हूँज़िंदगी पर मैं झपट सकता नहीं!इस लिए अब थाम लेऐ हसीन ओ अजनबी औरत मुझे अब थाम ले!
कोई पहाड़ ये कहता था इक गिलहरी सेतुझे हो शर्म तो पानी में जा के डूब मरेज़रा सी चीज़ है इस पर ग़ुरूर! क्या कहना!ये अक़्ल और ये समझ ये शुऊर! क्या कहना!ख़ुदा की शान है ना-चीज़! चीज़ बन बैठेंजो बे-शुऊर हों यूँ बा-तमीज़ बन बैठें!तिरी बिसात है क्या मेरी शान के आगेज़मीं है पस्त मिरी आन-बान के आगेजो बात मुझ में है तुझ को वो है नसीब कहाँभला पहाड़ कहाँ जानवर ग़रीब कहाँ!कहा ये सुन के गिलहरी ने मुँह सँभाल ज़राये कच्ची बातें हैं दिल से इन्हें निकाल ज़रा!जो मैं बड़ी नहीं तेरी तरह तो क्या पर्वा!नहीं है तू भी तो आख़िर मिरी तरह छोटाहर एक चीज़ से पैदा ख़ुदा की क़ुदरत हैकोई बड़ा कोई छोटा ये उस की हिकमत हैबड़ा जहान में तुझ को बना दिया उस नेमुझे दरख़्त पे चढ़ना सिखा दिया उस नेक़दम उठाने की ताक़त नहीं ज़रा तुझ मेंनिरी बड़ाई है! ख़ूबी है और क्या तुझ मेंजो तू बड़ा है तो मुझ सा हुनर दिखा मुझ कोये छालिया ही ज़रा तोड़ कर दिखा मुझ कोनहीं है चीज़ निकम्मी कोई ज़माने मेंकोई बुरा नहीं क़ुदरत के कार-ख़ाने में
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