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नज़्म
मैं टेढ़ी पस्ली का गुस्ताख़ जनम हूँ
जिस के हल्क़ों में बद-तहज़ीब चीख़ों का हुजूम
सिदरा सहर इमरान
नज़्म
मेरी पस्ली में जमा है कई शहरों का सुकूत
जैसे सोया हो किसी ग़ार में तहज़ीब का भूत
चन्द्रभान ख़याल
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैं
शोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैं