aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "pole"
कितनों को महलों अंदर है ऐश का नज़ाराया साएबान सुथरा या बाँस का उसाराकरता है सैर कोई कोठे का ले सहारामुफ़्लिस भी कर रहा है पोले तले गुज़ाराक्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
दीप जिस का महल्लात ही में जलेचंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चलेवो जो साए में हर मस्लहत के पलेऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर कोमैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
मक्के मदीने के पाक मुसल्ले पयम्बर घर नवासेशाह-ए-मर्दां अमीर-ऊल-मोमिनीन हज़रत-'अली' के पोतेहज़रत इमाम-'हसन' हज़रत इमाम-'हुसैन' के पोतेहज़रत इमाम-अली-'नक़ी' के पोतेसय्यद-'जाफ़र' सानी के पोतेसय्यद अबुल-फ़रह सैदवाइल-वास्ती के पोतेमीराँ सय्यद-'अली'-बुज़ुर्ग के पोतेसय्यद-'हुसैन'-शरफ़ुद्दीन शाह-विलायत के पोतेक़ाज़ी सय्यद-'अमीर'-अली के पोतेदीवान सय्यद-'हामिद' के पोतेअल्लामा सय्यद-'शफ़ीक़'-हसन-एलिया के पोतेसय्यद-'जौन'-एलिया हसनी-उल-हुसैनी सपूत-जाह''
1वो सुब्ह कभी तो आएगीइन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगाजब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगाजब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नग़्मे गाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीजिस सुब्ह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर कर जीते हैंजिस सुब्ह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैंइन भूकी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीमाना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहींमिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहींइंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तौली जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीदौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगाचाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगाअपने काले करतूतों पर जब ये दुनिया शरमाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीबीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूक के और बेकारी केटूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारा-दारी केजब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीमजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फाँकेगामासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगाहक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीफ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इंसाँ न जलाए जाएँगेसीनों के दहकते दोज़ख़ में अरमाँ न जलाए जाएँगेये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बनाई जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगी2वो सुब्ह हमीं से आएगीजब धरती करवट बदलेगी जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगेजब पाप घरौंदे फूटेंगे जब ज़ुल्म के बंधन टूटेंगेउस सुब्ह को हम ही लाएँगे वो सुब्ह हमीं से आएगीवो सुब्ह हमीं से आएगीमनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म न पाले जाएँगेजब हाथ न काटे जाएँगे जब सर न उछाले जाएँगेजेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगीवो सुब्ह हमीं से आएगीसंसार के सारे मेहनत-कश खेतों से मिलों से निकलेंगेबे-घर बे-दर बे-बस इंसाँ तारीक बिलों से निकलेंगेदुनिया अम्न और ख़ुश-हाली के फूलों से सजाई जाएगीवो सुब्ह हमीं से आएगी
क्या सख़्त मकाँ बनवाता है ख़म तेरे तन का है पोलातू ऊँचे कोट उठाता है वाँ गोर गढ़े ने मुँह खोलाक्या रेनी ख़ंदक़ रन्द बड़े क्या ब्रिज कंगूरा अनमोलागढ़ कोट रहकला तोप क़िला क्या शीशा दारू और गोलासब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
आज फिर दर्द-ओ-ग़म के धागे मेंहम पिरो कर तिरे ख़याल के फूलतर्क-ए-उल्फ़त के दश्त से चुन करआश्नाई के माह ओ साल के फूलतेरी दहलीज़ पर सजा आएफिर तिरी याद पर चढ़ा आएबाँध कर आरज़ू के पल्ले मेंहिज्र की राख और विसाल के फूल
ये जीवन इक राह नहींइक दोराहा हैपहला रस्ताबहुत सहल हैइस में कोई मोड़ नहीं हैये रस्ताइस दुनिया से बेजोड़ नहीं हैइस रस्ते पर मिलते हैंरेतों के आँगनइस रस्ते पर मिलते हैंरिश्तों के बंधनइस रस्ते पर चलने वालेकहने को सब सुख पाते हैंलेकिनटुकड़े टुकड़े हो करसब रिश्तों में बट जाते हैंअपने पल्ले कुछ नहीं बचताबचती हैबे-नाम सी उलझनबचता हैसाँसों का ईंधनजिस में उन की अपनी हर पहचानऔर उन के सारे सपनेजल बुझते हैंइस रस्ते पर चलने वालेख़ुद को खो कर जग पाते हैंऊपर ऊपर तो जीते हैंअंदर अंदर मर जाते हैं
नग़्मे पले हैं दौलत-ए-गुफ़्तार से तिरीपाया है नुत्क़ चश्म-ए-सुख़न-बार से तिरीताक़त है दिल में नर्गिस-ए-बीमार से तिरीक्या क्या मिला है 'जोश' को सरकार से तिरीबाँके ख़याल हैं ख़म-ए-गर्दन लिए हुएहर शे'र की कलाई है कंगन लिए हुए
जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी सेक़त’-ए-त'अल्लुक़ हो के इंग्लिश में ग़ुस्सा करती हैमैं तो डर जाता हूँ लेकिनकमरे की दीवारें हँसने लगती हैंवो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब हैवो इक ऐसा फूल है जिस पर अपनी ख़ुशबू बोझ बनी हैवो इक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता हैउस को छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिनपानी कौन पकड़ सकता हैवो रंगों से वाक़िफ़ हैबल्कि हर इक रंग के शजरे तक से वाक़िफ़ हैउस को 'इल्म है किन ख़्वाबों से आँखें नीली पड़ जाती हैंहम ने जिन को नफ़रत से मंसूब कियावो उन पीले फूलों की 'इज़्ज़त करती हैकभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खींचती हैसब कुछ सीधा हो जाता हैवो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती हैसिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती हैहर पत्थर उस पावँ से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा हैलेकिन ये तो उसी अधूरे-पन का जहाँ हैहर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैंहर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैमेरी बे-मक़्सद बातों से तंग भी आ जाती है तोमहसूस नहीं होने देतीलेकिन अपने होने से उक्ता जाती हैउस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब हैवो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कॉलेज आ जाती है
दयार-ए-हिन्द था गहवारा याद है हमदमबहुत ज़माना हुआ किस के किस के बचपन काइसी ज़मीन पे खेला है 'राम' का बचपनइसी ज़मीन पे उन नन्हे नन्हे हाथों नेकिसी समय में धनुष-बान को सँभाला थाइसी दयार ने देखी है 'कृष्ण' की लीलायहीं घरोंदों में सीता सुलोचना राधाकिसी ज़माने में गुड़ियों से खेलती होंगीयही ज़मीं यही दरिया पहाड़ जंगल बाग़यही हवाएँ यही सुब्ह-ओ-शाम सूरज चाँदयही घटाएँ यही बर्क़-ओ-र'अद ओ क़ौस-ए-क़ुज़हयहीं के गीत रिवायात मौसमों के जुलूसहुआ ज़माना कि 'सिद्धार्थ' के थे गहवारेइन्ही नज़ारों में बचपन कटा था 'विक्रम' कासुना है 'भर्तृहरि' भी इन्हीं से खेला था'भरत' 'अगस्त्य' 'कपिल' 'व्यास' 'पाशी' 'कौटिल्य''जनक' 'वशिष्ठ' 'मनु' 'वाल्मीकि' 'विश्वामित्र''कणाद' 'गौतम' ओ 'रामानुज' 'कुमारिल-भट्ट'मोहनजोडारो हड़प्पा के और अजंता केबनाने वाले यहीं बल्लमों से खेले थेइसी हिंडोले में 'भवभूति' ओ 'कालीदास' कभीहुमक हुमक के जो तुतला के गुनगुनाए थेसरस्वती ने ज़बानों को उन की चूमा थायहीं के चाँद व सूरज खिलौने थे उन केइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन पला था 'ख़ुसरव' काइसी ज़मीं से उठे 'तानसेन' और 'अकबर''रहीम' 'नानक' ओ 'चैतन्य' और 'चिश्ती' नेइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन के दिन गुज़ारे थेइसी ज़मीं पे कभी शाहज़ादा-ए-'ख़ुर्रम'ज़रा सी दिल-शिकनी पर जो रो दिया होगाभर आया था दिल-ए-नाज़ुक तो क्या अजब इस मेंइन आँसुओं में झलक ताज की भी देखी हो'अहिल्याबाई' 'दमन' 'पदमिनी' ओ 'रज़िया' नेयहीं के पेड़ों की शाख़ों में डाले थे झूलेइसी फ़ज़ा में बढ़ाई थी पेंग बचपन कीइन्ही नज़ारों में सावन के गीत गाए थेइसी ज़मीन पे घुटनों के बल चले होंगे'मलिक-मोहम्मद' ओ 'रसखान' और 'तुलसी-दास'इन्हीं फ़ज़ाओं में गूँजी थी तोतली बोली'कबीर-दास' 'टुकाराम' 'सूर' ओ 'मीरा' कीइसी हिंडोले में 'विद्यापति' का कंठ खुलाइसी ज़मीन के थे लाल 'मीर' ओ 'ग़ालिब' भीठुमक ठुमक के चले थे घरों के आँगन में'अनीस' ओ 'हाली' ओ 'इक़बाल' और 'वारिस-शाह'यहीं की ख़ाक से उभरे थे 'प्रेमचंद' ओ 'टैगोर'यहीं से उठ्ठे थे तहज़ीब-ए-हिन्द के मेमारइसी ज़मीन ने देखा था बाल-पन इन कायहीं दिखाई थीं इन सब ने बाल-लीलाएँयहीं हर एक के बचपन ने तर्बियत पाईयहीं हर एक के जीवन का बालकांड खुलायहीं से उठते बगूलों के साथ दौड़े हैंयहीं की मस्त घटाओं के साथ झूमे हैंयहीं की मध-भरी बरसात में नहाए हैंलिपट के कीचड़ ओ पानी से बचपने उन केइसी ज़मीन से उठ्ठे वो देश के सावंतउड़ा दिया था जिन्हें कंपनी ने तोपों सेइसी ज़मीन से उठी हैं अन-गिनत नस्लेंपले हैं हिन्द हिंडोले में अन-गिनत बच्चेमुझ ऐसे कितने ही गुमनाम बच्चे खेले हैंइसी ज़मीं से इसी में सुपुर्द-ए-ख़ाक हुएज़मीन-ए-हिन्द अब आराम-गाह है उन कीइस अर्ज़-ए-पाक से उट्ठीं बहुत सी तहज़ीबेंयहीं तुलू हुईं और यहीं ग़ुरूब हुईंइसी ज़मीन से उभरे कई उलूम-ओ-फ़ुनूनफ़राज़-ए-कोह-ए-हिमाला ये दौर-ए-गंग-ओ-जमनऔर इन की गोद में पर्वर्दा कारवानों नेयहीं रुमूज़-ए-ख़िराम-ए-सुकूँ-नुमा सीखेनसीम-ए-सुब्ह-ए-तमद्दुन ने भैरवीं छेड़ीयहीं वतन के तरानों की वो पवें फूटेंवो बे-क़रार सुकूँ-ज़ा तरन्नुम-ए-सहरीवो कपकपाते हुए सोज़-ओ-साज़ के शोलेइन्ही फ़ज़ाओं में अंगड़ाइयाँ जो ले के उठेलवों से जिन के चराग़ाँ हुई थी बज़्म-ए-हयातजिन्हों ने हिन्द की तहज़ीब को ज़माना हुआबहुत से ज़ावियों से आईना दिखाया थाइसी ज़मीं पे ढली है मिरी हयात की शामइसी ज़मीन पे वो सुब्ह मुस्कुराई हैतमाम शोला ओ शबनम मिरी हयात की सुब्हसुनाऊँ आज कहानी मैं अपने बचपन कीदिल-ओ-दिमाग़ की कलियाँ अभी न चटकी थींहमेशा खेलता रहता था भाई बहनों मेंहमारे साथ मोहल्ले की लड़कियाँ लड़केमचाए रखते थे बालक उधम हर एक घड़ीलहू तरंग उछल-फाँद का ये आलम थामोहल्ला सर पे उठाए फिरे जिधर गुज़रेहमारे चहचहे और शोर गूँजते रहतेचहार-सम्त मोहल्ले के गोशे गोशे मेंफ़ज़ा में आज भी ला-रैब गूँजते होंगेअगरचे दूसरे बच्चों की तरह था मैं भीब-ज़ाहिर औरों के बचपन सा था मिरा बचपनये सब सही मिरे बचपन की शख़्सियत भी थी एकवो शख़्सियत कि बहुत शोख़ जिस के थे ख़द-ओ-ख़ालअदा अदा में कोई शान-ए-इन्फ़िरादी थीग़रज़ कुछ और ही लक्षण थे मेरे बचपन केमुझे था छोटे बड़ों से बहुत शदीद लगावहर एक पर मैं छिड़कता था अपनी नन्ही सी जाँदिल उमडा आता था ऐसा कि जी ये चाहता थाउठा के रख लूँ कलेजे में अपनी दुनिया कोमुझे है याद अभी तक कि खेल-कूद में भीकुछ ऐसे वक़्फ़े पुर-असरार आ ही जाते थेकि जिन में सोचने लगता था कुछ मिरा बचपनकई मआनी-ए-बे-लफ़्ज़ छूने लगते थेबुतून-ए-ग़ैब से मेरे शुऊर-ए-असग़र कोहर एक मंज़र-ए-मानूस घर का हर गोशाकिसी तरह की हो घर में सजी हुई हर चीज़मिरे मोहल्ले की गलियाँ मकाँ दर-ओ-दीवारचबूतरे कुएँ कुछ पेड़ झाड़ियाँ बेलेंवो फेरी वाले कई उन के भाँत भाँत के बोलवो जाने बूझे मनाज़िर वो आसमाँ ओ ज़मींबदलते वक़्त का आईना गर्मी-ओ-ख़ुनकीग़ुरूब-ए-महर में रंगों का जागता जादूशफ़क़ के शीश-महल में गुदाज़-ए-पिन्हाँ सेजवाहरों की चटानें सी कुछ पिघलती हुईंशजर हजर की वो कुछ सोचती हुई दुनियासुहानी रात की मानूस रमज़ियत का फ़ुसूँअलस्सबाह उफ़ुक़ की वो थरथराती भवेंकिसी का झाँकना आहिस्ता फूटती पौ सेवो दोपहर का समय दर्जा-ए-तपिश का चढ़ावथकी थकी सी फ़ज़ा में वो ज़िंदगी का उतारहुआ की बंसियाँ बंसवाड़ियों में बजती हुईंवो दिन के बढ़ते हुए साए सह-पहर का सुकूँसुकूत शाम का जब दोनों वक़्त मिलते हैंग़रज़ झलकते हुए सरसरी मनाज़िर परमुझे गुमान परिस्तानियत का होता थाहर एक चीज़ की वो ख़्वाब-नाक अस्लिय्यतमिरे शुऊर की चिलमन से झाँकता था कोईलिए रुबूबियत-ए-काएनात का एहसासहर एक जल्वे में ग़ैब ओ शुहूद का वो मिलापहर इक नज़ारा इक आईना-ख़ाना-ए-हैरतहर एक मंज़र-ए-मानूस एक हैरत-ज़ारकहीं रहूँ कहीं खेलों कहीं पढ़ूँ लिखूँमिरे शुऊर पे मंडलाते थे मनाज़िर-ए-दहरमैं अक्सर उन के तसव्वुर में डूब जाता थावफ़ूर-ए-जज़्बा से हो जाती थी मिज़ा पुर-नममुझे यक़ीन है इन उन्सुरी मनाज़िर सेकि आम बच्चों से लेता था मैं ज़ियादा असरकिसी समय मिरी तिफ़्ली रही न बे-परवान छू सकी मिरी तिफ़्ली को ग़फ़लत-ए-तिफ़्लीये खेल-कूद के लम्हों में होता था एहसासदुआएँ देता हो जैसे मुझे सुकूत-ए-दवामकि जैसे हाथ अबद रख दे दोश-ए-तिफ़्ली परहर एक लम्हा के रख़नों से झाँकती सदियाँकहानियाँ जो सुनूँ उन में डूब जाता थाकि आदमी के लिए आदमी की जग-बीतीसे बढ़ के कौन सी शय और हो ही सकती हैइन्ही फ़सानों में पिन्हाँ थे ज़िंदगी के रुमूज़इन्ही फ़सानों में खुलते थे राज़-हा-ए-हयातउन्हें फ़सानों में मिलती थीं ज़ीस्त की क़द्रेंरुमूज़-ए-बेश-बहा ठेठ आदमियत केकहानियाँ थीं कि सद-दर्स-गाह-ए-रिक़्क़त-ए-क़ल्बहर इक कहानी में शाइस्तगी-ए-ग़म का सबक़वो उंसुर आँसुओं का दास्तान-ए-इंसाँ मेंवो नल-दमन की कथा सरगुज़श्त-ए-सावित्री'शकुन्तला' की कहानी 'भरत' की क़ुर्बानीवो मर्ग-ए-भीष्म-पितामह वो सेज तीरों कीवो पांचों पांडव की स्वर्ग-यात्रा की कथावतन से रुख़्सत-ए-'सिद्धार्थ' 'राम' का बन-बासवफ़ा के ब'अद भी 'सीता' की वो जिला-वतनीवो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुएबला की क़ैद से 'बसदेव' का निकल जानावो अंधकार वो बारिश, बढ़ी हुई जमुनाग़म-ए-आफ़रीन कहानी वो 'हीर' 'राँझा' कीशुऊर-ए-हिन्द के बचपन की यादगार-ए-अज़ीमकि ऐसे वैसे तख़य्युल की साँस उखड़ जाएकई मुहय्युर-ए-इदराक देव-मालाएँहितोपदेश के क़िस्से कथा सरत-सागरकरोड़ों सीनों में वो गूँजता हुआ आल्हामैं पूछता हूँ किसी और मलक वालों सेकहानियों की ये दौलत ये बे-बहा दौलतफ़साने देख लो इन के नज़र भी आती हैमैं पूछता हूँ कि गहवारे और क़ौमों केबसे हुए हैं कहीं ऐसी दास्तानों सेकहानियाँ जो मैं सुनता था अपने बचपन मेंमिरे लिए वो न थीं महज़ बाइस-ए-तफ़रीहफ़सानों से मिरे बचपन ने सोचना सीखाफ़सानों से मुझे संजीदगी के दर्स मिलेफ़सानों में नज़र आती थी मुझ को ये दुनियाग़म ओ ख़ुशी में रची प्यार में बसाई हुईफ़सानों से मिरे दिल ने घुलावटें पाईंयही नहीं कि मशाहीर ही के अफ़्सानेज़रा सी उम्र में करते हों मुझ को मुतअस्सिरमोहल्ले टोले के गुमनाम आदमिय्यों केकुछ ऐसे सुनने में आते थे वाक़िआत-ए-हयातजों यूँ तो होते थे फ़र्सूदा और मामूलीमगर थे आईने इख़्लास और शराफ़त केये चंद आई गई बातें ऐसी बातें थींकि जिन की ओट चमकता था दर्द-ए-इंसानीये वारदात नहीं रज़्मिय्ये हयात के थेग़रज़ कि ये हैं मिरे बचपने की तस्वीरेंनदीम और भी कुछ ख़त्त-ओ-ख़ाल हैं उन केये मेरी माँ का है कहना कि जब मैं बच्चा थामैं ऐसे आदमी की गोद में न जाता थाजो बद-क़िमार हो एेबी हो या हो बद-सूरतमुझे भी याद है नौ दस बरस ही का मैं थातो मुझ पे करता था जादू सा हुस्न-ए-इंसानीकुछ ऐसा होता था महसूस जब मैं देखता थाशगुफ़्ता रंग तर-ओ-ताज़ा रूप वालों काकि उन की आँच मिरी हड्डियाँ गला देगीइक आज़माइश-ए-जाँ थी कि था शुऊर-ए-जमालऔर उस की नश्तरिय्यत उस की उस्तुखाँ-सोज़ीग़म ओ नशात लगावट मोहब्बत ओ नफ़रतइक इंतिशार-ए-सकूँ इज़्तिराब प्यार इताबवो बे-पनाह ज़की-उल-हिसी वो हिल्म ओ ग़ुरूरकभी कभी वो भरे घर में हिस्स-ए-तंहाईवो वहशतें मिरी माहौल-ए-ख़ुश-गवार में भीमिरी सरिश्त में ज़िद्दैन के कई जोड़ेशुरूअ ही से थे मौजूद आब-ओ-ताब के साथमिरे मिज़ाज में पिन्हाँ थी एक जदलिय्यतरगों में छूटते रहते थे बे-शुमार अनारनदीम ये हैं मिरे बाल-पन के कुछ आसारवफ़ूर ओ शिद्दत-ए-जज़्बात का ये आलम थाकि कौंदे जस्त करें दिल के आबगीने मेंवो बचपना जिसे बर्दाश्त अपनी मुश्किल होवो बचपना जो ख़ुद अपनी ही तेवरियाँ सी चढ़ाएनदीम ज़िक्र-ए-जवानी से काँप जाता हूँजवानी आई दबे पाँव और यूँ आईकि उस के आते ही बिगड़ा बना-बनाया खेलवो ख़्वाहिशात के जज़्बात के उमडते हुएवो होंकते हुए बे-नाम आग के तूफ़ाँवो फूटता हुआ ज्वाला-मुखी जवानी कारगों में उठती हुई आँधियों के वो झटकेकि जो तवाज़ुन-ए-हस्ती झिंझोड़ के रख देंवो ज़लज़ले कि पहाड़ों के पैर उखड़ जाएँबुलूग़ियत की वो टीसें वो कर्ब-ए-नश्व-ओ-नुमाऔर ऐसे में मुझे ब्याहा गया भला किस सेजो हो न सकती थी हरगिज़ मिरी शरीक-ए-हयातहम एक दूसरे के वास्ते बने ही न थेसियाह हो गई दुनिया मिरी निगाहों मेंवो जिस को कहते हैं शादी-ए-ख़ाना-आबादीमिरे लिए वो बनी बेवगी जवानी कीलुटा सुहाग मिरी ज़िंदगी का मांडो मेंनदीम खा गई मुझ को नज़र जवानी कीबला-ए-जान मुझे हो गया शुऊर-ए-जमालतलाश-ए-शोला-ए-उलफ़त से ये हुआ हासिलकि नफ़रतों का अगन-कुंड बन गई हस्तीवो हल्क़ ओ सीना ओ रग रग में बे-पनाह चुभानदीम जैसे निगल ली हो मैं ने नाग-फनीज़ इश्क़-ज़ादम ओ इशक़म कमुश्त ज़ार-ओ-दरेग़ख़बर न बुर्द ब-रुस्तम कसे कि सोहरा-बमन पूछ आलम-ए-काम-ओ-दहन नदीम मिरेसमर हयात का जब राख बिन गया मुँह मेंमैं चलती-फिरती चिता बन गया जवानी कीमैं कांधा देता रहा अपने जीते मुर्दे कोये सोचता था कि अब क्या करूँ कहाँ जाऊँबहुत से और मसाइब भी मुझ पे टूट पड़ेमैं ढूँढने लगा हर सम्त सच्ची झूटी पनाहतलाश-ए-हुस्न में शेर-ओ-अदब में दोस्ती मेंरुँधी सदा से मोहब्बत की भीक माँगी हैनए सिरे से समझना पड़ा है दुनिया कोबड़े जतन से सँभाला है ख़ुद को मैं ने नदीममुझे सँभलने में तो चालीस साल गुज़रे हैंमेरी हयात तो विश-पान की कथा है नदीममैं ज़हर पी के ज़माने को दे सका अमृतन पूछ मैं ने जो ज़हराबा-ए-हयात पियामगर हूँ दिल से मैं इस के लिए सिपास-गुज़ारलरज़ते हाथों से दामन ख़ुलूस का न छटाबचा के रक्खी थी मैं ने अमानत-ए-तिफ़्लीइसे न छीन सकी मुझ से दस्त-बुर्द-ए-शबाबब-क़ौल शाएर-ए-मुल्क-ए-फ़रंग हर बच्चाख़ुद अपने अहद-ए-जवानी का बाप होता हैये कम नहीं है कि तिफ़्ली-ए-रफ़्ता छोड़ गईदिल-ए-हज़ीं में कई छोटे छोटे नक़्श-ए-क़दममिरी अना की रगों में पड़े हुए हैं अभीन जाने कितने बहुत नर्म उँगलियों के निशाँहनूज़ वक़्त के बे-दर्द हाथ कर न सकेहयात-ए-रफ़्ता की ज़िंदा निशानियों को फ़नाज़माना छीन सकेगा न मेरी फ़ितरत सेमिरी सफ़ा मिरे तहतुश-शुऊर की इस्मततख़य्युलात की दोशीज़गी का रद्द-ए-अमलजवान हो के भी बे-लौस तिफ़ल-वश जज़्बातस्याना होने पे भी ये जिबिल्लतें मेरीये सरख़ुशी ओ ग़म बे-रिया ये क़ल्ब-गुदाज़बग़ैर बैर के अन-बन ग़रज़ से पाक तपाकग़रज़ से पाक ये आँसू ग़रज़ से पाक हँसीये दश्त-ए-दहर में हमदर्दियों का सरचश्माक़ुबूलियत का ये जज़्बा ये काएनात ओ हयातइस अर्ज़-ए-पाक पर ईमान ये हम-आहंगीहर आदमी से हर इक ख़्वाब ओ ज़ीस्त से ये लगावये माँ की गोद का एहसास सब मनाज़िर मेंक़रीब ओ दूर ज़मीं में ये बू-ए-वतनिय्यतनिज़ाम-ए-शमस-ओ-क़मर में पयाम-ए-हिफ़्ज़-ए-हयातब-चश्म-ए-शाम-ओ-सहर मामता की शबनम सीये साज़ ओ दिल में मिरे नग़्मा-ए-अनलकौनैनहर इज़्तिराब में रूह-ए-सुकून-ए-बे-पायाँज़माना-ए-गुज़राँ में दवाम का सरगमये बज़्म-ए-जश्न-ए-हयात-ओ-ममात सजती हुईकिसी की याद की शहनाइयाँ सी बजती हुईये रमज़ीत के अनासिर शुऊर-ए-पुख़्ता मेंफ़लक पे वज्द में लाती है जो फ़रिश्तों कोवो शाएरी भी बुलूग़-ए-मिज़ाज-ए-तिफ़्ली हैये नश्तरिय्यत-ए-हस्ती ये इस की शेरियतये पत्ती पत्ती पे गुलज़ार-ए-ज़िंदगी के किसीलतीफ़ नूर की परछाइयाँ सी पड़ती हुईबहम ये हैरत ओ मानूसियत की सरगोशीबशर की ज़ात कि महर-ए-उलूहियत ब-जबींअबद के दिल में जड़ें मारता हुआ सब्ज़ाग़म-ए-जहाँ मुझे आँखें दिखा नहीं सकताकि आँखें देखे हुए हूँ मैं ने अपने बचपन कीमिरे लहू में अभी तक सुनाई देती हैंसुकूत-ए-हुज़्न में भी घुंघरुओं की झंकारेंये और बात कि मैं इस पे कान दे न सकूँइसी वदीअत-ए-तिफ़्ली का अब सहारा हैयही हैं मर्हम-ए-काफ़ूर दिल के ज़ख़्मों परउन्ही को रखना है महफ़ूज़ ता-दम-ए-आख़िरज़मीन-ए-हिन्द है गहवारा आज भी हमदमअगर हिसाब करें दस करोड़ बच्चों काये बच्चे हिन्द की सब से बड़ी अमानत हैंहर एक बच्चे में हैं सद-जहान-ए-इम्कानातमगर वतन का हल-ओ-अक़्द जिन के हाथ में हैनिज़ाम-ए-ज़िंदगी-ए-हिंद जिन के बस में हैरवय्या देख के उन का ये कहना पड़ता हैकिसे पड़ी है कि समझे वो इस अमानत कोकिसे पड़ी है कि बच्चों की ज़िंदगी को बचाएख़राब होने से टलने से सूख जाने सेबचाए कौन इन आज़ुर्दा होनहारों कोवो ज़िंदगी जिसे ये दे रहे हैं भारत कोकरोड़ों बच्चों के मिटने का इक अलमिय्या हैचुराए जाते हैं बच्चे अभी घरों से यहाँकि जिस्म तोड़ दिए जाएँ उन के ताकि मिलेचुराने वालों को ख़ैरात माघ-मेले कीजो इस अज़ाब से बच जाएँ तो गले पड़ जाएँवो लानतें कि हमारे करोड़ों बच्चों कीनदीम ख़ैर से मिट्टी ख़राब हो जाएवो मुफ़्लिसी कि ख़ुशी छीन ले वो बे-बरगीउदासियों से भरी ज़िंदगी की बे-रंगीवो यासियात न जिस को छुए शुआ-ए-उमीदवो आँखें देखती हैं हर तरफ़ जो बे-नूरीवो टुकटुकी कि जो पथरा के रह गई हो नदीमवो बे-दिली की हँसी छीन ले जो होंटों सेवो दुख कि जिस से सितारों की आँख भर आएवो गंदगी वो कसाफ़त मरज़-ज़दा पैकरवो बच्चे छिन गए हों जिन से बचपने उन केहमीं ने घोंट दिया जिस के बचपने का गलाजो खाते-पीते घरों के हैं बच्चे उन को भी क्यासमाज फूलने-फलने के दे सका साधनवो साँस लेते हैं तहज़ीब-कुश फ़ज़ाओं मेंहम उन को देते हैं बे-जान और ग़लत तालीममिलेगा इल्म-ए-जिहालत-नुमा से क्या उन कोनिकल के मदरसों और यूनीवर्सिटिय्यों सेये बद-नसीब न घर के न घाट के होंगेमैं पूछता हूँ ये तालीम है कि मक्कारीकरोड़ों ज़िंदगियों से ये बे-पनाह दग़ानिसाब ऐसा कि मेहनत करें अगर इस परबजाए इल्म जहालत का इकतिसाब करेंये उल्टा दर्स-ए-अदब ये सड़ी हुई तालीमदिमाग़ की हो ग़िज़ा या ग़िज़ा-ए-जिस्मानीहर इक तरह की ग़िज़ा में यहाँ मिलावट हैवो जिस को बच्चों की तालीम कह के देते हैंवो दर्स उल्टी छुरी है गले पे बचपन केज़मीन-ए-हिन्द हिण्डोला नहीं है बच्चों काकरोड़ों बच्चों का ये देस अब जनाज़ा हैहम इंक़लाब के ख़तरों से ख़ूब वाक़िफ़ हैंकुछ और रोज़ यही रह गए जो लैल-ओ-नहारतो मोल लेना पड़ेगा हमें ये ख़तरा भीकि बच्चे क़ौम की सब से बड़ी अमानत हैं
मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतनगुल-पोश तेरी वादियाँफ़रहत-निशाँ राहत-रसाँतेरे चमन-ज़ारों पे हैगुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँहर शाख़ फूलों की छड़ीहर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँकौसर के चश्मे जा-ब-जातसनीम हर आब-ए-रवाँहर बर्ग रूह-ए-ताज़गीहर फूल जान-ए-गुल्सिताँहर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशीहर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँदिलकश चरागाहें तिरीढोरों के जिन में कारवाँअंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौहर तख़्ता-ए-गुल आसमाँनक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जाहर हर रविश इक कहकशाँतेरी बहारें दाइमीतेरी बहारें जावेदाँतुझ में है रूह-ए-ज़िंदगीपैहम रवाँ पैहम दवाँदरिया वो तेरे तुंद-ख़ूझीलें वो तेरी बे-कराँशाम-ए-अवध के लब पे हैहुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँकहती है राज़-ए-सरमदीसुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँउड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक परउन कार-ख़ानों का धुआँजिन में हैं लाखों मेहनतीसनअत-गरी के पासबाँतेरी बनारस की ज़रीरश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँबीदर की फ़नकारी में हैंसनअत की सब बारीकियाँअज़्मत तिरे इक़बाल कीतेरे पहाड़ों से अयाँदरियाओं का पानी, तरीतक़्दीस का अंदाज़ा-दाँक्या 'भारतेंदु' ने कियागंगा की लहरों का बयाँ'इक़बाल' और चकबस्त हैंअज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैंतेरे अदब के तर्जुमाँ'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरीतारीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँगाते हैं नग़्मा मिल के सबऊँचा रहे तेरा निशाँमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतेरे नज़ारों के नगींदुनिया की ख़ातम में नहींसारे जहाँ में मुंतख़बकश्मीर की अर्ज़-ए-हसींफ़ितरत का रंगीं मोजज़ाफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींहाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमींसरसब्ज़ जिस के दश्त हैंजिस के जबल हैं सुर्मगींमेवे ब-कसरत हैं जहाँशीरीं मिसाल-ए-अंग्बींहर ज़ाफ़राँ के फूल मेंअक्स-ए-जमाल-ए-हूरईंवो मालवे की चाँदनीगुम जिस में हों दुनिया-ओ-दींइस ख़ित्ता-ए-नैरंग मेंहर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रींहर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगीदिलकश मकाँ दिलकश ज़मींहर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रूहर एक औरत नाज़नींवो ताज की ख़ुश-पैकरीहर ज़ाविए से दिल-नशींसनअत-गरों के दौर कीइक यादगार-ए-मरमरींहोती है जो हर शाम कोफ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरींदरिया की मौजों से अलगया इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बींया ताएर-ए-नूरी कोईपर्वाज़ करने के क़रींया अहल-ए-दुनिया से अलगइक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ीनक़्श-ए-अजंता की क़समजचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चींशान-ए-एलोरा देख करझुकती है आज़र की जबींचित्तौड़ हो या आगराऐसे नहीं क़िलए कहींबुत-गर हो या नक़्क़ाश होतू सब की अज़्मत का अमींमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनदिलकश तिरे दश्त ओ चमनरंगीं तिरे शहर ओ चमनतेरे जवाँ राना जवाँतेरे हसीं गुल पैरहनइक अंजुमन दुनिया है येतू इस में सद्र-ए-अंजुमनतेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवाशाएर तिरे शीरीं-सुख़नहर ज़र्रा इक माह-ए-मुबींहर ख़ार रश्क-ए-नस्तरींग़ुंचा तिरे सहरा का हैइक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतनकंकर हैं तेरे बे-बहापत्थर तिरे लाल-ए-यमनबस्ती से जंगल ख़ूब-तरबाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बनवो मोर वो कब्क-ए-दरीवो चौकड़ी भरते हिरनरंगीं-अदा वो तितलियाँबाँबी में वो नागों के फनवो शेर जिन के नाम सेलरज़े में आए अहरमनखेतों की बरकत से अयाँफ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिननचश्मों के शीरीं आब सेलज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहनताबिंदा तेरा अहद-ए-नौरौशन तिरा अहद-ए-कुहनकितनों ने तुझ पर कर दियाक़ुर्बान अपना माल धनकितने शहीदों को मिलेतेरे लिए दार-ओ-रसनकितनों को तेरा इश्क़ थाकितनों को थी तेरी लगनतेरे जफ़ा-कश मेहनतीरखते हैं अज़्म-ए-कोहकनतेरे सिपाही सूरमाबे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन'भीषम' सा जिन में हौसला'अर्जुन' सा जिन में बाँकपनआलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैंफ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल''दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण''वलाठोल', 'माहिर', भारती'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन''कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद''टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन'मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनखेती तिरी हर इक हरीदिलकश तिरी ख़ुश-मंज़रीतेरी बिसात-ए-ख़ाक केज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरीझेलम कावेरी नाग वोगंगा की वो गंगोत्रीवो नर्बदा की तमकनतवो शौकत-ए-गोदावरीपाकीज़गी सरजू की वोजमुना की वो ख़ुश-गाैहरीदुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँकश्मीर की नीलम-परीदिलकश पपीहे की सदाकोयल की तानें मद-भरीतीतर का वो हक़ सिर्रहुतूती का वो विर्द-ए-हरीसूफ़ी तिरे हर दौर मेंकरते रहे पैग़म्बरी'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिलीफ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरीअदल-ए-जहाँगीरी में थीमुज़्मर रेआया-पर्वरीवो नव-रतन जिन से हुईतहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरीरखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़लइक सौलत-ए-अस्कंदरीरानाओं के इक़बाल कीहोती है किस से हम-सरीसावंत वो योद्धा तिरेतेरे जियाले वो जरीनीती विदुर की आज तककरती है तेरी रहबरीअब तक है मशहूर-ए-ज़माँ'चाणक्य' की दानिश-वरीवयास और विश्वामित्र सेमुनियों की शान-ए-क़ैसरीपातंजलि ओ साँख सेऋषियों की हिकमत-पर्वरीबख़्शे तुझे इनआम-ए-नौहर दौर चर्ख़-ए-चम्बरीख़ुश-गाैहरी दे आब कोऔर ख़ाक को ख़ुश-जौहरीज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँक़तरों को दरिया-गुस्तरीमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतू रहबर-ए-नौ-ए-बशरतू अम्न का पैग़ाम-बरपाले हैं तू ने गोद मेंसाहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़रअफ़ज़ल-तरीं इन सब में हैबापू का नाम-ए-मो'तबरहर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशींहर बात जिस की पुर-असरजिस ने लगाया दहर मेंनारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तरबे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँबे-सूद हैं तेग़-ओ-तबरहिंसा का रस्ता झूट हैहक़ है अहिंसा की डगरदरमाँ है ये हर दर्द काये हर मरज़ का चारा-गरजंगाह-ए-आलम में कोईइस से नहीं बेहतर सिपरकरता हूँ मैं तेरे लिएअब ये दुआ-ए-मुख़्तसररौनक़ पे हों तेरे चमनसरसब्ज़ हों तेरे शजरनख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरीहर फ़स्ल में हो बारवरकोशिश हो दुनिया में कोईख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बरतेरा हर इक बासी रहेनेको-सिफ़त नेको-सियरहर ज़न सलीक़ा-मंद होहर मर्द हो साहिब-हुनरजब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लकजब तक हैं ये शम्स ओ क़मरमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतन
मस्जिद का गुम्बद सूना हैमंदिर की घंटी ख़ामोशजुज़दानों में लिपटे आदर्शों कोदीमक कब की चाट चुकी हैरंगगुलाबीनीलेपीलेकहीं नहीं हैंतुम उस जानिबमैं इस जानिबबीच में मीलों गहरा ग़ारलफ़्ज़ों का पुल टूट चुका हैतुम भी तन्हामैं भी तन्हा
इक परिंदा किसी इक पेड़ की टहनी पे चहकता है कहींएक गाता हुआ यूँ जाता है धरती से फ़लक की जानिबपूरी क़ुव्वत से कोई गेंद उछाले जैसेइक फुदकता है सर-ए-शाख़ पे जिस तरह कोईआमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी की ख़ुशी में नाचेगूँदनी बोझ से अपने ही झुकी पड़ती हैनाज़नीं जैसे है कोई ये भरी महफ़िल मेंऔर कल हाथ हुए हैं पीलेकोयलें कूकती हैंजामुनें पक्की हैं, आमों पे बहार आई हैअरग़नूँ बजता है यकजाई कानीम के पेड़ों में झूले हैं जिधर देखो उधरसावनी गाती हैं सब लड़कियाँ आवाज़ मिला कर हर-सूऔर इस आवाज़ से गूँज उट्ठी है बस्ती सारीमैं कभी एक कभी दूसरे झूले के क़रीं जाता हूँएक ही कम है, वही चेहरा नहींआख़िरश पूछ ही लेता हूँ किसी से बढ़ करक्यूँ हबीबा नहीं आई अब तक?खिलखिला पड़ती हैं सब लड़कियाँ सुन कर ये नामलो ये सपने में हैं, इक कहती हैबाओली सपना नहीं, शहर से आए हैं अभीदूसरी टोकती हैबात से बात निकल चलती हैठाट की आई थी बारात, चम्बेली ने कहाबैंड-बाजा भी था, दीपा बोलीऔर दुल्हन पे हुआ कितना बिखेरकुछ न कुछ कहती रहीं सब ही मगर मैं ने सिर्फ़इतना पूछा वो नदी बहती है अब भी, कि नहींजिस से वाबस्ता हैं हम और ये बस्ती सारी?क्यूँ नहीं बहती, चम्बेली ने कहाऔर वो बरगद का घना पेड़ किनारे उस के?वो भी क़ाएम है अभी तक यूँहीवादा कर के जो 'हबीबा' नहीं आती थी कभीआँखें धोता था नदी में जाकरऔर बरगद की घनी छाँव में सो जाता था
इस गिरानी में भला क्या ग़ुंचा-ए-ईमाँ खिलेजौ के दाने सख़्त हैं ताँबे के सिक्के पिल-पिलेजाएँ कपड़े के लिए तो दाम सुन कर दिल हिलेजब गरेबाँ ता-ब-दामन आए तो कपड़ा मिले
1सियाह पेड़ हैं अब आप अपनी परछाईंज़मीं से ता-मह-ओ-अंजुम सुकूत के मीनारजिधर निगाह करें इक अथाह गुम-शुदगीइक एक कर के फ़सुर्दा चराग़ों की पलकेंझपक गईं जो खुली हैं झपकने वाली हैंझलक रहा है पड़ा चाँदनी के दर्पन मेंरसीले कैफ़ भरे मंज़रों का जागता ख़्वाबफ़लक पे तारों को पहली जमाहियाँ आईं2तमोलियों की दूकानें कहीं कहीं हैं खुलीकुछ ऊँघती हुई बढ़ती हैं शाह-राहों परसवारियों के बड़े घुंघरूओं की झंकारेंखड़ा है ओस में चुप-चाप हर सिंगार का पेड़दुल्हन हो जैसे हया की सुगंध से बोझलये मौज-ए-नूर ये भरपूर ये खिली हुई रातकि जैसे खिलता चला जाए इक सफ़ेद कँवलसिपाह-ए-रूस है अब कितनी दूर बर्लिन सेजगा रहा है कोई आधी रात का जादूछलक रही है ख़ुम-ए-ग़ैब से शराब-ए-वजूदफ़ज़ा-ए-नीम नर्गिस-ए-ख़ुमारआलूदकँवल की चुटकियों में बंद है नदी का सुहाग3ये रस का सेज ये सुकुमार ये सुकोमल गातनयन कमल की झपक काम-रूप का जादूये रस्मसाई पलक की घनी घनी परछाईंफ़लक पे बिखरे हुए चाँद और सितारों कीचमकती उँगलियों से छिड़ के साज़ फ़ितरत केतराने जागने वाले हैं तुम भी जाग उठो4शुआ-ए-महर ने यूँ उन को चूम चूम लियानदी के बीच कुमुदनी के फूल खिल उठ्ठेन मुफ़्लिसी हो तो कितनी हसीन है दुनियाये झाएँ झाएँ सी रह रह के एक झींगुर कीहिना की टट्टियों में नर्म सरसराहट सीफ़ज़ा के सीने में ख़ामोश सनसनाहट सीये काएनात अब इक नींद ले चुकी होगी5ये महव-ए-ख़्वाब हैं रंगीन मछलियाँ तह-ए-आबकि हौज़-ए-सेहन में अब इन की चश्मकें भी नहींये सर-निगूँ हैं सर-ए-शाख़ फूल गुड़हल केकि जैसे बे-बुझे अंगारे ठंडे पड़ जाएँये चाँदनी है कि उमडा हुआ है रस-सागरइक आदमी है कि इतना दुखी है दुनिया में6क़रीब चाँद के मंडला रही है इक चिड़ियाभँवर में नूर के करवट से जैसे नाव चलेकि जैसे सीना-ए-शाइर में कोई ख़्वाब पलेवो ख़्वाब साँचे में जिस के नई हयात ढलेवो ख़्वाब जिस से पुराना निज़ाम-ए-ग़म बदलेकहाँ से आती है मदमालती लता की लिपटकि जैसे सैकड़ों परियाँ गुलाबियाँ छिड़काएँकि जैसे सैकड़ों बन-देवियों ने झूले परअदा-ए-ख़ास से इक साथ बाल खोल दिएलगे हैं कान सितारों के जिस की आहट परइस इंक़लाब की कोई ख़बर नहीं आतीदिल-ए-नुजूम धड़कते हैं कान बजते हैं7ये साँस लेती हुई काएनात ये शब-ए-माहये पुर-सुकूँ ये पुर-असरार ये उदास समाँये नर्म नर्म हवाओं के नील-गूँ झोंकेफ़ज़ा की ओट में मर्दों की गुनगुनाहट हैये रात मौत की बे-रंग मुस्कुराहट हैधुआँ धुआँ से मनाज़िर तमाम नम-दीदाख़ुनुक धुँदलके की आँखें भी नीम ख़्वाबीदासितारे हैं कि जहाँ पर है आँसुओं का कफ़नहयात पर्दा-ए-शब में बदलती है पहलूकुछ और जाग उठा आधी रात का जादूज़माना कितना लड़ाई को रह गया होगामिरे ख़याल में अब एक बज रहा होगा8गुलों ने चादर-ए-शबनम में मुँह लपेट लियालबों पे सो गई कलियों की मुस्कुराहट भीज़रा भी सुम्बुल-ए-तुर्की लटें नहीं हिलतींसुकूत-ए-नीम-शबी की हदें नहीं मिलतींअब इंक़लाब में शायद ज़ियादा देर नहींगुज़र रहे हैं कई कारवाँ धुँदलके मेंसुकूत-ए-नीम-शबी है उन्हीं के पाँव की चापकुछ और जाग उठा आधी रात का जादू9नई ज़मीन नया आसमाँ नई दुनियानए सितारे नई गर्दिशें नए दिन रातज़मीं से ता-ब-फ़लक इंतिज़ार का आलमफ़ज़ा-ए-ज़र्द में धुँदले ग़ुबार का आलमहयात मौत-नुमा इंतिशार का आलमहै मौज-ए-दूद कि धुँदली फ़ज़ा की नब्ज़ें हैंतमाम ख़स्तगी-ओ-माँदगी ये दौर-ए-हयातथके थके से ये तारे थकी थकी सी ये रातये सर्द सर्द ये बे-जान फीकी फीकी चमकनिज़ाम-ए-सानिया की मौत का पसीना हैख़ुद अपने आप में ये काएनात डूब गईख़ुद अपनी कोख से फिर जगमगा के उभरेगीबदल के केचुली जिस तरह नाग लहराए10ख़ुनुक फ़ज़ाओं में रक़्साँ हैं चाँद की किरनेंकि आबगीनों पे पड़ती है नर्म नर्म फुवारये मौज-ए-ग़फ़लत-ए-मासूम ये ख़ुमार-ए-बदनये साँस नींद में डूबी ये आँख मदमातीअब आओ मेरे कलेजे से लग के सो जाओये पलकें बंद करो और मुझ में खो जाओ
चंद बेवाओं के मदक़ूक़ से पीले चेहरेकुछ हवस-कार निगाहों में उतर जाते हैंजिन के अफ़्लास-ज़दा जिस्म, ढलकते सीनेचंद सिक्कों के एवज़ शब को बिका करते हैं
काली बलाएँ सर पर पालेशाम अवध की डेरा डालेऐसे में कौन अपने को सँभाले
बोल! अरी ओ धरती बोल!राज सिंघासन डाँवाडोलबादल बिजली रैन अँधयारीदुख की मारी प्रजा सारीबूढ़े बच्चे सब दुखिया हैंदुखिया नर हैं दुखिया नारीबस्ती बस्ती लूट मची हैसब बनिए हैं सब ब्योपारीबोल! अरी ओ धरती बोल!राज सिंघासन डाँवाडोलकलजुग में जग के रखवालेचाँदी वाले सोने वालेदेसी हों या परदेसी होंनीले पीले गोरे कालेमक्खी भिंगे भिन भिन करतेढूँडे हैं मकड़ी के जालेबोल! अरी ओ धरती बोल!राज सिंघासन डाँवाडोलक्या अफ़रंगी क्या तातारीआँख बची और बर्छी मारीकब तक जनता की बेचैनीकब तक जनता की बे-ज़ारीकब तक सरमाया के धंदेकब तक ये सरमाया-दारीबोल! अरी ओ धरती बोल!राज सिंघासन डाँवाडोलनामी और मशहूर नहीं हमलेकिन क्या मज़दूर नहीं हमधोका और मज़दूरों को देंऐसे तो मजबूर नहीं हममंज़िल अपने पाँव के नीचेमंज़िल से अब दूर नहीं हमबोल! अरी ओ धरती बोल!राज सिंघासन डाँवाडोलबोल कि तेरी ख़िदमत की हैबोल कि तेरा काम किया हैबोल कि तेरे फल खाए हैंबोल कि तेरा दूध पिया हैबोल कि हम ने हश्र उठायाबोल कि हम से हश्र उठा हैबोल कि हम से जागी दुनियाबोल कि हम से जागी धरतीबोल! अरी ओ धरती बोल!राज सिंघासन डाँवाडोल
पंखे की स्पीड बढ़ाओकाठमांडो नेपाल में हैसारतर की बीवी कैसी हैहम बंदर के पोते हैंमेरठ से क़ैंची भी लाए
लेकिन हम इन फ़ज़ाओं के पाले हुए तो हैंगर याँ नहीं तो याँ से निकाले हुए तो हैं
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