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नज़्म
पुलंदा ये किताबों का नहीं उठता मुसीबत है
भला इतनी बहुत सी कापियों की क्या ज़रूरत है
सय्यदा फ़रहत
नज़्म
मुद्दत से हो रहा है जिन का मकाँ पुराना
उठ के है उन को मेंह में हर आन छत पे जाना
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
वो 'भगत-सिंह' अब भी जिस के ग़म में दिल नाशाद है
उस की गर्दन में जो डाला था वो फंदा याद है
जोश मलीहाबादी
नज़्म
वो ख़्वाब साँचे में जिस के नई हयात ढले
वो ख़्वाब जिस से पुराना निज़ाम-ए-ग़म बदले
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
हम ने बकरी के बच्चों को कमरों में नचाना छोड़ दिया
नाराज़ न हो अम्मी हम ने हर शौक़ पुराना छोड़ दिया
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
आख़िरी दौर में भी तुझ को क़सम है साक़ी
भर के इक जाम न प्यासों को पिलाना हरगिज़