aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "raavan"
हर दम अबदी राहत का समाँ दिखला के हमें दिल-गीर न करलिल्लाह हबाब-ए-आब-ए-रवाँ पर नक़्श-ए-बक़ा तहरीर न करमायूसी के रमते बादल पर उम्मीद के घर तामीर न कर
ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मरये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर
संग को गौहर-ए-नायाब-ओ-गिराँ जाना थादश्त-ए-पुर-ख़ार को फ़िरदौस-ए-जवाँ जाना थारेग को सिलसिला-ए-आब-ए-रवाँ जाना थाआह ये राज़ अभी मैं ने कहाँ जाना था
हवा भी ख़ुश-गवार हैगुलों पे भी निखार हैतरन्नुम-ए-हज़ार हैबहार पुर-बहार हैकहाँ चला है साक़ियाइधर तो लौट इधर तो आअरे ये देखता है क्याउठा सुबू सुबू उठासुबू उठा प्याला भरप्याला भर के दे इधरचमन की सम्त कर नज़रसमाँ तो देख बे-ख़बरवो काली काली बदलियाँउफ़ुक़ पे हो गईं अयाँवो इक हुजूम-ए-मय-कशाँहै सू-ए-मय-कदा रवाँये क्या गुमाँ है बद-गुमाँसमझ न मुझ को ना-तवाँख़याल-ए-ज़ोहद अभी कहाँअभी तो मैं जवान हूँइबादतों का ज़िक्र हैनजात की भी फ़िक्र हैजुनून है सवाब काख़याल है अज़ाब कामगर सुनो तो शैख़ जीअजीब शय हैं आप भीभला शबाब ओ आशिक़ीअलग हुए भी हैं कभीहसीन जल्वा-रेज़ होंअदाएँ फ़ित्ना-ख़ेज़ होंहवाएँ इत्र-बेज़ होंतो शौक़ क्यूँ न तेज़ होंनिगार-हा-ए-फ़ित्नागरकोई इधर कोई उधरउभारते हों ऐश परतो क्या करे कोई बशरचलो जी क़िस्सा-मुख़्तसरतुम्हारा नुक़्ता-ए-नज़रदुरुस्त है तो हो मगरअभी तो मैं जवान हूँये गश्त कोहसार कीये सैर जू-ए-बार कीये बुलबुलों के चहचहेये गुल-रुख़ों के क़हक़हेकिसी से मेल हो गयातो रंज ओ फ़िक्र खो गयाकभी जो बख़्त सो गयाये हँस गया वो रो गयाये इश्क़ की कहानियाँये रस भरी जवानियाँउधर से मेहरबानियाँइधर से लन-तरानियाँये आसमान ये ज़मींनज़ारा-हा-ए-दिल-नशींइन्हें हयात-आफ़रींभला मैं छोड़ दूँ यहींहै मौत इस क़दर क़रींमुझे न आएगा यक़ींनहीं नहीं अभी नहींअभी तो मैं जवान हूँन ग़म कुशूद ओ बस्त काबुलंद का न पस्त कान बूद का न हस्त कान वादा-ए-अलस्त काउम्मीद और यास गुमहवास गुम क़यास गुमनज़र से आस पास गुमहमा-बजुज़ गिलास गुमन मय में कुछ कमी रहेक़दह से हमदमी रहेनशिस्त ये जमी रहेयही हमा-हामी रहेवो राग छेड़ मुतरिबातरब-फ़ज़ा, अलम-रुबाअसर सदा-ए-साज़ काजिगर में आग दे लगाहर एक लब पे हो सदान हाथ रोक साक़ियापिलाए जा पिलाए जाअभी तो मैं जवान हूँ
चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारामुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारातौहीद की अमानत सीनों में है हमारेआसाँ नहीं मिटाना नाम-ओ-निशाँ हमारादुनिया के बुत-कदों में पहला वो घर ख़ुदा काहम इस के पासबाँ हैं वो पासबाँ हमारातेग़ों के साए में हम पल कर जवाँ हुए हैंख़ंजर हिलाल का है क़ौमी निशाँ हमारामग़रिब की वादियों में गूँजी अज़ाँ हमारीथमता न था किसी से सैल-ए-रवाँ हमाराबातिल से दबने वाले ऐ आसमाँ नहीं हमसौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमाराऐ गुलिस्तान-ए-उंदुलुस वो दिन हैं याद तुझ कोथा तेरी डालियों में जब आशियाँ हमाराऐ मौज-ए-दजला तू भी पहचानती है हम कोअब तक है तेरा दरिया अफ़्साना-ख़्वाँ हमाराऐ अर्ज़-ए-पाक तेरी हुर्मत पे कट मरे हमहै ख़ूँ तिरी रगों में अब तक रवाँ हमारासालार-ए-कारवाँ है मीर-ए-हिजाज़ अपनाइस नाम से है बाक़ी आराम-ए-जाँ हमारा'इक़बाल' का तराना बाँग-ए-दरा है गोयाहोता है जादा-पैमा फिर कारवाँ हमारा
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
रवाँ है छोटी सी कश्ती हवाओं के रुख़ परनदी के साज़ पे मल्लाह गीत गाता है
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब नक़्श-गर-ए-हादसातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब अस्ल-ए-हयात-ओ-ममातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब तार-ए-हरीर-ए-दो-रंगजिस से बनाती है ज़ात अपनी क़बा-ए-सिफ़ातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब साज़-ए-अज़ल की फ़ुग़ाँजिस से दिखाती है ज़ात ज़ेर-ओ-बम-ए-मुम्किनाततुझ को परखता है ये मुझ को परखता है येसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब सैरफ़ी-ए-काएनाततू हो अगर कम अयार मैं हूँ अगर कम अयारमौत है तेरी बरात मौत है मेरी बराततेरे शब-ओ-रोज़ की और हक़ीक़त है क्याएक ज़माने की रौ जिस में न दिन है न रातआनी-ओ-फ़ानी तमाम मोजज़ा-हा-ए-हुनरकार-ए-जहाँ बे-सबात कार-ए-जहाँ बे-सबातअव्वल ओ आख़िर फ़ना बातिन ओ ज़ाहिर फ़नानक़्श-ए-कुहन हो कि नौ मंज़िल-ए-आख़िर फ़नाहै मगर इस नक़्श में रंग-ए-सबात-ए-दवामजिस को किया हो किसी मर्द-ए-ख़ुदा ने तमाममर्द-ए-ख़ुदा का अमल इश्क़ से साहब फ़रोग़इश्क़ है अस्ल-ए-हयात मौत है उस पर हरामतुंद ओ सुबुक-सैर है गरचे ज़माने की रौइश्क़ ख़ुद इक सैल है सैल को लेता है थामइश्क़ की तक़्वीम में अस्र-ए-रवाँ के सिवाऔर ज़माने भी हैं जिन का नहीं कोई नामइश्क़ दम-ए-जिब्रईल इश्क़ दिल-ए-मुस्तफ़ाइश्क़ ख़ुदा का रसूल इश्क़ ख़ुदा का कलामइश्क़ की मस्ती से है पैकर-ए-गिल ताबनाकइश्क़ है सहबा-ए-ख़ाम इश्क़ है कास-उल-किरामइश्क़ फ़क़ीह-ए-हराम इश्क़ अमीर-ए-जुनूदइश्क़ है इब्नुस-सबील इस के हज़ारों मक़ामइश्क़ के मिज़राब से नग़्मा-ए-तार-ए-हयातइश्क़ से नूर-ए-हयात इश्क़ से नार-ए-हयातऐ हरम-ए-क़ुर्तुबा इश्क़ से तेरा वजूदइश्क़ सरापा दवाम जिस में नहीं रफ़्त ओ बूदरंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौतमोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूदक़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर सिल को बनाता है दिलख़ून-ए-जिगर से सदा सोज़ ओ सुरूर ओ सुरूदतेरी फ़ज़ा दिल-फ़रोज़ मेरी नवा सीना-सोज़तुझ से दिलों का हुज़ूर मुझ से दिलों की कुशूदअर्श-ए-मोअल्ला से कम सीना-ए-आदम नहींगरचे कफ़-ए-ख़ाक की हद है सिपहर-ए-कबूदपैकर-ए-नूरी को है सज्दा मयस्सर तो क्याउस को मयस्सर नहीं सोज़-ओ-गुदाज़-ए-सजूदकाफ़िर-ए-हिन्दी हूँ मैं देख मिरा ज़ौक़ ओ शौक़दिल में सलात ओ दुरूद लब पे सलात ओ दुरूदशौक़ मिरी लय में है शौक़ मिरी नय में हैनग़्मा-ए-अल्लाह-हू मेरे रग-ओ-पय में हैतेरा जलाल ओ जमाल मर्द-ए-ख़ुदा की दलीलवो भी जलील ओ जमील तू भी जलील ओ जमीलतेरी बिना पाएदार तेरे सुतूँ बे-शुमारशाम के सहरा में हो जैसे हुजूम-ए-नुख़ीलतेरे दर-ओ-बाम पर वादी-ए-ऐमन का नूरतेरा मिनार-ए-बुलंद जल्वा-गह-ए-जिब्रीलमिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि हैउस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लीलउस की ज़मीं बे-हुदूद उस का उफ़ुक़ बे-सग़ूरउस के समुंदर की मौज दजला ओ दनयूब ओ नीलउस के ज़माने अजीब उस के फ़साने ग़रीबअहद-ए-कुहन को दिया उस ने पयाम-ए-रहीलसाक़ी-ए-रबाब-ए-ज़ौक़ फ़ारस-ए-मैदान-ए-शौक़बादा है उस का रहीक़ तेग़ है उस की असीलमर्द-ए-सिपाही है वो उस की ज़िरह ला-इलाहसाया-ए-शमशीर में उस की पनह ला-इलाहतुझ से हुआ आश्कार बंदा-ए-मोमिन का राज़उस के दिनों की तपिश उस की शबों का गुदाज़उस का मक़ाम-ए-बुलंद उस का ख़याल-ए-अज़ीमउस का सुरूर उस का शौक़ उस का नियाज़ उस का नाज़हाथ है अल्लाह का बंदा-ए-मोमिन का हाथग़ालिब ओ कार-आफ़रीं कार-कुशा कारसाज़ख़ाकी ओ नूरी-निहाद बंदा-ए-मौला-सिफ़ातहर दो-जहाँ से ग़नी उस का दिल-ए-बे-नियाज़उस की उमीदें क़लील उस के मक़ासिद जलीलउस की अदा दिल-फ़रेब उस की निगह दिल-नवाज़आज भी इस देस में आम है चश्म-ए-ग़ज़ालऔर निगाहों के तीर आज भी हैं दिल-नशींबू-ए-यमन आज भी उस की हवाओं में हैरंग-ए-हिजाज़ आज भी उस की नवाओं में हैदीदा-ए-अंजुम में है तेरी ज़मीं आसमाँआह कि सदियों से है तेरी फ़ज़ा बे-अज़ाँकौन सी वादी में है कौन सी मंज़िल में हैइश्क़-ए-बला-ख़ेज़ का क़ाफ़िला-ए-सख़्त-जाँदेख चुका अल्मनी शोरिश-ए-इस्लाह-ए-दींजिस ने न छोड़े कहीं नक़्श-ए-कुहन के निशाँहर्फ़-ए-ग़लत बन गई इस्मत-ए-पीर-ए-कुनिश्तऔर हुई फ़िक्र की कश्ती-ए-नाज़ुक रवाँचश्म-ए-फ़िराँसिस भी देख चुकी इंक़लाबजिस से दिगर-गूँ हुआ मग़रबियों का जहाँमिल्लत-ए-रूमी-निज़ाद कोहना-परस्ती से पीरलज़्ज़त-ए-तज्दीदा से वो भी हुई फिर जवाँरूह-ए-मुसलमाँ में है आज वही इज़्तिराबराज़-ए-ख़ुदाई है ये कह नहीं सकती ज़बाँनर्म दम-ए-गुफ़्तुगू गर्म दम-ए-जुस्तुजूरज़्म हो या बज़्म हो पाक-दिल ओ पाक-बाज़नुक़्ता-ए-परकार-ए-हक़ मर्द-ए-ख़ुदा का यक़ींऔर ये आलम तमाम वहम ओ तिलिस्म ओ मजाज़अक़्ल की मंज़िल है वो इश्क़ का हासिल है वोहल्क़ा-ए-आफ़ाक़ में गर्मी-ए-महफ़िल है वोकाबा-ए-अरबाब-ए-फ़न सतवत-ए-दीन-ए-मुबींतुझ से हरम मर्तबत उंदुलुसियों की ज़मींहै तह-ए-गर्दूं अगर हुस्न में तेरी नज़ीरक़ल्ब-ए-मुसलमाँ में है और नहीं है कहींआह वो मरदान-ए-हक़ वो अरबी शहसवारहामिल-ए-ख़ल्क़-ए-अज़ीम साहब-ए-सिद्क-ओ-यक़ींजिन की हुकूमत से है फ़ाश ये रम्ज़-ए-ग़रीबसल्तनत-ए-अहल-ए-दिल फ़क़्र है शाही नहींजिन की निगाहों ने की तर्बियत-ए-शर्क़-ओ-ग़र्बज़ुल्मत-ए-यूरोप में थी जिन की ख़िरद-राह-बींजिन के लहू के तुफ़ैल आज भी हैं उंदुलुसीख़ुश-दिल ओ गर्म-इख़्तिलात सादा ओ रौशन-जबींदेखिए इस बहर की तह से उछलता है क्यागुम्बद-ए-नीलोफ़री रंग बदलता है क्यावादी-ए-कोह-सार में ग़र्क़-ए-शफ़क़ है सहाबलाल-ए-बदख़्शाँ के ढेर छोड़ गया आफ़्ताबसादा ओ पुर-सोज़ है दुख़्तर-ए-दहक़ाँ का गीतकश्ती-ए-दिल के लिए सैल है अहद-ए-शबाबआब-ए-रवान-ए-कबीर तेरे किनारे कोईदेख रहा है किसी और ज़माने का ख़्वाबआलम-ए-नौ है अभी पर्दा-ए-तक़दीर मेंमेरी निगाहों में है उस की सहर बे-हिजाबपर्दा उठा दूँ अगर चेहरा-ए-अफ़्कार सेला न सकेगा फ़रंग मेरी नवाओं की ताबजिस में न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगीरूह-ए-उमम की हयात कश्मकश-ए-इंक़िलाबसूरत-ए-शमशीर है दस्त-ए-क़ज़ा में वो क़ौमकरती है जो हर ज़माँ अपने अमल का हिसाबनक़्श हैं सब ना-तमाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैरनग़्मा है सौदा-ए-ख़ाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैर
जिस्म से रूह तलक रेत ही रेतन कहीं धूप न साया न सराबकितने अरमान हैं किस सहरा मेंकौन रखता है मज़ारों का हिसाबनब्ज़ बुझती भी भड़कती भी हैदिल का मामूल है घबराना भीरात अंधेरे ने अंधेरे से कहाएक आदत है जिए जाना भीक़ौस इक रंग की होती है तुलूएक ही चाल भी पैमाने कीगोशे गोशे में खड़ी है मस्जिदशक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने कीकोई कहता था समुंदर हूँ मैंऔर मिरी जेब में क़तरा भी नहींख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँअब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहींअपने हाथों को पढ़ा करता हूँकभी क़ुरआँ कभी गीता की तरहचंद रेखाओं में सीमाओं मेंज़िंदगी क़ैद है सीता की तरहराम कब लौटेंगे मालूम नहींकाश रावण ही कोई आ जाता
अब आँखों में जुम्बिश न चेहरे पे कोई तबस्सुम न तेवरीफ़क़त कान सुनते चले जा रहे हैंये इक गुलिस्ताँ है हवा लहलहाती है कलियाँ चटकती हैंग़ुंचे महकते हैं और फूल खिलते हैं खिल खिल के मुरझा केगिरते हैं इक फ़र्श-ए-मख़मल बनाते हैं जिस परमिरी आरज़ूओं की परियाँ अजब आन से यूँ रवाँ हैंकि जैसे गुलिस्ताँ ही इक आईना हैइसी आईने से हर इक शक्ल निखरी सँवर कर मिटी और मिट ही गई फिर न उभरीये पर्बत है ख़ामोश साकिनकभी कोई चश्मा उबलते हुए पूछता है कि उस की चटानों के उस पार क्या हैमगर मुझ को पर्बत का दामन ही काफ़ी है दामन में वादी है वादी में नद्दीहै नद्दी में बहती हुई नाव ही आईना हैइसी आईने में हर इक शक्ल निखरी मगर एक पल में जो मिटने लगी है तोफिर न उभरीये सहरा है फैला हुआ ख़ुश्क बे-बर्ग सहराबगूले यहाँ तुंद भूतों का अक्स-ए-मुजस्सम बने हैं
दयार-ए-शर्क़ की आबादियों के ऊँचे टीलों परकभी आमों के बाग़ों में कभी खेतों की मेंडों परकभी झीलों के पानी में कभी बस्ती की गलियों मेंकभी कुछ नीम उर्यां कमसिनों की रंगरलियों मेंसहर-दम झुटपुटे के वक़्त रातों के अँधेरे मेंकभी मेलों में नाटक-टोलियों में उन के डेरे मेंतआक़ुब में कभी गुम तितलियों के सूनी राहों मेंकभी नन्हे परिंदों की नहुफ़्ता ख़्वाब-गाहों मेंबरहना पाँव जलती रेत यख़-बस्ता हवाओं मेंगुरेज़ाँ बस्तियों से मदरसों से ख़ानक़ाहों मेंकभी हम-सिन हसीनों में बहुत ख़ुश-काम ओ दिल-रफ़्ताकभी पेचाँ बगूला साँ कभी ज्यूँ चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ताहवा में तैरता ख़्वाबों में बादल की तरह उड़तापरिंदों की तरह शाख़ों में छुप कर झूलता मुड़तामुझे इक लड़का आवारा-मनुश आज़ाद सैलानीमुझे इक लड़का जैसे तुंद चश्मों का रवाँ पानीनज़र आता है यूँ लगता है जैसे ये बला-ए-जाँमिरा हम-ज़ाद है हर गाम पर हर मोड़ पर जौलाँइसे हम-राह पाता हूँ ये साए की तरह मेरातआक़ुब कर रहा है जैसे मैं मफ़रूर मुल्ज़िम हूँये मुझ से पूछता है अख़्तर-उल-ईमान तुम ही हो
क़ल्ब ओ नज़र की ज़िंदगी दश्त में सुब्ह का समाँचश्मा-ए-आफ़्ताब से नूर की नद्दियाँ रवाँ!हुस्न-ए-अज़ल की है नुमूद चाक है पर्दा-ए-वजूददिल के लिए हज़ार सूद एक निगाह का ज़ियाँ!सुर्ख़ ओ कबूद बदलियाँ छोड़ गया सहाब-ए-शब!कोह-ए-इज़म को दे गया रंग-ब-रंग तैलिसाँ!गर्द से पाक है हवा बर्ग-ए-नख़ील धुल गएरेग-ए-नवाह-ए-काज़िमा नर्म है मिस्ल-ए-पर्नियाँआग बुझी हुई इधर, टूटी हुई तनाब उधरक्या ख़बर इस मक़ाम से गुज़रे हैं कितने कारवाँआई सदा-ए-जिब्रईल तेरा मक़ाम है यहीएहल-ए-फ़िराक़ के लिए ऐश-ए-दवाम है यहीकिस से कहूँ कि ज़हर है मेरे लिए मय-ए-हयातकोहना है बज़्म-ए-कायनात ताज़ा हैं मेरे वारदात!क्या नहीं और ग़ज़नवी कारगह-ए-हयात मेंबैठे हैं कब से मुंतज़िर अहल-ए-हरम के सोमनात!ज़िक्र-ए-अरब के सोज़ में, फ़िक्र-ए-अजम के साज़ मेंने अरबी मुशाहिदात, ने अजमी तख़य्युलातक़ाफ़िला-ए-हिजाज़ में एक हुसैन भी नहींगरचे है ताब-दार अभी गेसू-ए-दजला-ओ-फ़ुरात!अक़्ल ओ दिल ओ निगाह का मुर्शिद-ए-अव्वलीं है इश्क़इश्क़ न हो तो शर-ओ-दीं बुतकद-ए-तसव्वुरात!सिदक़-ए-ख़लील भी है इश्क़ सब्र-ए-हुसैन भी है इश्क़!म'अरका-ए-वजूद में बद्र ओ हुनैन भी है इश्क़!अाया-ए-कायनात का म'अनी-ए-देर-याब तू!निकले तिरी तलाश में क़ाफ़िला-हा-ए-रंग-ओ-बू!जलवतियान-ए-मदरसा कोर-निगाह ओ मुर्दा-ज़ाैक़जलवतियान-ए-मयकदा कम-तलब ओ तही-कदू!मैं कि मिरी ग़ज़ल में है आतिश-ए-रफ़्ता का सुराग़मेरी तमाम सरगुज़िश्त खोए हुओं की जुस्तुजू!बाद-ए-सबा की मौज से नश-नुमा-ए-ख़ार-अो-ख़स!मेरे नफ़स की मौज से नश-ओ-नुमा-ए-आरज़ू!ख़ून-ए-दिल ओ जिगर से है मेरी नवा की परवरिशहै रग-ए-साज़ में रवाँ साहिब-ए-साज़ का लहू!फुर्सत-ए-कशमुकश में ईं दिल बे-क़रार रायक दो शिकन ज़्यादा कुन गेसू-ए-ताबदार रालौह भी तू, क़लम भी तू, तेरा वजूद अल-किताब!गुम्बद-ए-आबगीना-रंग तेरे मुहीत में हबाब!आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक में तेरे ज़ुहूर से फ़रोग़ज़र्रा-ए-रेग को दिया तू ने तुलू-ए-आफ़्ताब!शौकत-ए-संजर-ओ-सलीम तेरे जलाल की नुमूद!फ़क़्र-ए-'जुनेद'-ओ-'बायज़ीद' तेरा जमाल बे-नक़ाब!शौक़ तिरा अगर न हो मेरी नमाज़ का इमाममेरा क़याम भी हिजाब! मेरा सुजूद भी हिजाब!तेरी निगाह-ए-नाज़ से दोनों मुराद पा गएअक़्ल, ग़याब ओ जुस्तुजू! इश्क़, हुज़ूर ओ इज़्तिराब!तीरा-ओ-तार है जहाँ गर्दिश-ए-आफ़ताब से!तब-ए-ज़माना ताज़ा कर जल्वा-ए-बे-हिजाब से!तेरी नज़र में हैं तमाम मेरे गुज़िश्ता रोज़ ओ शबमुझ को ख़बर न थी कि है इल्म-ए-नख़ील बे-रुतब!ताज़ा मिरे ज़मीर में म'अर्क-ए-कुहन हुआ!इश्क़ तमाम मुस्तफ़ा! अक़्ल तमाम बू-लहब!गाह ब-हीला मी-बरद, गाह ब-ज़ोर मी-कशदइश्क़ की इब्तिदा अजब इश्क़ की इंतिहा अजब!आलम-ए-सोज़-ओ-साज़ में वस्ल से बढ़ के है फ़िराक़वस्ल में मर्ग-ए-आरज़ू! हिज्र में ल़ज़्जत-ए-तलब!एेन-ए-विसाल में मुझे हौसला-ए-नज़र न थागरचे बहाना-जू रही मेरी निगाह-ए-बे-अदब!गर्मी-ए-आरज़ू फ़िराक़! शोरिश-ए-हाव-ओ-हू फ़िराक़!मौज की जुस्तुजू फ़िराक़! क़तरे की आबरू फ़िराक़!
ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर हैआसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैंअंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैंहै शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार मेंसब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार मेंनग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीरहै इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीरआँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँक़ल्ब-ए-इंसानी में रक़्स-ए-ऐश-ओ-ग़म रहता नहींनग़्मा रह जाता है लुत्फ़-ए-ज़ेर-ओ-बम रहता नहींइल्म ओ हिकमत रहज़न-ए-सामान-ए-अश्क-ओ-आह हैया'नी इक अल्मास का टुकड़ा दिल-ए-आगाह हैगरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहींआँख मेरी माया-दार-ए-अश्क-ए-उननाबी नहींजानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़मेरे लब पर क़िस्सा-ए-नैरंगी-ए-दौराँ नहींदिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहींपर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या-ए-पैहम की हैआह ये तरदीद मेरी हिकमत-ए-मोहकम की हैगिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा हैदर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा हैमौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिराहैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ कारुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ कारफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा-ब-पा इस ने कियाअहद-ए-तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने कियाजब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँबात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँऔर अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी-ए-गुफ़्तार केबे-बहा मोती हैं जिस की चश्म-ए-गौहर-बार केइल्म की संजीदा-गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊ'रदुनयवी ए'ज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूरज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हमसोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हमबे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैंफिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैंकिस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ारकौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे-क़रारख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगाअब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगातर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआघर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआदफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयातथी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयातउम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत-गर रहीमैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसीवो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंदतेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंदकारोबार-ए-ज़िंदगानी में वो हम-पहलू मिरावो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरातुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वोसब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वोतुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गईशिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गईआह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीरआदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीरकितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौतगुलशन-ए-हस्ती में मानिंद-ए-नसीम अर्ज़ां है मौतज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैंकैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैंकल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौतदश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौतमौत है हंगामा-आरा क़ुलज़ुम-ए-ख़ामोश मेंडूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश मेंने मजाल-ए-शिकवा है ने ताक़त-ए-गुफ़्तार हैज़िंदगानी क्या है इक तोक़-ए-गुलू-अफ़्शार हैक़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहींइक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहींख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भीहैं पस-ए-नौह पर्दा-ए-गर्दूं अभी दौर और भीसीना चाक इस गुल्सिताँ में लाला-ओ-गुल हैं तो क्यानाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्याझाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँसब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्याआरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्याज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहींटूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहींज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में हैज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में हैमौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श-ए-हयातआम यूँ उस को न कर देता निज़ाम-ए-काएनातहै अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहींजिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहींआह ग़ाफ़िल मौत का राज़-ए-निहाँ कुछ और हैनक़्श की ना-पाएदारी से अयाँ कुछ और हैजन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आबमौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाबमौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है येकितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है येफिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवातोड़ने में उस के यूँ होती न बे-परवा हवाइस रविश का क्या असर है हैयत-ए-तामीर परये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत-ए-तामीर परफ़ितरत-ए-हस्ती शहीद-ए-आरज़ू रहती न होख़ूब-तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न होआह सीमाब-ए-परेशाँ अंजुम-ए-गर्दूं-फ़रोज़शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून-ए-शब है जिन का सोज़अक़्ल जिस से सर-ब-ज़ानू है वो मुद्दत इन की हैसरगुज़िश्त-ए-नौ-ए-इंसाँ एक साअ'त उन की हैफिर ये इंसाँ आँ सू-ए-अफ़्लाक है जिस की नज़रक़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा-तरजो मिसाल-ए-शम्अ रौशन महफ़िल-ए-क़ुदरत में हैआसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत-ए-फ़ितरत में हैजिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब हैजिस का नाख़ुन साज़-ए-हस्ती के लिए मिज़राब हैशो'ला ये कम-तर है गर्दूं के शरारों से भी क्याकम-बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्यातुख़्म-ए-गुल की आँख ज़ेर-ए-ख़ाक भी बे-ख़्वाब हैकिस क़दर नश्व-ओ-नुमा के वास्ते बेताब हैज़िंदगी का शो'ला इस दाने में जो मस्तूर हैख़ुद-नुमाई ख़ुद-फ़ज़ाई के लिए मजबूर हैसर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहींख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहींफूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है येमौत से गोया क़बा-ए-ज़िंदगी पाता है येहै लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंदडालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंदमौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम हैख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम हैख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहींमौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहींकहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवाज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ादिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद हैहल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम से आज़ाद हैवक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहींवक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहींसर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना-गहाँअश्क पैहम दीदा-ए-इंसाँ से होते हैं रवाँरब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद सेख़ून-ए-दिल बहता है आँखों की सरिश्क-आबाद सेआदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम हैउस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम हैजौहर-ए-इंसाँ अदम से आश्ना होता नहींआँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहींरख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से हैसर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से हैआह ये ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ग़फ़्लत की ख़ामोशी नहींआगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहींपर्दा-ए-मशरिक़ से जिस दम जल्वा-गर होती है सुब्हदाग़ शब का दामन-ए-आफ़ाक़ से धोती है सुब्हलाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है येबे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है येसीना-ए-बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद हैसैकड़ों नग़्मों से बाद-ए-सुब्ह-दम-आबाद हैख़ुफ़्तगान-ए-लाला-ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बारहोते हैं आख़िर उरूस-ए-ज़िंदगी से हम-कनारये अगर आईन-ए-हस्ती है कि हो हर शाम सुब्हमरक़द-ए-इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्हदाम-ए-सिमीन-ए-तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़-गीरकर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीरयाद से तेरी दिल-ए-दर्द आश्ना मामूर हैजैसे का'बे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर हैवो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयातजल्वा-गाहें उस की हैं लाखों जहान-ए-बे-सबातमुख़्तलिफ़ हर मंज़िल-ए-हस्ती को रस्म-ओ-राह हैआख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ-गाह हैहै वहाँ बे-हासिली किश्त-ए-अजल के वास्तेसाज़गार आब-ओ-हवा तुख़्म-ए-अमल के वास्तेनूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहींतंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहींज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा-तरख़ूब-तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़रमिस्ल-ए-ऐवान-ए-सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरानूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिराआसमाँ तेरी लहद पर शबनम-अफ़्शानी करेसब्ज़ा-ए-नौ-रस्ता इस घर की निगहबानी करे
सरशार-ए-निगाह-ए-नर्गिस हूँ पा-बस्ता-ए-गेसू-ए-सुम्बुल हूँये मेरा चमन है मेरा चमन मैं अपने चमन का बुलबुल हूँहर आन यहाँ सहबा-ए-कुहन इक साग़र-ए-नौ में ढलती हैकलियों से हुस्न टपकता है फूलों से जवानी उबलती हैजो ताक़-ए-हरम में रौशन है वो शम्अ यहाँ भी जलती हैइस दश्त के गोशे गोशे से इक जू-ए-हयात उबलती हैइस्लाम के इस बुत-ख़ाने में असनाम भी हैं और आज़र भीतहज़ीब के इस मय-ख़ाने में शमशीर भी है और साग़र भीयाँ हुस्न की बर्क़ चमकती है याँ नूर की बारिश होती हैहर आह यहाँ इक नग़्मा है हर अश्क यहाँ इक मोती हैहर शाम है शाम-ए-मिस्र यहाँ हर शब है शब-ए-शीराज़ यहाँहै सारे जहाँ का सोज़ यहाँ और सारे जहाँ का साज़ यहाँये दश्त-ए-जुनूँ दीवानों का ये बज़्म-ए-वफ़ा परवानों कीये शहर-ए-तरब रूमानों का ये ख़ुल्द-ए-बरीं अरमानों कीफ़ितरत ने सिखाई है हम को उफ़्ताद यहाँ पर्वाज़ यहाँगाए हैं वफ़ा के गीत यहाँ छेड़ा है जुनूँ का साज़ यहाँइस फ़र्श से हम ने उड़ उड़ कर अफ़्लाक के तारे तोड़े हैंनाहीद से की है सरगोशी परवीन से रिश्ते जोड़े हैंइस बज़्म में तेग़ें खींची हैं इस बज़्म में साग़र तोड़े हैंइस बज़्म में आँख बिछाई है इस बज़्म में दिल तक जोड़े हैंइस बज़्म में नेज़े फेंके हैं इस बज़्म में ख़ंजर चूमे हैंइस बज़्म में गिर कर तड़पे हैं इस बज़्म में पी कर झूमे हैंआ आ के हज़ारों बार यहाँ ख़ुद आग भी हम ने लगाई हैफिर सारे जहाँ ने देखा है ये आग हमीं ने बुझाई हैयाँ हम ने कमंदें डाली हैं याँ हम ने शब-ख़ूँ मारे हैंयाँ हम ने क़बाएँ नोची हैं याँ हम ने ताज उतारे हैंहर आह है ख़ुद तासीर यहाँ हर ख़्वाब है ख़ुद ताबीर यहाँतदबीर के पा-ए-संगीं पर झुक जाती है तक़दीर यहाँज़र्रात का बोसा लेने को सौ बार झुका आकाश यहाँख़ुद आँख से हम ने देखी है बातिल की शिकस्त-ए-फ़ाश यहाँइस गुल-कदा-ए-पारीना में फिर आग भड़कने वाली हैफिर अब्र गरजने वाले हैं फिर बर्क़ कड़कने वाली हैजो अब्र यहाँ से उट्ठेगा वो सारे जहाँ पर बरसेगाहर जू-ए-रवाँ पर बरसेगा हर कोह-ए-गिराँ पर बरसेगाहर सर्व-ओ-समन पर बरसेगा हर दश्त-ओ-दमन पर बरसेगाख़ुद अपने चमन पर बरसेगा ग़ैरों के चमन पर बरसेगाहर शहर-ए-तरब पर गरजेगा हर क़स्र-ए-तरब पर कड़केगाये अब्र हमेशा बरसा है ये अब्र हमेशा बरसेगा
ओ देस से आने वाले बताक्या शहर के गिर्द अब भी है रवाँदरिया-ए-हसीं लहराए हुएजूँ गोद में अपने मन को लिएनागिन हो कोई थर्राए हुएया नूर की हँसुली हूर की गर्दनमें हो अयाँ बिल खाए हुएओ देस से आने वाले बता
दूसरी बात भी झूटी है कि दिल जानता हैयाँ कोई मोड़ कोई दश्त कोई घात नहींजिस के पर्दे में मिरा माह-ए-रवाँ डूब सकेतुम से चलती रहे ये राह, यूँही अच्छा हैतुम ने मुड़ कर भी न देखा तो कोई बात नहीं
मैं सोई जो इक शब तो देखा ये ख़्वाबबढ़ा और जिस से मिरा इज़्तिराबये देखा कि मैं जा रही हूँ कहींअँधेरा है और राह मिलती नहींलरज़ता था डर से मिरा बाल बालक़दम का था दहशत से उठना मुहालजो कुछ हौसला पा के आगे बढ़ीतो देखा क़तार एक लड़कों की थीज़मुर्रद सी पोशाक पहने हुएदिए सब के हाथों में जलते हुएवो चुप-चाप थे आगे पीछे रवाँख़ुदा जाने जाना था उन को कहाँइसी सोच में थी कि मेरा पिसरमुझे इस जमाअत में आया नज़रवो पीछे था और तेज़ चलता न थादिया उस के हाथों में जलता न थाकहा मैं ने पहचान कर मेरी जाँमुझे छोड़ कर आ गए तुम कहाँजुदाई में रहती हूँ मैं बे-क़रारपिरोती हूँ हर रोज़ अश्कों के हारन पर्वा हमारी ज़रा तुम ने कीगए छोड़ अच्छी वफ़ा तुम ने कीजो बच्चे ने देखा मिरा पेच-ओ-ताबदिया उस ने मुँह फेर कर यूँ जवाबरुलाती है तुझ को जुदाई मिरीनहीं इस में कुछ भी भलाई मिरीये कह कर वो कुछ देर तक चुप रहादिया फिर दिखा कर ये कहने लगासमझती है तू हो गया क्या इसे?तिरे आँसुओं ने बुझाया इसे!
गुज़र रहे थे मह-ओ-साल और मौसम परहमारे शहर में आती थी घिर के जब बरसातजब आसमान में उड़ते थे हर तरफ़ जुगनूहवा की मौज-ए-रवाँ पर दिए जलाए हुएफ़ज़ा में रात गए जब दरख़्त पीपल का!हज़ारों जुगनुओं से कोह-ए-तूर बनता थाहज़ारों वादी-ए-ऐमन थीं जिस की शाख़ों मेंये देख कर मिरे दिल में ये हूक उठती थीकि मैं भी होता इन्हीं जुगनुओं में इक जुगनूतो माँ की भटकी हुई रूह को दिखाता राहवो माँ मैं जिस की मोहब्बत के फूल चुन न सकावो माँ मैं जिस से मोहब्बत के बोल सुन न सकावो माँ कि भेंच के जिस को कभी मैं सो न सकामैं जिस के आँचलों में मुँह छुपा के रो न सकावो माँ कि घुटनों से जिस के कभी लिपट न सकावो माँ कि सीने से जिस के कभी चिमट न सकाहुमक के गोद में जिस की कभी मैं चढ़ न सकामैं ज़ेर-ए-साया-ए-उम्मीद जिस के बढ़ न सकावो माँ मैं जिस से शरारत की दाद पा न सकामैं जिस के हाथों मोहब्बत की मार खा न सका
ज़िंदगी की साअतें रौशन थीं शम्ओं की तरहजिस तरह से शाम गुज़रे जुगनुओं के शहर मेंजिस तरह महताब की वादी में दो साए रवाँजिस तरह घुंघरू छनक उट्ठें नशे की लहर में
रुख़्सत हुआ वो बाप से ले कर ख़ुदा का नामराह-ए-वफ़ा की मंज़िल-ए-अव्वल हुई तमाममंज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतिज़ामदामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलामइज़हार-ए-बे-कसी से सितम होगा और भीदेखा हमें उदास तो ग़म होगा और भीदिल को सँभालता हुआ आख़िर वो नौनिहालख़ामोश माँ के पास गया सूरत-ए-ख़यालदेखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हालसकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलालतन में लहू का नाम नहीं ज़र्द रंग हैगोया बशर नहीं कोई तस्वीर-ए-संग हैक्या जाने किस ख़याल में गुम थी वो बे-गुनाहनूर-ए-नज़र ये दीदा-ए-हसरत से की निगाहजुम्बिश हुई लबों को भरी एक सर्द आहली गोशा-हा-ए-चश्म से अश्कों ने रुख़ की राहचेहरे का रंग हालत-ए-दिल खोलने लगाहर मू-ए-तन ज़बाँ की तरह बोलने लगाआख़िर असीर-ए-यास का क़ुफ़्ल-ए-दहन खुलाअफ़्साना-ए-शदाइद-ए-रंज-ओ-मेहन खुलाइक दफ़्तर-ए-मज़ालिम-ए-चर्ख़-ए-कुहन खुलावा था दहान-ए-ज़ख़्म कि बाब-ए-सुख़न खुलादर्द-ए-दिल-ए-ग़रीब जो सर्फ़-ए-बयाँ हुआख़ून-ए-जिगर का रंग सुख़न से 'अयाँ हुआरो कर कहा ख़मोश खड़े क्यूँ हो मेरी जाँमैं जानती हूँ जिस लिए आए हो तुम यहाँसब की ख़ुशी यही है तो सहरा को हो रवाँलेकिन मैं अपने मुँह से न हरगिज़ कहूँगी हाँकिस तरह बन में आँखों के तारे को भेज दूँजोगी बना के राज-दुलारे को भेज दूँदुनिया का हो गया है ये कैसा लहू सपीदअंधा किए हुए है ज़र-ओ-माल की उमीदअंजाम क्या हो कोई नहीं जानता ये भेदसोचे बशर तो जिस्म हो लर्ज़ां मिसाल-ए-बीदलिक्खी है क्या हयात-ए-अबद इन के वास्तेफैला रहे हैं जाल ये किस दिन के वास्तेलेती किसी फ़क़ीर के घर में अगर जनमहोते न मेरी जान को सामान ये बहमडसता न साँप बन के मुझे शौकत-ओ-हशमतुम मेरे लाल थे मुझे किस सल्तनत से कममैं ख़ुश हूँ फूँक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज कोतुम ही नहीं तो आग लगा दूँगी राज कोकिन किन रियाज़तों से गुज़ारे हैं माह-ओ-सालदेखी तुम्हारी शक्ल जब ऐ मेरे नौनिहालपूरा हुआ जो ब्याह का अरमान था कमालआफ़त ये आई मुझ पे हुए जब सफ़ेद बालछटती हूँ उन से जोग लिया जिन के वास्तेक्या सब किया था मैं ने इसी दिन के वास्तेऐसे भी ना-मुराद बहुत आएँगे नज़रघर जिन के बे-चराग़ रहे आह 'उम्र भररहता मिरा भी नख़्ल-ए-तमन्ना जो बे-समरये जा-ए-सब्र थी कि दु'आ में नहीं असरलेकिन यहाँ तो बन के मुक़द्दर बिगड़ गयाफल फूल ला के बाग़-ए-तमन्ना उजड़ गयासरज़द हुए थे मुझ से ख़ुदा जाने क्या गुनाहमंजधार में जो यूँ मिरी कश्ती हुई तबाहआती नज़र नहीं कोई अम्न-ओ-अमाँ की राहअब याँ से कूच हो तो 'अदम में मिले पनाहतक़्सीर मेरी ख़ालिक़-ए-आलम बहल करेआसान मुझ ग़रीब की मुश्किल अजल करेसुन कर ज़बाँ से माँ की ये फ़रियाद-ए-दर्द-ख़ेज़उस ख़स्ता-जाँ के दिल पे चली ग़म की तेग़-ए-तेज़'आलम ये था क़रीब कि आँखें हों अश्क-रेज़लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़सोचा यही कि जान से बेकस गुज़र न जाएनाशाद हम को देख के माँ और मर न जाएफिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूरमायूस क्यूँ हैं आप अलम का है क्यूँ वफ़ूरसदमा ये शाक़ 'आलम-ए-पीरी में है ज़रूरलेकिन न दिल से कीजिए सब्र-ओ-क़रार दूरशायद ख़िज़ाँ से शक्ल 'अयाँ हो बहार कीकुछ मस्लहत इसी में हो परवरदिगार कीये जा'ल ये फ़रेब ये साज़िश ये शोर-ओ-शरहोना जो है सब उस के बहाने हैं सर-ब-सरअस्बाब-ए-ज़ाहिरी में न इन पर करो नज़रक्या जाने क्या है पर्दा-ए-क़ुदरत में जल्वा-गरख़ास उस की मस्लहत कोई पहचानता नहींमंज़ूर क्या उसे है कोई जानता नहींराहत हो या कि रंज ख़ुशी हो कि इंतिशारवाजिब हर एक रंग में है शुक्र-ए-किर्दगारतुम ही नहीं हो कुश्ता-ए-नैरंग-ए-रोज़गारमातम-कदे में दहर के लाखों हैं सोगवारसख़्ती सही नहीं कि उठाई कड़ी नहींदुनिया में क्या किसी पे मुसीबत पड़ी नहीं
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