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नज़्म
कि मंज़िल है दुश्वार ग़म से ग़म-ए-जावेदाँ तक!
वो सब थे कुशादा-दिल ओ होश-मंद ओ परस्तार-ए-रब्ब-ए-करीम
नून मीम राशिद
नज़्म
रब्त-ओ-ज़ब्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा है मशरिक़ की नजात
एशिया वाले हैं इस नुक्ते से अब तक बे-ख़बर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मेरी महबूब ये दुनिया की इमारात-ए-क़दीम
दामन-ए-अर्ज़ पे छींटों के सिवा कुछ भी नहीं
अस्ताद रामपुरी
नज़्म
जो ऐसा कर लो तो सुब्ह चाटो ज़मीन चाटो
मुझे न देखो कि मैं तो नस्ल-ए-क़दीम-साला से मुंतशिर हूँ
अल्ताफ़ अहमद कुरेशी
नज़्म
तू ने तुर्कों को दिखाई है सिरात-ए-मुस्तक़ीम
फूँक डाले हैं तअ'स्सुब के हिजाबात-ए-क़दीम
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अल-मुख़्तसर हों जितने सितम तुझ पे टूट जाएँ
लेकिन ये रब्त-ए-ज़ीस्त न टूटे ख़ुदा करे