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नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
रहज़न-ए-इंसानियत रहते हैं हर दम घात में
अपनी अज़्मत का कोई रखते हैं पहलू बात में
नख़्शब जार्चवि
नज़्म
रहज़न-ए-हुस्न को इस इश्क़ की मंज़िल से ग़रज़
ख़ूगर-ए-ख़ल्वत-ए-रंगीन को महफ़िल से ग़रज़
नियाज़ गुलबर्गवी
नज़्म
उसे सब वहम कहते हैं ख़िलाफ़-ए-अक़्ल कहते हैं
मगर पक्का यक़ीं है जब कोई टूटा हुआ तारा