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नज़्म
मैं शाइ'र हूँ जो कि फ़ऊलुन फ़ऊलुन से बहर-ए-रमल तक
हर इक नग़मगी का मुकम्मल ख़ुदा हूँ
सोहैब मुग़ीरा सिद्दीक़ी
नज़्म
जोगी भी जो नगर नगर में मारे मारे फिरते हैं
कासा लिए भबूत रमाए सब के द्वारे फिरते हैं
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
रेशमीं रूमाल से होंटों की सुर्ख़ी को न छू
मुझ पे छल सकता नहीं तेरा फ़रेब-ए-रंग-ओ-बू