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नज़्म
'आलम ये था क़रीब कि आँखें हों अश्क-रेज़
लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
तिरे पहलू में कितनी ही अनोखी वारदातें हैं
तिरे होंटों पे कितनी ही तबस्सुम-रेज़ बातें हैं
अब्दुल अहद साज़
नज़्म
फ़ज़ा-ए-दहर में गाता फिरा वो प्रीत के गीत
नशात-ख़ेज़-ओ-सुकूँ-रेज़ बाँसुरी ले कर
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
ऐ पर्दा-सोज़ इम्काँ ऐ जल्वा-रेज़ इरफ़ाँ
तो शम-ए-अंजुमन है किस बज़्म-ए-दिल-सिताँ की