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नज़्म
पज़मुर्दा वो गुल दब के हुए ख़ाक के नीचे
ख़्वाबीदा हैं ख़ार-ओ-ख़स-ओ-ख़ाशाक के नीचे
तिलोकचंद महरूम
नज़्म
पर तुझे फ़ुर्सत-ए-नज़्ज़ारा-ए-ख़ाशाक नहीं
तेरी आँखों में फ़रोज़ाँ है सितारों का वफ़ूर
इलियास बाबर आवान
नज़्म
हूरें आ कर ख़ुल्द से तौफ़-ए-मज़ार-ए-पाक को
झाड़ती पलकों से हैं गर्द-ओ-ख़स-ओ-ख़ाशाक को
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
गुज़रती रात की चर्बी पे जमते आइने से दिन
ख़स-ओ-ख़ाशाक की बाड़ों के पीछे सिम-ज़दा उम्रों