aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "rone"
हमारा फ़ख़्र था फ़क़्र और दानिश अपनी पूँजी थीनसब-नामों के हम ने कितने ही परचम लपेटे हैंमिरे हम-शहर 'ज़रयून' इक फ़ुसूँ है नस्ल, हम दोनोंफ़क़त आदम के बेटे हैं फ़क़त आदम के बेटे हैंमैं जब औसान अपने खोने लगता हूँ तो हँसता हूँमैं तुम को याद कर के रोने लगता हूँ तो हँसता हूँहमेशा मैं ख़ुदा हाफ़िज़ हमेशा मैं ख़ुदा हाफ़िज़ख़ुदा हाफ़िज़ख़ुदा हाफ़िज़
ये मिलें ये जागीरेंकिस का ख़ून पीती हैंबैरकों में ये फ़ौजेंकिस के बल पे जीती हैंकिस की मेहनतों का फलदाश्ताएँ खाती हैंझोंपड़ों से रोने कीक्यूँ सदाएँ आती हैंजब शबाब पर आ करखेत लहलहाता हैकिस के नैन रोते हैंकौन मुस्कुराता हैकाश तुम कभी समझोकाश तुम कभी समझोकाश तुम कभी जानोदस करोड़ इंसानो!इल्म-ओ-फ़न के रस्ते मेंलाठियों की ये बाड़ेंकॉलिजों के लड़कों परगोलियों की बौछाड़ेंये किराए के गुंडेयादगार-ए-शब देखोकिस क़दर भयानक हैज़ुल्म का ये ढब देखोरक़्स-ए-आतिश-ओ-आहनदेखते ही जाओगेदेखते ही जाओगेहोश में न आओगेहोश में न आओगेऐ ख़मोश तूफ़ानो!दस करोड़ इंसानो!
आज मोहब्बत का जन्म-दिन हैआज हम उदासी की छुरी सेअपने दिल को काटेंगेआज हम अपनी पलकों परजलती हुई मोम-बत्ती रख केएक तार पर से गुज़़रेंगेहमें कोई नहीं देखेगामगर हम हर बंद खिड़की की तरफ़देखेंगेहर दरवाज़े के सामने फूल रखेंगेकिसी न किसी बात परहम रोएँगे और अपने रोने परहम हँसेंगेआज मोहब्बत का जन्म-दिन हैआज हम हर दरख़्त के सामने सेगुज़रते हुएटोपी उतार कर उसे सलाम करेंगेहर बादल को देख केहाथ हिलाएँगेहर सितारे का शुक्रिया अदा करेंगेहमारे आँसुओं नेहमारे हथेलियों को छलनी कर दिया हैआज हम अपने दोनों हाथजेबों में डाल कर चलेंगेऔर अगले बरस तक चलते रहेंगे
दुनिया के रंग अनोखे हैंजो मेरे सामने रहता है उस के घर में घर-वाली हैऔर दाएँ पहलू में इक मंज़िल का है मकाँ वो ख़ाली हैऔर बाएँ जानिब इक अय्याश है जिस के हाँ इक दाश्ता हैऔर इन सब में इक मैं भी हूँ लेकिन बस तू ही नहींहैं और तो सब आराम मुझे इक गेसुओं की ख़ुशबू ही नहींफ़ारिग़ होता हूँ नाश्ते से और अपने घर से निकलता हूँदफ़्तर की राह पर चलता हूँरस्ते में शहर की रौनक़ है इक ताँगा है दो कारें हैंबच्चे मकतब को जाते हैं और तांगों की क्या बात कहूँकारें तो छिछलती बिजली हैं तांगों के तीरों को कैसे सहूँये माना इन में शरीफ़ों के घर की धन-दौलत है माया हैकुछ शोख़ भी हैं मासूम भी हैंलेकिन रस्ते पर पैदल मुझ से बद-क़िस्मत मग़्मूम भी हैंतांगों पर बर्क़-ए-तबस्सुम हैबातों का मीठा तरन्नुम हैउकसाता है ध्यान ये रह रह कर क़ुदरत के दिल में तरह्हुम हैहर चीज़ तो है मौजूद यहाँ इक तू ही नहीं इक तू ही नहींऔर मेरी आँखों में रोने की हिम्मत ही नहीं आँसू ही नहीं
रुख़्सत हुआ वो बाप से ले कर ख़ुदा का नामराह-ए-वफ़ा की मंज़िल-ए-अव्वल हुई तमाममंज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतिज़ामदामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलामइज़हार-ए-बे-कसी से सितम होगा और भीदेखा हमें उदास तो ग़म होगा और भीदिल को सँभालता हुआ आख़िर वो नौनिहालख़ामोश माँ के पास गया सूरत-ए-ख़यालदेखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हालसकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलालतन में लहू का नाम नहीं ज़र्द रंग हैगोया बशर नहीं कोई तस्वीर-ए-संग हैक्या जाने किस ख़याल में गुम थी वो बे-गुनाहनूर-ए-नज़र ये दीदा-ए-हसरत से की निगाहजुम्बिश हुई लबों को भरी एक सर्द आहली गोशा-हा-ए-चश्म से अश्कों ने रुख़ की राहचेहरे का रंग हालत-ए-दिल खोलने लगाहर मू-ए-तन ज़बाँ की तरह बोलने लगाआख़िर असीर-ए-यास का क़ुफ़्ल-ए-दहन खुलाअफ़्साना-ए-शदाइद-ए-रंज-ओ-मेहन खुलाइक दफ़्तर-ए-मज़ालिम-ए-चर्ख़-ए-कुहन खुलावा था दहान-ए-ज़ख़्म कि बाब-ए-सुख़न खुलादर्द-ए-दिल-ए-ग़रीब जो सर्फ़-ए-बयाँ हुआख़ून-ए-जिगर का रंग सुख़न से 'अयाँ हुआरो कर कहा ख़मोश खड़े क्यूँ हो मेरी जाँमैं जानती हूँ जिस लिए आए हो तुम यहाँसब की ख़ुशी यही है तो सहरा को हो रवाँलेकिन मैं अपने मुँह से न हरगिज़ कहूँगी हाँकिस तरह बन में आँखों के तारे को भेज दूँजोगी बना के राज-दुलारे को भेज दूँदुनिया का हो गया है ये कैसा लहू सपीदअंधा किए हुए है ज़र-ओ-माल की उमीदअंजाम क्या हो कोई नहीं जानता ये भेदसोचे बशर तो जिस्म हो लर्ज़ां मिसाल-ए-बीदलिक्खी है क्या हयात-ए-अबद इन के वास्तेफैला रहे हैं जाल ये किस दिन के वास्तेलेती किसी फ़क़ीर के घर में अगर जनमहोते न मेरी जान को सामान ये बहमडसता न साँप बन के मुझे शौकत-ओ-हशमतुम मेरे लाल थे मुझे किस सल्तनत से कममैं ख़ुश हूँ फूँक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज कोतुम ही नहीं तो आग लगा दूँगी राज कोकिन किन रियाज़तों से गुज़ारे हैं माह-ओ-सालदेखी तुम्हारी शक्ल जब ऐ मेरे नौनिहालपूरा हुआ जो ब्याह का अरमान था कमालआफ़त ये आई मुझ पे हुए जब सफ़ेद बालछटती हूँ उन से जोग लिया जिन के वास्तेक्या सब किया था मैं ने इसी दिन के वास्तेऐसे भी ना-मुराद बहुत आएँगे नज़रघर जिन के बे-चराग़ रहे आह 'उम्र भररहता मिरा भी नख़्ल-ए-तमन्ना जो बे-समरये जा-ए-सब्र थी कि दु'आ में नहीं असरलेकिन यहाँ तो बन के मुक़द्दर बिगड़ गयाफल फूल ला के बाग़-ए-तमन्ना उजड़ गयासरज़द हुए थे मुझ से ख़ुदा जाने क्या गुनाहमंजधार में जो यूँ मिरी कश्ती हुई तबाहआती नज़र नहीं कोई अम्न-ओ-अमाँ की राहअब याँ से कूच हो तो 'अदम में मिले पनाहतक़्सीर मेरी ख़ालिक़-ए-आलम बहल करेआसान मुझ ग़रीब की मुश्किल अजल करेसुन कर ज़बाँ से माँ की ये फ़रियाद-ए-दर्द-ख़ेज़उस ख़स्ता-जाँ के दिल पे चली ग़म की तेग़-ए-तेज़'आलम ये था क़रीब कि आँखें हों अश्क-रेज़लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़सोचा यही कि जान से बेकस गुज़र न जाएनाशाद हम को देख के माँ और मर न जाएफिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूरमायूस क्यूँ हैं आप अलम का है क्यूँ वफ़ूरसदमा ये शाक़ 'आलम-ए-पीरी में है ज़रूरलेकिन न दिल से कीजिए सब्र-ओ-क़रार दूरशायद ख़िज़ाँ से शक्ल 'अयाँ हो बहार कीकुछ मस्लहत इसी में हो परवरदिगार कीये जा'ल ये फ़रेब ये साज़िश ये शोर-ओ-शरहोना जो है सब उस के बहाने हैं सर-ब-सरअस्बाब-ए-ज़ाहिरी में न इन पर करो नज़रक्या जाने क्या है पर्दा-ए-क़ुदरत में जल्वा-गरख़ास उस की मस्लहत कोई पहचानता नहींमंज़ूर क्या उसे है कोई जानता नहींराहत हो या कि रंज ख़ुशी हो कि इंतिशारवाजिब हर एक रंग में है शुक्र-ए-किर्दगारतुम ही नहीं हो कुश्ता-ए-नैरंग-ए-रोज़गारमातम-कदे में दहर के लाखों हैं सोगवारसख़्ती सही नहीं कि उठाई कड़ी नहींदुनिया में क्या किसी पे मुसीबत पड़ी नहीं
क्या बच्चे सुलझे होते हैंजब गेंद से उलझे होते हैंवो इस लिए मुझ को भाते हैंदिन बीते याद दिलाते हैंवो कितने हसीन बसेरे थेजब दूर ग़मों से डेरे थेजो खेल में हाइल होता थानफ़रीन के क़ाबिल होता थाहर इक से उलझ कर रह जानारुक रुक के बहुत कुछ कह जानाहँस देना बातों बातों परबरसात की काली रातों परबादल की सुबुक-रफ़्तारी परबुलबुल की आह-ओ-ज़ारी परऔर शम्अ की लौ की गर्मी परपरवानों की हट-धर्मी परदुनिया के धंदे क्या जानेंआज़ाद ये फंदे क्या जानेंमासूम फ़ज़ा में रहते थेहम तो ये समझ ही बैठे थेख़ुशियों का अलम अंजाम नहींदुनिया में ख़िज़ाँ का नाम नहींमाहौल ने खाया फिर पल्टानागाह तग़य्युर आ झपटाऔर उस की करम-फ़रमाई सेहालात की इक अंगड़ाई सेआ पहुँचे ऐसे बेड़ों मेंजो ले गए हमें थपेड़ों मेंबचपन के सुहाने साए थेसाए में ज़रा सुसताए थेवो दौर-ए-मुक़द्दस बीत गयाये वक़्त ही बाज़ी जीत गयाअब वैसे मिरे हालात नहींवो चीज़ नहीं वो बात नहींजीने का सफ़र अब दूभर हैहर गाम पे सौ सौ ठोकर हैवो दिल जो रूह-ए-क़रीना थाआशाओं का एक ख़ज़ीना थाइस दिल में निहाँ अब नाले हैंतारों से ज़ियादा छाले हैंजो हँसना हँसाना होता हैरोने को छुपाना होता हैकोई ग़ुंचा दिल में खिलता हैथोड़ा सा सुकूँ जब मिलता हैग़म तेज़ क़दम फिर भरता हैख़ुशियों का तआक़ुब करता हैमैं सोचता रहता हूँ यूँहीआख़िर ये तफ़ावुत क्या मअनीये सोच अजब तड़पाती हैआँखों में नमी भर जाती हैफिर मुझ से दिल ये कहता हैमाज़ी को तू रोता रहता हैकुछ आहें दबी सी रहने देकुछ आँसू बाक़ी रहने देये हाल भी माज़ी होना हैइस पर भी तुझे कुछ रोना है
(1)ऐ सब से अव्वल और आख़िरजहाँ-तहाँ, हाज़िर और नाज़िरऐ सब दानाओं से दानासारे तवानाओं से तवानाऐ बाला, हर बाला-तर सेचाँद से सूरज से अम्बर सेऐ समझे बूझे बिन सूझेजाने-पहचाने बिन बूझेसब से अनोखे सब से निरालेआँख से ओझल दिल के उजालेऐ अंधों की आँख के तारेऐ लंगड़े लूलों के सहारेनातियों से छोटों के नातीसाथियों से बिछड़ों के साथीनाव जहाँ की खेने वालेदुख में तसल्ली देने वालेजब अब तब तुझ सा नहीं कोईतुझ से हैं सब तुझ सा नहीं कोईजोत है तेरी जल और थल मेंबास है तेरी फूल और फल मेंहर दिल में है तेरा बसेरातू पास और घर दूर है तेराराह तिरी दुश्वार और सुकड़ीनाम तिरा रह-गीर की लकड़ीतू है ठिकाना मिस्कीनों कातू है सहारा ग़मगीनों कातू है अकेलों का रखवालातू है अँधेरे घर का उजालालागू अच्छे और बुरे काख़्वाहाँ खोटे और खरे काबेद निरासे बीमारों कागाहक मंदे बाज़ारों कासोच में दिल बहलाने वालेबिपता में याद आने वाले(2)ऐ बे-वारिस घरों के वारिसबे-बाज़ू बे-परों के वारिसबे-आसों की आस है तू हीजागते सोते पास है तू हीबस वाले हैं या बे-बस हैंतू नहीं जिन का वो बे-कस हैंसाथी जिन का ध्यान है तेरादुसरायत की वहाँ नहीं पर्वादिल में है जिन के तेरी बड़ाईगिनते हैं वो पर्बत को राईबेकस का ग़म-ख़्वार है तू हीबुरी बनी का यार है तू हीदुखिया दुखी यतीम और बेवातेरे ही हाथ उन सब का है खेवातू ही मरज़ दे तू ही दवा देतू ही दवा-दारू में शिफ़ा देतू ही पिलाए ज़हर के प्यालेतू ही फिर अमृत ज़हर में डालेतू ही दिलों में आग लगाएतू ही दिलों की लगी बुझाएचुम्कारे चुम्कार के मारेमारे मार के फिर चुम्कारेप्यार का तेरे पूछना क्या हैमार में भी इक तेरी मज़ा है(3)ऐ रहमत और हैबत वालेशफ़क़त और दबाग़त वालेऐ अटकल और ध्यान से बाहरजान से और पहचान से बाहरअक़्ल से कोई पा नहीं सकताभेद तिरे हुक्मों में हैं क्या क्याएक को तू ने शाद किया हैएक के दिल को दाग़ दिया हैउस से न तेरा प्यार कुछ ऐसाउस से न तू बेज़ार कुछ ऐसाहर दम तेरी आन नई हैजब देखो तब शान नई हैयहाँ पछुआ है वहाँ पुर्वा हैघर घर तेरा हुक्म नया हैफूल कहीं कुमलाए हुए हैंऔर कहीं फल आए हुए हैंखेती एक की है लहरातीएक का हर दम ख़ून सुखातीएक पड़े हैं धन को डुबोएएक हैं घोड़े बेच के सोएएक ने जब से होश सँभालारंज से उस को पड़ा न पालाएक ने इस जंजाल में आ करचैन न देखा आँख उठा करमेंह कहीं दौलत का है बरसताहै कोई पानी तक को तरसताएक को मरने तक नहीं देतेएक उकता गया लेते लेतेहाल ग़रज़ दुनिया का यही हैग़म पहले और ब'अद ख़ुशी हैरंज का है दुनिया के गिला क्यातोहफ़ा यही ले दे के है याँ कायहाँ नहीं बनती रंज सहे बिनरंज नहीं सब एक से लेकिनएक से यहाँ रंज एक है बालाएक से है दर्द एक निरालाघाव है गो नासूर की सूरतपर उसे क्या नासूर से निस्बततप वही दिक़ की शक्ल है लेकिनदिक़ नहीं रहती जान लिए बिनदिक़ हो वो या नासूर हो कुछ होदे न जो अब उम्मीद किसी कोरोज़ का ग़म क्यूँ-कर सहे कोईआस न जब बाक़ी रहे कोईतू ही कर इंसाफ़ ऐ मिरे मौलाकौन है जो बे-आस है जीतागो कि बहुत बंदे हैं पुर-अरमाँकम हैं मगर मायूस हैं जो याँख़्वाह दुखी है ख़्वाह सुखी हैजो है इक उम्मीद उस को बंधी हैखेतियाँ जिन की खड़ी हैं सूखीआस वो बाँधे बैठे हैं मेंह कीघटा जिन की असाड़ी में हैसावनी की उम्मीद नहीं हैडूब चुकी है उन की अगेतीदेती है ढारस उन को पछेतीएक है इस उम्मीद पे जीताअब हुई बेटी अब हुआ बेटाएक को जो औलाद मिली हैउस को उमंग शादियों की हैरंज है या क़िस्मत में ख़ुशी हैकुछ है मगर इक आस बंधी हैग़म नहीं उन को ग़मगीं हैंजो दिल ना-उमीद नहीं हैंकाल में कुछ सख़्ती नहीं ऐसीकाल में है जब आस समयँ कीसहल है मौजों से छुटकाराजब कि नज़र आता है किनारापर नहीं उठ सकती वो मुसीबतआएगी जिस के ब'अद न राहतशाद हो उस रह-गीर का क्या दिल?मर के कटेगी जिस की मंज़िलउन उजड़ों को कल पड़े क्यूँ-करघर न बसेगा जिन का जनम भरउन बिछड़ों का क्या है ठिकाना?जिन को न मिलने देगा ज़मानाअब ये बला टलती नहीं टालीमुझ पे है जो तक़दीर ने डालीआईं बहुत दुनिया में बहारेंऐश की घर घर पड़ीं पुकारेंपड़े बहुत बाग़ों में झूलेढाक बहुत जंगल में फूलेगईं और आएँ चाँदनी रातेंबरसीं खुलीं बहुत बरसातेंपर न खिली हरगिज़ न खिलेगीवो जो कली मुरझाई थी दिल कीआस ही का बस नाम है दुनियाजब न रही यही तो रहा क्या?ऐसे बिदेसी का नहीं ग़म कुछजिस को न हो मिलने की क़सम कुछरोना उन बन-बासियों का हैदेस निकाला जिन को मिला हैहुक्म से तेरे पर नहीं चाराकड़वी मीठी सब है गवाराज़ोर है क्या पत्ते का हवा परचाहे जिधर ले जाए उड़ा करतिनका इक और सात समुंदरजाए कहाँ मौजों से निकल करक़िस्मत ही में जब थी जुदाईफिर टलती किस तरह ये आई?आज की बिगड़ी हो तो बने भीअज़ल की बिगड़ी ख़ाक बनेगीतू जो चाहे वो नहीं टलताबंदे का याँ बस नहीं चलतामारे और न दे तू रोनेथपके और न दे तू सोनेठहरे बन आती है न भागेतेरी ज़बरदस्ती के आगेतुझ से कहीं गर भागना चाहेंबंद हैं चारों खूँट की राहेंतू मारे और ख़्वाह नवाज़ेपड़ी हुई हूँ मैं तेरे दरवाज़ेतुझ को अपना जानती हूँ मैंतुझ से नहीं तो किस से कहूँ मैंमाँ ही सदा बच्चे को मारेऔर बच्चा माँ माँ ही पुकारे(4)ऐ मिरे ज़ोर और क़ुदरत वालेहिकमत और हुकूमत वालेमैं लौंडी तेरी दुखयारीदरवाज़े की तेरी भिकारीमौत की ख़्वाहाँ जान की दुश्मनजान अपनी है आप अजीरनअपने पराए की धुत्कारीमैके और ससुराल पे भारीसह के बहुत आज़ार चली हूँदुनिया से बेज़ार चली हूँदिल पर मेरे दाग़ हैं जितनेमुँह में बोल नहीं हैं उतनेदुख दिल का कुछ कह नहीं सकतीइस के सिवा कुछ कह नहीं सकतीतुझ पे है रौशन सब दुख दिल कातुझ से हक़ीक़त अपनी कहूँ क्याब्याह के दम पाई थी न लेनेलेने के याँ पड़ गए देनेख़ुशी में भी दुख साथ न आयाग़म के सिवा कुछ हात न आयाएक ख़ुशी ने ग़म ये दिखाएएक हँसी ने गुल ही खिलाएकैसा था ये ब्याह निनावाँजूँही पड़ा इस का परछावाँचैन से रहने दिया न जी कोकर दिया मलियामेट ख़ुशी कोरो नहीं सकती तंग हूँ याँ तकऔर रोऊँ तो रोऊँ कहाँ तकहँस हँस दिल बहलाऊँ क्यूँ-करओसों प्यास बुझाऊँ क्यूँ-करएक का कुछ जीना नहीं होताएक न हँसता भला न रोतालेटे गर सोने के बहानेपाएनती कल है और न सिरहानेजागिये तो भी बन नहीं पड़तीजागने की आख़िर कोई हद भीअब कल हम को पड़ेगी मर करगोर है सूनी सेज से बेहतरबात से नफ़रत काम से वहशतटूटी आस और बुझी तबीअतआबादी जंगल का नमूनादुनिया सूनी और घर सूनादिन है भयानक और रात डरानीयूँ गुज़री सारी ये जवानीबहनें और बहनेलियाँ मेरीसाथ की जो थीं खेलियाँ मेरीमिल न सकीं जी खोल के मुझ सेख़ुश न हुईं हँस बोल के मुझ सेजब आईं रो-धो के गईं वोजब गईं बे-कल हो के गईं वोकोई नहीं दिल का बहलावाआ नहीं चुकता मेरा बुलावाआठ पहर का है ये जुलापाकाटूँगी किस तरह रँडापाथक गई दुख सहते सहतेथम गए आँसू बहते बहतेआग खुली दिल की न किसी परघुल गई जान अंदर ही अंदरदेख के चुप जाना न किसी नेजान को फूँका दिल की लगी नेदबी थी भोभल में चिंगारीली न किसी ने ख़बर हमारीक़ौम में वो ख़ुशियाँ बियाहों कीशहर में वो धोएँ साहों कीत्यौहारों का आए दिन आनाऔर सब का त्यौहार मनानावो चैत और फागुन की हवाएँवो सावन भादों की घटाएँवो गर्मी की चाँदनी रातेंवो अरमान भरी बरसातेंकिस से कहूँ किस तौर से काटेंख़ैर कटें जिस तौर से काटेंचाव के और ख़ुशियों के समय सबआते हैं ख़ुश कल जान को हो जबरंज में हैं सामान ख़ुशी केऔर जलाने वाले ही केघर बरखा और पिया बिदेसीआइयो बरखा कहीं न ऐसीदिन ये जवानी के कटे ऐसेबाग़ में पंछी क़ैद हो जैसेरुत गई सारी सर टकरातेउड़ न सके पर होते सारेकिसी ने होगी कुछ कल पाईमुझे तो शादी रास न आईआस बंधी लेकिन न मिला कुछफूल आया और फल न लगा कुछरह गया दे कर चाँद दिखाईचाँद हुआ पर ईद न आईफल की ख़ातिर बर्छी खाईफल न मिला और जान गँवाईरेत में ज़र्रे देख चमकतेदौड़ पड़ी में झील समझ केचारों खूँट नज़र दौड़ाईपर पानी की बूँद न पाई
(3)नए ज़माने में अगर उदास ख़ुद को पाऊँगाये शाम याद कर के अपने ग़म को भूल जाऊँगाअयादत-ए-हबीब से वो आज ज़िंदगी मिलीख़ुशी भी चौंक चौक उठी ग़म की आँख खुल गईअगरचे डॉक्टर ने मुझ को मौत से बचा लियापर इस के ब'अद उस निगाह ने मुझे जिला लियानिगाह-ए-यार तुझ से अपनी मंज़िलें मैं पाऊँगातुझे जो भूल जाऊँगा तो राह भूल जाऊँगा(4)क़रीब-तर मैं हो चला हूँ दुख की काएनात सेमैं अजनबी नहीं रहा हयात से ममात सेवो दुख सहे कि मुझ पे खुल गया है दर्द-ए-काएनातहै अपने आँसुओं से मुझ पे आईना ग़म-ए-हयातये बे-क़ुसूर जान-दार दर्द झेलते हुएये ख़ाक-ओ-ख़ूँ के पुतले अपनी जाँ पे खेलते हुएवो ज़ीस्त की कराह जिस से बे-क़रार है फ़ज़ावो ज़िंदगी की आह जिस से काँप उठती है फ़ज़ाकफ़न है आँसुओं का दुख की मारी काएनात परहयात क्या इन्हें हक़ीक़तों से होना बे-ख़बरजो आँख जागती रही है आदमी की मौत परवो अब्र-ए-रंग-रंग को भी देखती है सादा-तरसिखा गया दुख मिरा पुरानी पीर जाननानिगाह-ए-यार थी जहाँ भी आज मेरी रहनुमायही नहीं कि मुझ को आज ज़िंदगी नई मिलीहक़ीक़त-ए-हयात मुझ पे सौ तरह से खुल गईगवाह है ये शाम और निगाह-ए-यार है गवाहख़याल-ए-मौत को मैं अपने दिल में अब न दूँगा राहजियूँगा हाँ जियूँगा ऐ निगाह-ए-आश्ना-ए-यारसदा सुहाग ज़िंदगी है और जहाँ सदा-बहार(5)अभी तो कितने ना-शुनीदा नग़्मा-ए-हयात हैंअभी निहाँ दिलों से कितने राज़-ए-काएनात हैंअभी तो ज़िंदगी के ना-चाशीदा रस हैं सैकड़ोंअभी तो हाथ में हम अहल-ए-ग़म के जस हैं सैकड़ोंअभी वो ले रही हैं मेरी शाएरी में करवटेंअभी चमकने वाली है छुपी हुई हक़ीक़तेंअभी तो बहर-ओ-बर पे सो रही हैं मेरी वो सदाएँसमेट लूँ उन्हें तो फिर वो काएनात को जगाएँअभी तो रूह बन के ज़र्रे ज़र्रे में समाऊँगाअभी तो सुब्ह बन के मैं उफ़ुक़ पे थरथराऊँगाअभी तो मेरी शाएरी हक़ीक़तें लुटाएगीअभी मिरी सदा-ए-दर्द इक जहाँ पे छाएगीअभी तो आदमी असीर-ए-दाम है ग़ुलाम हैअभी तो ज़िंदगी सद-इंक़लाब का पयाम हैअभी तमाम ज़ख़्म ओ दाग़ है तमद्दुन-ए-जहाँअभी रुख़-ए-बशर पे हैं बहमियत की झाइयाँअभी मशिय्यतों पे फ़त्ह पा नहीं सका बशरअभी मुक़द्दरों को बस में ला नहीं सका बशरअभी तो इस दुखी जहाँ में मौत ही का दौर हैअभी तो जिस को ज़िंदगी कहें वो चीज़ और हैअभी तो ख़ून थोकती है ज़िंदगी बहार मेंअभी तो रोने की सदा है नग़मा-ए-सितार मेंअभी तो उड़ती हैं रुख़-ए-बहार पर हवाईयाँअभी तो दीदनी हैं हर चमन की बे-फ़ज़ाईयाँअभी फ़ज़ा-ए-दहर लेगी करवटों पे करवटेंअभी तो सोती हैं हवाओं की वो संसनाहटेंकि जिस को सुनते ही हुकूमतों के रंग-ए-रुख़ उड़ेंचपेटें जिन की सरकशों की गर्दनें मरोड़ देंअभी तो सीना-ए-बशर में सोते हैं वो ज़लज़लेकि जिन के जागते ही मौत का भी दिल दहल उठेअभी तो बत्न-ए-ग़ैब में है इस सवाल का जवाबख़ुदा-ए-ख़ैर-ओ-शर भी ला नहीं सका था जिस की ताबअभी तो गोद में हैं देवताओं की वो माह-ओ-सालजो देंगे बढ़ के बर्क़-ए-तूर से हयात को जलालअभी रग-ए-जहाँ में ज़िंदगी मचलने वाली हैअभी हयात की नई शराब ढलने वाली हैअभी छुरी सितम की डूब कर उछलने वाली हैअभी तो हसरत इक जहान की निकलने वाली हैअभी घन-गरज सुनाई देगी इंक़लाब कीअभी तो गोश-बर-सदा है बज़्म आफ़्ताब कीअभी तो पूंजी-वाद को जहान से मिटाना हैअभी तो सामराजों को सज़ा-ए-मौत पाना हैअभी तो दाँत पीसती है मौत शहरयारों कीअभी तो ख़ूँ उतर रहा है आँखों में सितारों कीअभी तो इश्तिराकियत के झंडे गड़ने वाले हैंअभी तो जड़ से किश्त-ओ-ख़ूँ के नज़्म उखड़ने वाले हैंअभी किसान-ओ-कामगार राज होने वाला हैअभी बहुत जहाँ में काम-काज होने वाला हैमगर अभी तो ज़िंदगी मुसीबतों का नाम हैअभी तो नींद मौत की मिरे लिए हराम हैये सब पयाम इक निगाह में वो आँख दे गईब-यक-नज़र कहाँ कहाँ मुझे वो आँख ले गई
सर्द सिलों परज़र्द सिलों परताज़ा गर्म लहू की सूरतगुलदस्तों के छींटे हैंकतबे सब बे-नाम हैं लेकिनहर इक फूल पे नाम लिखा हैग़ाफ़िल सोने वाले कायाद में रोने वाले काअपने फ़र्ज़ से फ़ारिग़ हो करअपने लहू की तान के चादरसारे बेटे ख़्वाब में हैंअपने ग़मों का हार पिरो करअम्माँ अकेली जाग रही है
(1)ना-गहाँ शोर हुआलो शब-ए-तार-ए-ग़ुलामी की सहर आ पहुँचीउँगलियाँ जाग उठींबरबत ओ ताऊस ने अंगड़ाई लीऔर मुतरिब की हथेली से शुआएँ फूटींखिल गए साज़ में नग़्मों के महकते हुए फूललोग चिल्लाए कि फ़रियाद के दिन बीत गएराहज़न हार गएराह-रौ जीत गएक़ाफ़िले दूर थे मंज़िल से बहुत दूर मगरख़ुद-फ़रेबी की घनी छाँव में दम लेने लगेचुन लिया राह के रेज़ों को ख़ज़फ़-रेज़ों कोऔर समझ बैठे कि बस लाल-ओ-जवाहर हैं यहीराहज़न हँसने लगे छुप के कमीं-गाहों मेंहम-नशीं ये था फ़रंगी की फ़िरासत का तिलिस्मरहबर-ए-क़ौम की नाकारा क़यादत का फ़रेबहम ने आज़ुर्दगी-ए-शौक़ को मंज़िल जानाअपनी ही गर्द-ए-सर-ए-राह को महमिल जानागर्दिश-ए-हल्का-ए-गर्दाब को साहिल जानाअब जिधर देखो उधर मौत ही मंडलाती हैदर-ओ-दीवार से रोने की सदा आती हैख़्वाब ज़ख़्मी हैं उमंगों के कलेजे छलनीमेरे दामन में हैं ज़ख़्मों के दहकते हुए फूलख़ून में लुथड़े हुए फूलमैं जिन्हें कूचा-ओ-बाज़ार से चुन लाया हूँक़ौम के राहबरो राहज़नोअपने ऐवान-ए-हुकूमत में सजा लो इन कोअपने गुल्दान-ए-सियासत में लगा लो इन कोअपनी सद-साला तमन्नाओं का हासिल है यहीमौज-ए-पायाब का साहिल है यहीतुम ने फ़िरदौस के बदले में जहन्नम ले करकह दिया हम से गुलिस्ताँ में बहार आई हैचंद सिक्कों के एवज़ चंद मिलों की ख़ातिरतुम ने नामूस-ए-शहीदान-ए-वतन बेच दियाबाग़बाँ बन के उठे और चमन बीच दिया(2)कौन आज़ाद हुआ?किस के माथे से सियाही छूटीमेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी कामदर-ए-हिन्द के चेहरे पे उदासी है वही
घुटनों की पीड़ा में जाग के सोने वाली माँइंसुलिन की गोली से ख़ुश होने वाली माँसिलवटी हाथों से कपड़ों को धोने वाली माँपापा की इक डाँट से घुट कर रोने वाली माँबच्चों से छुप छुप कर रोना कैसा होता हैमाँ हो तुम और माँ का होना ऐसा होता है
ये अँधेरी रात ये सारी फ़ज़ा सोई हुईपत्ती पत्ती मंज़र-ए-ख़ामोश में खोई हुईमौजज़न है बहर-ए-ज़ुल्मत तीरगी का जोश हैशाम ही से आज क़िंदील-ए-फ़लक ख़ामोश हैचंद तारे हैं भी तो बे-नूर पथराए हुएजैसे बासी हार में हों फूल कुम्हलाए हुएखप गया है यूँ घटा में चाँदनी का साफ़ रंगजिस तरह मायूसियों में दब के रह जाए उमंगउमडी है काली घटा दुनिया डुबोने के लिएया चली है बाल खोले राँड रोने के लिएजितनी है गुंजान बस्ती उतनी ही वीरान हैहर गली ख़ामोश है हर रास्ता सुनसान हैइक मकाँ से भी मकीं की कुछ ख़बर मिलती नहींचिलमनें उठती नहीं ज़ंजीर-ए-दर हिलती नहींसो रहे हैं मस्त-ओ-बे-ख़ुद घर के कुल पीर-ओ-जवाँहो गई हैं बंद हुस्न-ओ-इश्क़ में सरगोशियाँहाँ मगर इक सम्त इक गोशे में कोई नौहागरले रही है करवटों पर करवटें दिल थाम करदिल सँभलता ही नहिं है सीना-ए-सद-चाक मेंफूल सा चेहरा अटा है बेवगी की ख़ाक मेंउड़ चली है रंग-ए-रुख़ बन कर हयात-ए-मुस्तआरहो रहा है क़ल्ब-ए-मुर्दा में जवानी का फ़िशारहसरतें दम तोड़ती हैं यास की आग़ोश मेंसैकड़ों शिकवे मचलते हैं लब-ए-ख़ामोश मेंउम्र आमादा नहीं मुर्दा-परस्ती के लिएबार है ये ज़िंदा मय्यत दोश-ए-हस्ती के लिएचाहती है लाख क़ाबू दिल पे पाती ही नहींहाए-रे ज़ालिम जवानी बस में आती ही नहींथरथर्रा कर गिरती है जब सूने बिस्तर पर नज़रले के इक करवट पटक देती है वो तकिया पे सरजब खनक उठती हैं सोती लड़कियों की चूड़ियाँआह बन कर उठने लगता है कलेजा से धुआँहो गई बेवा की ख़ातिर नींद भी जैसे हराममुख़्तसर सा अहद-ए-वसलत दे गया सोज़-ए-दवामदोपहर की छाँव दौर-ए-शादमानी हो गयाप्यास भी बुझने न पाई ख़त्म पानी हो गयाले रही है करवटों पर करवटें बा-इज़तिरारआग में पारा है या बिस्तर पे जिस्म-ए-बे-क़रारपड़ गई इक आह कर के रो के उठ बैठी कभीउँगलियों में ले के ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म एेंठी कभीआ के होंटों पर कभी मायूस आहें थम गईंऔर कभी सूनी कलाई पर निगाहें जम गईंइतनी दुनिया में कहीं अपनी जगह पाती नहींयास इस हद की कि शौहर की भी याद आती नहींआ रहे हैं याद पैहम सास ननदों के सुलूकफट रहा है ग़म से सीना उठ रही है दिल में हूकअपनी माँ बहनों का भी आँखें चुराना याद हैऐसी दुनिया में किसी का छोड़ जाना याद हैबाग़बाँ तो क़ब्र में है कौन अब देखे बहारख़ुद उसी को तीर उस के करने वाले हैं शिकारजब नज़र आता नहीं देता कोई बेकस का साथज़हर की शीशी की जानिब ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ता है हाथदिल तड़प कर कह रहा है जल्द इस दुनिया को छोड़चूड़ियाँ तोड़ीं तो फिर ज़ंजीर-ए-हस्ती को भी तोड़दम अगर निकला तो खोई ज़िंदगी मिल जाएगीये नहिं तो ख़ैर तन्हा क़ब्र ही मिल जाएगीवाँ तुझे ज़िल्लत की नज़रों से न देखेगा कोईचाहे हँसना चाहे रोना फिर न रोकेगा कोईवाँ सब अहल-ए-दर्द हैं सब साहब-ए-इंसाफ़ हैंरहबर आगे जा चुका राहें भी तेरी साफ़ हैंदिल इन्हीं बातों में उलझा था कि दम घबरा गयाहाथ ले कर ज़हर की शीशी लबों तक आ गयातिलमिलाती आँख झपकाती झिझकती हाँफतीपी गई कुल ज़हर आख़िर थरथराती काँपतीमौत ने झटका दिया कुल उज़्व ढीले हो गएसाँस उखड़ी, नब्ज़ डूबी, होंट नीले हो गएआँख झपकी अश्क टपका हिचकी आई खो गईमौत की आग़ोश में इक आह भर कर सो गईऔर कर इक आह सुलगे हिन्द की रस्मों का दामऐ जवाना-मर्ग बेवा तुझ पे 'कैफ़ी' का सलाम
चला धीमे धीमे से कछवे की चालपहुँचते पहुँचते उसे ग़ार तक शाम होने लगीउसे देख कर शेर भन्ना गयाछटंकी बराबर ये ख़ुराक भेजी है जंगल नेऔर इस क़दर देर सेमिटा दूँगा ख़रगोश की ज़ात कोमैं जंगल का जंगल ही खा जाऊँगासुना और ख़रगोश रोने लगागिड़गिड़ाने लगाहुज़ूर इस में मेरी नहीं है ख़तान जंगल सभा का कोई दोष हैकि जंगल ने तो सात ख़रगोश भेजे मगरमगर क्यामगर सरमगर क्या क्यूँ हकला रहे हो बताओ मुझेमगर मगर मगर सरकहाँ हैं तुम्हारे छे ग़द्दार साथीवो ख़रगोश फिर से सिसकने लगाहमें रास्ते में हुज़ूर एकज़ालिम ने रोका थाऔर बहुत गालियाँ आप को दींकहा मैं दोहराऊँ कैसे वो सब कुछ हुज़ूरकहा जाओ कह दो मिरे साथियों को वही खा गयाये सुनना था कि शेर ग़ुर्राया मोंछों में बल आ गएअकड़ने लगी उस की हंटरी पूँछऔर आँखों में बस ख़ून उतरने लगाकहाँ है किधर है बता कौन हैमिरे होते किस का हुआ हौसलाकि मेरी रेआ'या पे कोई ज़ुल्म कर सके
मैं अक्सर सर्द रातों मेंज़मीन-ए-ख़ाना-ए-दिल परअकेले बैठ जाता हूँफिर अपना सर झुका कर याद-ए-अहद-ए-रफ़्तगाँ दिल में सजाता हूँख़याल-ए-माज़ी-ए-दौराँ मिरे इस जिस्म के अंदर अजब तूफ़ाँ उठाता हैहज़ारों मील का लम्बा सफ़र पैदल कराता हैमैं यादों के धुँदलकों में तुम्हारे नक़्श-ए-पा को ढूँडने जब भी निकलता हूँतो इक तारीक वादी में उतरता हूँजहाँ यादों की कुछ बे-रंग तस्वीरें मुझे बिखरी पड़ी मा'लूम देती हैंमुझे आवाज़ देती हैंकि वहशत का ये जंगल बाहें फैलाए बुलाता हैमिरा शौक़-ए-नज़र थक कर ज़मीन पर बैठ जाता हैअचानक जब तुम्हारी याद के वहशी जानवर आवाज़ देते हैंमैं डरता हूँकि जैसे कोई बच्चा अपने ही साए से डर जाएकोई शीशा बिखर जाएकोई फ़ुर्क़त में घबराएमिरे तार-ए-नफ़स पर ज़र्ब करती मुस्तक़िल धड़कनमुझे रुकने नहीं देतीमुझे थकने नहीं देतीये बेचैनी मुझे फिर इक सफ़र पर ले के आती हैमैं चलता हूँकि जैसे इक मुसाफ़िर बा'द मुद्दत अपने घर जाएठिठुरती सर्द रातों मेंकोई जैसे कि जम जाएकि जैसे साँस थम जाएमगर मेरे मुक़द्दर मेंसुकून-ए-क़ल्ब-ओ-जाँ कब हैनिगाह-ए-यास में मुबहम सही कोई निशाँ कब हैकहीं पर शोरिश-ए-अमवाज-ए-दरिया हैकहीं आवाज़-ए-क़ुलक़ुल हैमगस का शोर है सरसर सबा की आह-ओ-गिर्या हैसो दिल अपना मचलता हैकिसी से कब बहलता हैधुआँ उठता है दिल से आँख में तूफ़ाँ मचलता हैतबीअत ज़ोर करती हैये धड़कन शोर करती हैतुम्हारी याद के ये चीख़ते और पीटते लम्हेमुझे रोने नहीं देतेमुझे सोने नहीं देते
जिस रात नहीं आता हूँ मैं, मेरे घर में होता है कोईइस बिस्तर पर सोता है कोईइस कमरे की दहलीज़ पर सर रख कर रोता है कोईये छुप छुप कर रोने वाला अपनी ही तरह महरूम न होमग़्मूम न हो, मज़लूम न होमुमकिन है उसे भी छुप छुप कर रोने का सबब मालूम न हो
हँसती हुई लड़कीएक आँसू में रहती हैइस एक आँसू मेंजब वो छुप गई थीतो उसे किसी ने नहीं ढूँडाऔर इस एक आँसू मेंजब वो घर गई थीतो किसी को नहीं मिल सकीइसी आँसू में सेहाथ बढ़ा केउस ने फूल तोड़े थेऔर इसी आँसू में से उस नेवो किताब पढ़ी थीजिस में आँसुओं सेतोड़े हुए फूल नहीं रखे जा सकतेहँसती हुई लड़कीबारिश मेंइस एक आँसू सेबाहर नहीं जा सकतीवो चलती हैऔर हमेशा थक के बैठ जाती हैअपने काढ़े हुए रुमाल परवो सुनती है अपनी कही हुई कहानीऔर हर बार रोने लगती हैहँसती हुई लड़कीअपनी हथेली पेआँसुओं सेएक क़िला बना लेती हैऔर एक आँसू सेज़ियादा नहीं रोती
रोने में जो लज़्ज़त है तो आहों में मज़ा हैऐ रूह ख़ुदी छोड़ कि नज़दीक ख़ुदा है
रात के हाथ में इक कासा-ए-दरयुज़ा-गरीये चमकते हुए तारे ये दमकता हुआ चाँदभीक के नूर में माँगे के उजाले में मगनयही मल्बूस-ए-उरूसी है यही उन का कफ़नइस अंधेरे में वो मरते हुए जिस्मों की कराहवो अज़ाज़ील के कुत्तों की कमीं-गाह''वो तहज़ीब के ज़ख़्म''ख़ंदक़ेंबाढ़ के तारबाढ़ के तारों में उलझे हुए इंसानों के जिस्मऔर इंसानों के जिस्मों पे वो बैठे हुए गिधवो तड़खते हुए सरमय्यतें हात-कटी पाँव-कटीलाश के ढाँचे के इस पार से उस पार तलकसर्द हवानौहा ओ नाला ओ फ़रियाद-कुनाँशब के सन्नाटे में रोने की सदाकभी बच्चों की कभी माओं कीचाँद के तारों के मातम की सदारात के माथे पे आज़ुर्दा सितारों का हुजूमसिर्फ़ ख़ुर्शीद-ए-दरख़्शाँ के निकलने तक हैरात के पास अंधेरे के सिवा कुछ भी नहींरात के पास अंधेरे के सिवा कुछ भी नहीं
अब गवारा हुई क्यूँ ग़ैर की सोहबत तुझ कोक्यूँ पसंद आ गई ना-जिंस की शिरकत तुझ कोऔज-ए-तक़्दीस को पस्ती की अदा भा गई क्यूँतेरी तन्हाई की जन्नत पे ख़िज़ाँ छा गई क्यूँशेर ओ रूमान के वो ख़्वाब कहाँ हैं तेरेवो नुक़ूश-ए-गुल-ओ-महताब कहाँ हैं तेरेकौन सी तुर्फ़ा अदा भा गई इस दुनिया मेंख़ुल्द को छोड़ के क्यूँ आ गई इस दुनिया मेंहो गई आम तू नूर-ए-मह-ए-ताबाँ की तरहआह क्यूँ जल न बुझी शम-ए-शबिस्ताँ की तरहअपनी दोशीज़ा बहारों को न खोना था कभीवो कली थी तू जिसे फूल न होना था कभीइफ़्फ़तें मिट के जवानी को मिटा जाती हैंफूल कुम्हलाते हैं कलियाँ कहीं कुम्हलाती हैंबुलबुल-ए-मस्त-नवा दश्त में क्यूँ रहने लगीनग़्म-ए-तर की जगह मर्सिया क्यूँ कहने लगीहवस-आलूदा हुई पाक जवानी तेरीग़ैर की रात है अब और कहानी तेरीकिस को मालूम था तू इस क़दर अर्ज़ां होगीज़ीनत-ए-महफ़िल ओ पामाल-ए-शबिस्ताँ होगीजज़्ब-ए-इफ़्फ़त का मयस्सर था जो इरफ़ाँ तुझ कोक्यूँ न मर्ग़ूब हुआ शेवा-ए-जानाँ तुझ कोतीरगी हिर्स की हूरों को भी बहका ही गईतेरे बिस्तर पे भी आख़िर को शिकन आ ही गईअब नहीं तुझ में वो हूरों की सी इफ़्फ़त बाक़ीहूर थी तुझ में, गई, रह गई औरत बाक़ीहाँ वो औरत जिसे बच्चों का फ़साना कहिएबरबत-ए-नफ़्स का इक फ़ुहश तराना कहिएजिस में है ज़हर उफ़ूनत का वो पैमाना कहेंइक गुनाहों का भभकता हुआ मय-ख़ाना कहेंनौहा-ख़्वाँ अपनी जवाँ मौत का होने दे मुझेमुस्कुरा तू मगर इस हाल पे रोने दे मुझे
हमें भी रो ले हुजूम-ए-गिर्या कि फिर न आएँगे ग़म के मौसमहमें भी रो ले कि हम वही हैंजो आफ़्ताबों की बस्तियों से सुराग़ लाए थे उन सवेरों का जिन को शबनम के पहले क़तरों ने ग़ुस्ल बख़्शासफ़ेद रंगों से नूर-ए-मअ'नी निकाल लेते थे और चाँदी उजालते थेशफ़क़ पे ठहरे सुनहरे बादल से ज़र्द सोने को ढालते थेख़ुनुक हवाओं में ख़ुशबुओं को मिला के उन को उड़ाने वालेसबा की परतों पे शेर लिख कर अदम की शक्लें बनाने वालेदिमाग़ रखते थे लफ़्ज़ ओ मअ'नी का और दस्त-ए-हुनर के मालिकवक़ार-ए-नूर-ए-चराग़ हम थेहमें भी रो ले हुजूम-ए-गिर्याहमें भी रो ले कि हम वही हैंजो तेज़ आँधी में साफ़ चेहरों को देख लेते थे और साँसों को भाँपते थेफ़लक-नशीनों से गुफ़्तुगूएँ थीं और परियों से खेलते थेकरीम लोगों की सोहबतों में कुशादा कू-ए-सख़ा को देखाकभी न रोका था हम को सूरज के चोबदारों ने क़स्र-ए-बैज़ा के दाख़िले सेवही तो हम हैंवही तो हम हैं जो लुट चुके हैं हफ़ीज़ राहों पे लुटने वालेउसी फ़लक की सियह-ज़मीं पर जहाँ पे लर्ज़ां हैं शोर-ए-नाला से आदिलों की सुनहरी कड़ियाँहमें भी रो ले हुजूम-ए-गिर्याहमें भी रो ले कि इन दिनों में हमारी पुश्तों पे बार होता है ज़ख़्म-ए-ताज़ा के सुर्ख़ फूलों का और गर्दन में सर्द आहन की कोहना लड़ियाँहमारी ज़िद में सफ़ेद नाख़ुन क़लम बनाने में दस्त-ए-क़ातिल का साथ देते हैं और नेज़े उछालते हैंहवा की लहरों ने रेग-ए-सहरा की तेज़ धारों से रिश्ते जोड़ेशरीर हाथों से कंकरों की सियाह बारिश के राब्ते हैंहमारी ज़िद में ही मुल्कों मुल्कों के शहरयारों ने अहद बाँधेयही कि हम को धुएँ से बाँधें और अब धुएँ से बंधे हुए हैंसो हम पे रोने के नौहा करने के दिन यही हैं हुजूम-ए-गिर्याकि मुस्तइद हैं हमारे मातम को गहरे सायों की सर्द शामेंख़िज़ाँ-रसीदा तवील शामेंहमें भी रो ले हुजूम-ए-गिर्या कि फिर न आएँगे ग़म के मौसम
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