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नज़्म
रात काफ़ी हो चुकी है नींद में बच्चे हैं धुत
आप यूँ साकित हुए बैठे हैं जैसे कोई बुत
नश्तर अमरोहवी
नज़्म
तुम्हें भरता हूँ बाँहों में
तुम्हारी याद-ए-रफ़्ता से वही लम्हा उठा कर वक़्त को साकित बनाता हूँ
आतिफ़ तौक़ीर
नज़्म
लेकिन कब से लब साकित हैं दिल की हंगामा-आराई की
बरसों से आवाज़ नहीं आई और इस मर्ग-ए-मुसलसल पर
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
अय्यूब नहीं हूँ कोई मासूम नहीं हूँ
ता-चंद मज़ालिम पे रहूँ साकित-ओ-ख़ामोश